Thursday, March 28, 2019

चॉकलेट का पेड़ और उर्मि


उर्मि हर रोज शाम को घर लौटते पंछियों के झुण्ड को देखने को सब काम छोड़ छत पर आ जाती थी. दादी कहतीं कि शाम को पंछी लौटते हैं. वो कहाँ गये थे, कहाँ को लौट रहे थे नन्ही उर्मि को कुछ समझ में नहीं आता था. उसने दादी से कई बार पूछा, दादी वो कहाँ से लौटते है दादी ने हंसकर एक ही जवाब दिया, 'तेरे पापा की तरह वो भी तो ऑफिस जाते होंगे. है न?'

उर्मि की दुनिया में पंछियों के ऑफिस, गाय, भैंसों के ऑफिसों का दृश्य बनने लगते. वो सोचते-सोचते खुश होने लगती. 'दादी, मुझे भी जाना है पंछियों का ऑफिस देखने. वहां क्या काम होता होगा? चिडिया भी फ़ाइल देखती होगी.' ऑफिस का मतलब फ़ाइलों का ढेर और टाईपराइटर की खटर-पटर ही जाना था उर्मि ने अब तक. इसका कारण भी पापा के ऑफिस में कभी-कभार उसका जाना था.

'दादी, आराम से फुर्सत में पैर फैलाकर, खरबूजे के बीज छीलते हुए कहतीं, चिड़ियों के ऑफिस में घोसले की बात होती होगी शायद. कौन से पेड़ पर कौन सी चिड़िया का घोसला हो शायद यह तय होता होगा.'

'फिर तो उनका ऑफिस न ही होता हो यही अच्छा. उनको तो किसी भी पेड़ पर कितना भी बड़ा घोसला बनाने की आज़ादी होनी चाहिए. है न दादी?'
दादी चुप रहतीं. उर्मि का दिमाग चलता रहता.

'उनकी सैलरी कहाँ से आती होगी? कित्ते पैसे मिलते होंगे दादी?' वो भो अपने बच्चों के लिए चौकलेट लाते होंगे घर लौटते समय?

'हो सकता है वो शाम को बच्चों के लिए जो दाना लाते हों उसमें चॉकलेट होती हो.' दादी को भी उर्मि की बातों में मजा आने लगता.

'और गाय भैंस के ऑफिस में क्या होता होगा दादी?'
'क्या पता क्या होता होगा. तुम सोचो तो.'

उर्मि ने कहा, 'दादी गाय बैल को तो वैसे ही इतना काम करना होता है वो ऑफिस में कैसे काम करते होंगे. दिन भर तो खेत में काम करते हैं न बैल. गाय भी. ऊँट भी.'

'तो हो सकता है चारा चरके लौटते हों.' दादी ने कहा.

'अरे हाँ, कित्ता मजा आता होगा फिर तो. पिकनिक से लौटने जैसा. उनकी किटी पार्टी होती होगी. है न?
सुनो बहन, मेरा मालिक मुझे बहुत मारता है, क्या करूँ समझ में नहीं आता. एक कहती होगी. दूसरी कहती होगी, हाँ बहन मेरा भी यही हाल है. सारा दिन काम कराता है, सब दूध निकाल लेता है और खाना भी कम देता है. जी चाहता हूँ कहीं भाग जाऊं.'

उर्मि गाय, बैल की नकल करके ताली पीटकर हंस दी. लेकिन जल्दी ही उदास भी हो गयी. फिर तो वापस लौटते समय खुश नहीं होते होंगे न ये लोग. वही खूंटा, वही चारा, वही काम.'

दादी ने सोचा बच्ची फंस गयी है तो उसे उलझन से निकाल दें. 'लेकिन उसके बच्चे भी तो इंतजार करते होंगे न. जैसे तू करती है अपनी मम्मी, पापा का.' दादी ने कहा.

'हाँ, वो भी बच्चों के लिए चॉकलेट लाते होंगे क्या?' उर्मि की सुई चॉकलेट पर अटकी हुई थी.

'लेकिन दादी उनके पास तो पैसे नहीं होते होंगे फिर वो चॉकलेट कैसे लाते होंगे. वो कुछ भी कैसे लाते होंगे.' उर्मि फिर उदास हो गयी.

'दादी अगर मैं सबको खूंटे से खोल दूं तो ?' यह कहते हुए उर्मि की आँखें चमक उठी थीं.
 दादी ने कहा 'तुम बताओ फिर क्या होगा?'
'वो लोग भी ऑफिस जायेंगे, काम करेंगे और पैसे कमाएंगे. फिर शाम को चॉकलेट लेकर आयेंगे.'

