खरगोशों की उदुक-फुदक दिन के उगने से पहले धरती को संवार रही है। अरसे बाद बालकनी से लटक कर लगभग कांधे से आ लगने को आतुर अशोक धरती को शोक मुक्त करने की प्रार्थना में मानो आँखें मूँदें खड़े हैं। धूप के कुछ कतरे इधर-उधर बिखरना शुरू हो चुके हैं।
इस सुबह में कल रात का कलरव भी दाखिल है। पूर्णमासी का चाँद मानो सुबह के करीब रखे चाय के कप को जरा सा सरकाकर बैठा ऊंघ रहा हो। मैं नन्हे अचंभे से चाय के कप को देख रही हूँ, जिसके दाहिनी तरफ सुबह की किरनें हैं और बायीं तरफ पूर्णमासी के चाँद की धज।
सुबह के वैभव को देखती हूँ तो खुशी गालों पर छलक़ने को आतुर होती है। ठीक उसी वक़्त कोई मध्धम सी सिसकी जो भीतर ही भीतर न जाने कबसे पल रही है आँखों के रास्ते बाहर आने का रास्ता ढूंढ लेती है। सिसकियाँ बेआवाज होती है, उन्हें भीड़ से डर लगता है। उन्हें आईने से भी डर लगता है। वे एकांत की फिराक में रहती हैं। वे फिराक में रहती हैं कि कब मैं भीड़ से तनिक हाथ छुड़ाऊँ और खुद के करीब आऊँ।
इस गहरी सिसकी में जमाने भर की औरतों की वेदना घुली है। इसमें मेरी बेबसी घुली है। जब्त है, आक्रोश है। मैं इससे आँखें नहीं चुरा सकती।
नन्हा सा सुख भी किसी कर्ज़ सा लगता है।
इस सुबह में प्यार है। साथ ही एक गुहार है। ईश्वर से प्रार्थना है, कि तुम हो, तो हो न यार। सारे पत्थर दिलों को मोम कर दो न। सारे हथियारों को फूलों में बदल दो न। सारे बस्तों में सपने भर दो, इस दुनिया को कुछ तो जीने लायक बना दो।
तो क्या मैं इतनी निराश हो चुकी हूँ कि किसी चमत्कार.का इंतज़ार करने लगी हूँ। मैं खबरें छुपाती फिरती हूँ, या खबरों से छुपती फिरती हूँ पता नहीं लेकिन जानती हूँ बच तो बिलकुल भी नहीं पाती।
अशोक के पेड़ों की कतारें जिस तरह प्रार्थनामय हैं मेरे हाथ अपने आप जुड़ गए हैं, ओ जीवन, जरा सा मरहम बन जा, जा जख्मी दिलों को गले से लगा ले। सामने ख़रगोश कुलांचे मार रहे हैं, सुबह पूरी तरह धरती पर बिखर चुकी है, लेकिन क्या अंधेरा पूरी तरह गायब हो चुका है।
