Wednesday, March 6, 2019

वो शाम अब तक ढली नहीं है


एक रोज जब 
तुम्हारे क़दमों की 
लय से लय मिलाते मेरे कदम 
तय कर रहे थे 
जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफर 
तो आसपास खिल उठा था 
मुस्कुराहटों का मौसम 

वो शाम अब तक ढली नहीं है
वो लम्हे अब तक महक रहे हैं.



3 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (08-03-2019) को "नारी दुर्गा रूप" (चर्चा अंक-3268) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Book River Press said...

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Onkar said...

बहुत खूब