Monday, August 24, 2009

कुछ, जिसका है इंतजार


केदारनाथ सिंह
कुछ
जिसे डाकिया कभी नहीं लाता
कुछ जो दिन भर गिरता रहता है
मकानों की छतों से धूल की तरह.
कुछ-जिसे पकडऩे की जल्दी में
बसें छूट जाती हैं,
चाय का प्याला मे$ज पर धरा रह जाता है
और शहर में होने वाली हत्या की खबर
चौंकाती नहीं
न आघात देती है।

सिर्फ आदमी उठता है
और अपनी कंघी को उठाकर
शीशे के और करीब रख देता है
कुछ, जिसके लिए
सारी पेंसिलें रोती हैं नींद में
और सड़क के दोनों किनारों के मकान
बिना किसी शब्द के
बरसों तक खड़े रहते हैं
एक ही सीध में।

8 comments:

rohit said...

Kedar ke Saral Se Kavitao Mein Gahara Arthbodh Hai.
Thanks for Kedar Kavita
Rohit Kaushik

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर ..
गणेश उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

मुनीश ( munish ) said...

This is called 'waiting for Godot'. Hope u've read this play by Beckett !

एकलव्य said...

सुन्दर
गणेश उत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ...

Udan Tashtari said...

केदारनाथ सिंह की यह रचना प्रस्तुत करने का आभार.

डॉ.ब्रजेश शर्मा said...

सुन्दर रचना का चयन किया है आपने,
प्रतिभा जी !
आपकी दुनियां में वैविध्य का सौन्दर्य है !
शुभकामनाएं !

Zindagi tere saath said...

achhi kavita hai

विपिन बिहारी गोयल said...

भावपूर्ण सुंदर अभिव्यक्ति


तेज धूप का सफ़र