'लेकिन यह भी तो हो सकता है उनके बच्चों को चॉकलेट पसंद ही न हो? जैसे मुझे पसंद नहीं.' दादी को उर्मि की बातों में इतना मजा आ रहा था कि उनकी दोपहर की नींद भी चली गयी थी.

'दादी. आप बूढी हो इसलिए आपको चॉकलेट पसंद नहीं. सब बच्चों को चाकलेट पसंद होती है.' उर्मि को लगा दादी एकदम बुध्धू है. भला चॉकलेट किसे पसंद नहीं होगी.

दादी पोपले मुंह से हो हो करके हंसने लगी. 'ओह मैं तो भूल गयी थी कि मैं बूढी हो गयी हूँ.'

'तो क्या करना चाहिए कि सब बच्चों को चाकलेट मिल जाए.' दादी ने उर्मि को मुश्किल में डालना चाहा.
उर्मि ने कुछ देर सोचा फिर कहा, 'मेरे पास एक आइडिया है.'
'क्या?' दादी ने पूछा.

'मैं नहीं बताउंगी.' उर्मि की आँखों में चमक थी.
दादी की उत्सुकता यह जानने की थी कि उर्मि के पास कौन सा आइडिया है. लेकिन उर्मि ने बताया नहीं.

अगले दिन से घर के बगीचे में लगे पेड़ पर बने घोसले में और पशुओं के बाड़े में  उर्मि की चॉकलेट के रैपर जब तब मिलने लगे. उर्मि अब जब भी चॉकलेट खाती तो उसमें से एक हिस्सा सबके नाम का जमीन में बोने लगी. थोड़ी चॉकलेट घोसलों में चुपके से रख आती कभी जानवरों के चारे में डाल आती.

चाकलेट भले ही चिड़ियों व जानवरों ने न खायी हो, भले ही न उगे हों चॉकलेट के पेड़ लेकिन उन चाकलेट्स की मिठास उर्मि की जिन्दगी में अब तक कायम है.


Wednesday, March 27, 2019

अभिनय


अपनी उन्मुक्त हंसी
दौड़ते भागते क़दमों की रफ़्तार
पार्टियों में लचकती कमर
और शोख अदाओं में

त्योहारों में मन जतन से शामिल होने
पकवानों को कभी खाते, कभी बनाने
दोस्तों के संग धौल-धप्पा करने
बेवजह की बातों में रूठ जाने
और फिर खुद ही मान जाने में

छुट्टे पैसे के लिए सब्जी वाले से झिक-झिक करने
और सिनेमा देखते वक़्त चुपके से रो लेने
कॉफ़ी की खुशबू में डूबने
और उतरते सूरज के संग मुस्कुराने में

सहकर्मियों संग करते हुए मजाक
या चुहलबाजियों में
वो आसानी से छुपा लेती हैंअपनी उदासियां

अभिनय कला में प्रवीण बनाता है जीवन स्त्रियों को. .

#worldtheatreday

Saturday, March 23, 2019

चलो न चाय पीते हैं

प्रिय देवयानी, 

उस रोज जब तुम्हारी जयपुर छोड़ने वाली पोस्ट पढ़ी तो जाने कितनी सिसकियाँ घेरकर बैठ गयी थीं. जाने क्यों सब इतना जिया हुआ लग रहा था उस पोस्ट का. हर्फ दर हर्फ. तुम मेरे भीतर जीती हो और शायद मैं भी तुम्हारे भीतर. आज 23 मार्च है. जानती हो आज ही के दिन सात बरस पहले मैंने भी तुम्हारी तरह अपना शहर छोड़ा था. सामान वाले ट्रक के साथ नहीं सिर्फ एक सूटकेस में रखे कुछ जोड़े कपड़ों के साथ. पहली बार अपने शहर से बिछड़ रही थी. बेटू से भी. जाने कैसा कच्चा-कच्चा सा मन था. लेकिन कुछ नया करने, देखने और जीने का चाव था. खुद पर जरा सा आत्मविश्वास था जो उस वक़्त ताजा ताजा कमाया था. बहुत सारा डर भी था कि जाने क्या होगा. देहरादून मेरे दोस्तों का शहर भी नहीं था. सिर्फ स्वाति थी जो हर वक़्त साथ रही, अब तक है.

