Saturday, August 29, 2009

लाइफ इज अ सर्च

दा...दा...दा...करके बोलना शुरू भी नहीं किया कि एक तलाश साथ हो चली। पूरे घर में कुछ न कुछ ढूंढते फिरना। कभी कुछ गिराना, कुछ उठाना। कुछ चीजों को मुंह में डालकर स्वाद लेकर परखना...कान उमेठे जाना। फिर वही करना...फिर बड़े होना...तलाश जारी। अनजानी तलाश...जाने क्या ढूंढता है ये मेरा दिल...जैसे ख्यालों में घिर जाना।
सुख...हां शायद यही होगा...सब तो इसे ही ढूंढते हैं। लेकिन ऐसा भी तो हुआ है कई बार कि जब सुख या खुशी से सामना हुआ तो दिल का कोई कोना बेतरह भीग गया। जाने किस $गम की कसक हर खुशी में घुल जाती, चुपके से।
फूल, पत्ती, नदियां, पहाड़, चिडिय़ा, संगीत कुछ भी नहीं भाता। जी चाहता रबर से मिटा ही डालूं सब कुछ। एकदम खाली हो जाये कैनवास। या फिर आसमान के उस पार झांककर देखूं, कहीं वहां मेरा कोई हिस्सा तो नहीं। वजूद का कौन सा हिस्सा न जाने कब, कहां गिर गया हो। अगर तलाश है, तो $जरूर कुछ तो होगा ना जिसकी तलाश है। इसी तलाश के दरम्यिान कभी किसी पल में जिं़दगी को बेहद करीब पाया भी है...यह तस्वीर ऐसे ही पलों में से एक है। लाइफ इज अ सर्च....
(हमारे साथी फोटोग्राफर अतुल हुंडू की एक फोटो $िजंदगी झांकती है जहाँ )

4 comments:

Udan Tashtari said...

लाइफ इज अ सर्च..सच!!

विपिन बिहारी गोयल said...

बहुत खूब

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

BAHUT BADHIA .
BADHAI.

सुशीला पुरी said...

सुन्दर अभिव्यक्ति के लिए बधाई .......
मेरे ब्लॉग पर भी घूम लीजये .