Tuesday, June 26, 2018

वो ख़्वाब जो बरस रहा है...




रात का किवाड़ खटखटाती है
तुम्हारी आवाज की उजली किरन

पपीहे की टेर
लगती है राग भैरवी सी
 रात झरे हरसिंगार से सजी है धरती

तुम्हारी आवाज में सुबह के खिलते ही
मोगरे और रातरानी को नींद आने लगी है
जबकि बुलबुल के जोड़े को सूझ रही है शरारत

पास में बैठे हैं विनोद कुमार शुक्ल
और वॉन गॉग दोनों

मेरे पास दो कप चाय है
मैं दोनों कप चाय पी रही हूँ बारी बारी से
दूसरा कप किसके हिस्से का है
पता नहीं
पहला कप यकीनन तुम्हारा ही है

हवाओं से बात करती हूँ
तुम मुझे बात करते हुए देखते हो

सुख और क्या है
दूर शहर में बैठकर
तुम्हारे यूँ इतने करीब होने के सिवा

मैंने सपने में एक नदी देखी
तुमने सपने में देखा एक जंगल
इस सुबह में वो जंगल झूम रहा है
 वो नदी खिलखिला रही है

यूँ ही हथेलियाँ आगे कर देती हूँ
टप्प से गिरती हैं कुछ बूँदें
जबकि बादल कहीं नहीं थे

अचानक हवाएं उड़ा ले जाती हैं मेरे शहर का ख्वाब
अब वो तुम्हारे शहर का ख्वाब है
अब वो पूरी धरती का ख्वाब है

वो ख़्वाब जो बरस रहा है...



5 comments:

संजय भास्‍कर said...

हवाओं से बात करती हूँ
तुम मुझे बात करते हुए देखते हो
कोमल भावनाएँ शब्दों से बाहर झांकती हुई , होठों पर स्मित मुस्कान बिखेरने में सफल....शानदार प्रस्तुति।

radha tiwari( radhegopal) said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (27-06-2018) को "मन को करो विरक्त" ( चर्चा अंक 3014) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
राधा तिवारी

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुन्दर।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन आपातकाल की याद में ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Darshan Darvesh said...

वाह , बहुअत खूबसूरत !