लेकिन आज यह शहर मुझे मेरा शहर लगता है. बहुत सारे दोस्त हैं. ढेर सारा प्यार मिला यहाँ, सम्मान भी. यहाँ के रास्ते, पेड़, पंछी, हवाएं सबने मुझे अपनाया, दुलराया. नूतन गैरोला दी ने दूर से पहचाना और अपने प्रेम में रंग लिया. गीता गैरोला दी ने इतना अधिकार दिया कि उनकी वार्डरोब मेरी ही है अब और संतोषी के हाथ का खाना भी.

जानती हो, शहर छोड़ने चाहिए. शहर छूटता है तो नया शहर मिलता है. नए संघर्ष मिलते हैं जो निखारते हैं, नये लोग मिलते हैं जो संवारते हैं. नए ख़्वाब मिलते हैं जो जीने की वजह बनते हैं. तुम्हें भी खूब सारे नए पुराने दोस्त मुबारक, नए संघर्षों की आंच और ढेर सारे ख्वाब मुबारक.

तुम दिल्ली में हो तो दिल्ली मेरा भी हुआ थोड़ा सा जैसे मैं देहरादून में हूँ तो देहरादून तुम्हारा भी है ही. जयपुर और लखनऊ तो हैं ही अपने.

चलो न चाय पीते हैं.

Monday, March 18, 2019

अब लागे तुमड़ी फूलण लागे तुम भी फाग मनाओ

- जगमोहन चोपता 

ठंड कम होने के साथ ही उत्सवधर्मी पहाड़ और पहाड़ी समाज इस पल को उत्सवों में बदलने की कोई कसर नही छोड़ता है। जंगल बुरांश, मेहल, प्यूली के फूलों से लकदक होते हैं तो चीड़ अपने परागण से पूरी धरती को पीला करने की होड़ में है। ऐसे समय में कौन चाहेगा कि इस पल में राग और फाग का मिलन न हो। तो पहाड़ी उठाता है ढ़ोल-दमाऊ और उन्मुक्त हो गाते हैं होली गीत और गुलजार हो उठते हैं पहाड़, गांव और वहां का समाज। 

सच में ऐसा ही कुछ होता है चमोली के चोपता-कड़ाकोट क्षेत्र में जब युवाओं की टोली गांव-गांव जाकर होली के गीतों को गाकर होली के जश्न को मनाते हैं। शुरूआत होती है चीर काटने से। चीर जो कि मेहल की फूलों से लकदक टहनी को काटकर गांव के बीच मंदिर में स्थापित किया जाता है। चीर काटने के दो तीन तक युवाओं की टोली होली का झंण्डा और ढ़ोल दमाऊं की थाप पर गांव गांव जाकर होली के गीत गाते हैं। इसी बहाने अपने बड़े बुर्जुगों का आशीवार्द लेने, अपने दोस्तों को मिलने और अपने क्षेत्र को जानने समझने का मौका होता है। होलिका दहन के दिन चार दिन पूर्व काटे चीर का दहन किया जाता है। जिसकी राख और रंग गुलाल से होली के दिन होली खेली जाती है। इस क्षेत्र के होली के गीतों को जब देखते हैं तो इनमें यहां के समाज की प्रतिध्वनियां सुनाई देती है। इन प्रतिध्वनियों में कहीं कहीं देशज शब्दों के साथ ही ब्रज की खुशबू भी मिलती है।
वैसे तो होली के गीत पूरे ही पहाड़ में खेती किसानी, पहाड़ के संघर्ष और उल्लास के पलों, देवताओं के वृतांतों के इर्द गिर्द होते हैं। बस इनमें क्षेत्र बदलने पर गाने के तरीको और कुछ कुछ शब्दों का हेर फेर होता रहता है। शायद यही लोक की ताकत है कि वह किसी खास जकड़न से मुक्त देशकाल के अनुरूप अपने को बदलते रहता है। यही लचीलापन इन गीतों को गाने के तरीकों, शब्दों के चयन और शिल्प में दिखता है जो इन गीतों में विविधिता लाता है।
पहाड़ के होली के गीतों के प्रकारों को समझना हो तो इनको मोटा मोटा पांच हिस्सों में बांटा जा सकता है। पहला, खेती किसानी और वहां के भूगोल का वर्णन करने वाले गीत। दूसरा रिश्ते नातों जैसे देवर-भाभी, दोस्त, प्रियतमा या परिवार जन को संबोधित करने वाले गीत। तीसरे किस्म के वे गीत हैं जो व्यापारी या किसी परदेशी के जीवन और कर्म से संबंधित हैं। चैथा, देवी देवताओं से संबंधित गीत जिसमें मुख्य रूप से राम, कृष्ण, सीता, दुर्गा आदि देवताओं के इर्दगिर्द गीत रचे गये हैं। पांचवा आशीष गीत है जिनमें होल्यार लोगों को आशीष देकर अगले साल आने की कामना करते हैं।
खेतीहर समाज में खेती एकमात्र आजीविका के मुख्य साधन था। ऐसे में होली के गीतों में पहाड़, खेती और उससे जुड़े हल-बैल, बीज, खेत आदि के वर्णन में सहज और गेयता का शानदार मिश्रण मिलता है। होली के गीतों में खूब सारे गीत खेती-किसानी और खेत खलिहान के जीवंत अनुभवों से भरे हैं इसकी एक बानगी देखिये-
पूरब दिशा से आयो फकीरो/ लाया तुमड़ि को बीज, तुम भी राग मनाओ
अब लागे तुमड़ी बोयण लागे/ बोये सकल खेत, तुम भी राग मनाओ
अब लागे तुमड़ी जामण लागे/जागे सकल खेत तुम फाग मनाओ
अब लागे तुमड़ी गोडण लागे/गोड़े सकल खेत तुम भी फाग मनाओ
अब लागे तुमड़ी फूलण लागे/फूल सकल खेत तुम भी फाग मनाओ
अब लागे तुमणी काटण लागे/काटे सकल खेत तुम भी

