मंज़र है वही ठठक रही हूँ
हैरत से पलक झपक रही हूँ
ये तू है के मेरा वहम है
बंद आँखों से तुझ को तक रही हूँ
जैसे के कभी न था तार्रुफ़
यूँ मिलते हुए झिझक रही हूँ
पहचान मैं तेरी रोशनी हूँ
और तेरी पलक पलक रही हूँ
क्या चैन मिला है सर जो उस के
शानों पे रखे सिसक रही हूँ
इक उम्र हुई है ख़ुद से लड़ते
अंदर से तमाम थक रही हूँ.
-परवीन शाकिर
5 comments:
kya baat hai ...
क्या चैन मिला है सर जो उस के
शानों पे रखे सिसक रही हूँ !
Bahut khoob.
बंद आँखों से तुझ को तक रही हूँ
vaah
kitni sundar baat hai ye.
ये तू है के मेरा वहम है
बंद आँखों से तुझ को तक रही हूँ
क्या बात है !!
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