इस गीत में तुमड़ी यानि कद्दू के बीच की यात्रा और उसको बोने से लेकर काटने तक की पूरी यात्रा का जिक्र है। यह सिर्फ जिक्र भर नहीं है बल्कि इसके जरिये खेती किसानी में बीजों को दूसरी जगहों से लाने, उपजाने और उसको पूरा सम्मान देने का मामला लगता है। किसी बीज के प्रति इस तरह का प्रेम खेतीहर समाज की सृजनशीलता को दर्शाता है। ऐसे खूब सारे गीतों के जरिये वे बीज, हल, बैल, खेती को पूरा सम्मान देने के साथ ही उसका जश्न मनाते हैं। ऐसा ही एक और शानदार होली गीत में खेती, पशुधन और घर की गृहस्थी का मजेदार समावेश दिखता है।
देश देखो रसिया बृजमण्डल/हमारे मुलक में गाय बहुत है
बड़ी-बड़ी गाये, छोटी है बछिया, रसिया बृजमण्डल
हमारे मुलक में धान अधिक है/कूटत नारि पकावत खीर, रसिया बृजमण्डल
हमरे मुलक में गेंहू अधिक है/पीसत नारि पकावत पूरि, रसिया बृजमण्डल
होली में खूब सारे गीत हैं जो देवर-भाभी, प्रेमी और परदेश में रह रहे अपने परिजनों की सलामती और उनके होली आगमन की कामना लिये होते हैं। पहाड़ के प्रकृति पे्रमी होल्यारों ने देवर भाभी के गीतों की रचना में भी सादगी और निर्मल प्रेम को ही केन्द्रबिंदु बनाया। उसकी बानगी देखिये-
मेरा रंगिलो देवर घर आयो रह्यो/केहिणू झुमका केहिणू हार
मैखुणी गुजिया लायो रह्यो, मेरो रंगिलो...
केखुणी बिंदी, केखुणी माला/मैखुणी साड़ी लायो रह्यो मेरा, मेरो रंगिलो.....
पहाड़ की जटिल भौगोलिक बसाहटों में किसी अपरिच का आना भी अनोखी बात रही होगी। ऐसे में होली के गीतों में उस समाज में आने वाले हर प्रकार के अजनबी लोगों का भी जिक्र है। जिन्होंने वहां आकर वहां के लोगों के जीवन को सरल, सहज बनाने में योगदान दिया। ऐसे ही घूम घूक कर व्यापार करने वाले व्यापारियों को लेकर एक मशहूर होली गीत है। जिसमें उनकी भूख-प्यास और पैदल चलने से लगी थकान का सुन्दर वर्णन मिलता है। उसकी बानगी देखिये।
जोगी आयो शहर में ब्यौपारी झू की/इस ब्यौपारी को क्या कुछ चाहिए
इस ब्यौपारी को प्यास लगी है/पानी पिलाई दे नथ वारी, झुकी आयो
इस ब्यौपारी को भूख लगी है/खाना खिलादो नथ वारी जोगी
होली में खूब सारे गीत ऐसे रचे गये हैं जिनमें होली की रचना को देवताओं की उपज माना गया है। इसके जरिये इसकी महत्ता और जरूरत को धार्मिक रूप से स्थापित करने की पहल दिखती है। ऐसे गीतों के जरिये स्थापित देवी देवताओं के साथ ही स्थानीय देवी देवताओं के नाम जोड़कर अपने गांव या क्षेत्र में होली की रचना को स्थापित करने की कोशिश की जाती है। उसकी बानगी देखिये!
एकादश द्वादशी चीर ब्रहमा ने होली रची है/रची ब्रह्मा ने होली होली की धूम मची है।
चोपता मण्डल बीच दुर्गा ने होली रची है/रची दुर्गा ने होली होली की धूम मची है
मथुरा मण्डल बीच कृष्ण ने होली रची है।/रची कृष्ण ने होली होली की धूम मची है
होली के गीतों को देखे तो इनमे राममायण के तमाम प्रसंग, कृष्ण लीलाओं के प्रसंग, शिव-पार्वती प्रसंगों का खूब प्रभाव दिखता है। लोक के खरे और खनकदार शब्दों में पगे इन होली गीतों में खूब सारी करूणा, प्रेम, वीरता, विपदाओं और अल्हाद के भाव भरे पड़े हैं। ऐसे में होल्यार जब किसी करूण और विपदाओं प्रसंग पर होली गाते हैं तो उनकी आवाज में वो दर्द साफ झलकता। ऐसे में गीतों को सुन रहे लोगों की आखों के पोर गीले हो जाते और वे करूणा से भर उठते हैं। वे अपने जीवन के दुख और विपदाओं को इन गीतों के साथ संतति बैठाकर झूमने लगते। वहीं वीररस के होली गीतों में वे ठेठ पहाड़ी पराक्रम से भुजाओं को फटकाते हुए ऐसे गाते हैं जैसे किसी नरभक्षी बाघ के शिकार के लिये निकल पड़े हों। राम के वनवास के समय का ऐसा ही एक गीत की बानगी देखिये।
ओहो केकई राम गयो वनवासन/पिता दशरथ अरज करत है
राम न माने एक, केकई राम/माता कौशल्या अरज करत है
राम ना माने एक, केकई राम/मात्रा सुमित्रा अरज करत है
राम न माने एक, केकई राम/भाई भर अरज करत है
लंका प्रसंग को होली के गीतों में हनुमान के जरिये लंका कैसे है का विवरण है जिसमें हनुमान के जरिये लंका की भौगोलिक स्थिति के साथ ही राम के भक्त विभिषण का जिक्र किया जाता है। इस तरह-
बोलो पवनसुत वीर, गढ़लंका कैसी बनी है/ वार समुन्दर पार समुन्दर बीच में टापू एक
लंका गढ़ के चार है द्वारे, उन पर पहरे अनेक/गढ़ लंका ऐसी बनी है
लंका गढ़ में घोर निशाचर, भक्त विभिषण एक/गढ़ लंका ऐसी बनी है
बोलो पवनसुत बीर, गढ़ लंका कैसी बनी है
देवताओं से संबंधित खूब सारे होली गीतों में दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों की अलग अलग तरह से वर्णन किया जाता है। उनकी पूजा अर्चना से लेकर आशीष देने की कामना इन गीतों में भरी हुई हैं। इसी प्रकार के गीतों में से एक होली गीत है उसको देखिये।
खोलो किवाड़ चलो मठ भीतर/दर्शन दीजे माई अम्बे दुलसी रहो जी/दुलसी रहो घड़ी चार अम्बे दुलसी रहो जी
तिल का तेल, कपास की बाती/दर्शन दीजे माई अम्बे दुलसी रहोजी 

होल्यार जब लोगों के आंगन में पहुंच कर होली के खूब सारे गीत गाने के बाद विदा लेते हैं तो वे लोगों को खूब सारा आशीष देते हैं। आशीष के इन गीतों में बाल बच्चों की खुशहाली, समाज की खुशहाली, खेत-हल-बैल की खुशहाली के साथ अगले साल आने का वादा होता है। यह वादा ही होता है जो पूरे सालभर तमाम कठिनाइयों के बाद भी होल्यारों को जीवन जीने का संबंध देता है। ऐसे पलों में होल्यार खुद भी भावुक हो कर विदा लेते लेते गाते हैं-
गावे बजावे, देवे आशीषा/तुम हम जींवे लाखों बरिषा/ह्वे जाया नाती खैल्यूणा/रंगो में राजी रहो जी
राजी रहो मेरे खेल खिलाड्यों/अब आऊंगी दूसरे फागुन को.


(19 मार्च को लखनऊ से प्रकाशित दैनिक 'जनसन्देश टाइम्स' में प्रकाशित)


चुनाव


हमारे जन्म के लिए
नहीं दिया था हमने कोई प्रार्थना पत्र
न हिन्दू या मुसलमान बनकर
जन्मने के लिए
न स्त्री होकर जीने के लिए
न पुरुष होकर
न पंडित, ठाकुर या दलित होकर
जन्म लेने के लिए

न पूछा गया था हमसे
किस देश या राज्य में
लेना चाहते हैं जन्म
कौन सा धर्म पसंद है हमें
किसके रीति रिवाज, परम्परायें
निभाना चाहेंगे हम

बिना अपने चुनाव के इस जन्म को
उसी तरह जीने लगे हम
जैसे जीना तय किया सबने
सिवा हमारे
मन्त्र जपने थे
या पढनी थीं कुरान की आयतें
कहाँ पता था हमें

लेकिन मनुष्य तो हम होते ही
अगर बदल भी जाता
धर्म, जाति, देश, लिंग सबकुछ

धर्म अगर एक ही होता धरती का
जो न होतीं लकीरें सरहदों पर
या हम जन्मे ही होते सरहद पार
तो बदला होता न  सब कुछ
बदल जाती पहचान 
आस्थाएं, विचार

बस कि नहीं बदलता चोट लगने पर दर्द होना
और प्यार पाकर निहाल हो जाना

मुंह में ठूंस दिए गये नारे,
ताली बजाने को उठते हाथ
किसी झुण्ड के पीछे
दौड़ पड़ने का पागलपन
कुछ भी नहीं है हमारा खुद का

यह पागलपन बोया गया है
इस पागलपन से बचना
हो सकता है हमारा चुनाव

समझना होगा खुद ही
कि जन्म हमारा चुनाव नहीं
जीवन हमारा चुनाव हो सकता है
धर्म हमारा चुनाव न सही
संवेदना हमारा चुनाव हो सकती है
जाति हमारा चुनाव न सही
मनुष्यता हमारा चुनाव हो सकती है
जन्म भले हुआ हो धरती के किसी कोने पर
लेकिन पूरी धरती को प्यार करके
उसमें रच बस जाने का सपना
हमारा खुद का चुनाव हो सकता है

मोहरे बनकर सियासत की बिसात पर
नफरत फ़ैलाने को दौड़ते फिरने से बचना
हो सकता है हमारा चुनाव

हमारे यही चुनाव
होंगे जीवन के लोकत्रंत का उत्सव.

Sunday, March 17, 2019

बाद मुद्दत जो आज इतवार मिला


खोया हुआ एक झुमका मिला
जो जोड़े से बिछड़ कर उदास था कबसे

पीले दुपट्टे पर टंके सुनहरे घुँघरू मिले
जो तुमने तोड़ दिए थे यह कहकर
कि तुम्हारी आवाज ही है घुंघरुओं सी
दुपटट्टे में घुंघरू बेवजह ही तो हैं

बांस की वो पत्ती मिली
जो तुमने टांक दी थी जूड़े में
और मन बांसवारी हो उठा था

रूमाल में बंधा वो मौसम मिला
जिसमें भीगकर सूखते हुए हमने
देर तक देखा था बादलों का खेल

उदास रातों की नमी मिली
जिन्दगी में तुम्हारी कमी मिली

घर की सफाई में कुछ सामान मिला
बाद मुद्दत जो आज इतवार मिला.

Thursday, March 14, 2019

लोक के आख्यानों पर भी केन्द्रित हो हमारे व्याख्यान- जगमोहन चोपता


जगमोहन चोपता सामजिक सरोकारों से जुड़े युवा हैं. पहाड़ में रचे-बसे हैं. उनकी पैनी नजर और संवेदनशीलता नजरिये को विस्तार देती है. चूंकि वो जिया हुआ ही लिखते हैं इसलिए उनके लिखे में उनका जिया, महसूस किया हुआ आसानी से देखा और महसूसा जा सकता है. उनका यह आलेख 'सुबह सवेरे' अख़बार में थोड़ा सा सम्पादित होकर प्रकाशित हो चुका है. 'प्रतिभा की दुनिया' में यह समूचा लेख सहेजते हुए ख़ुशी है. - प्रतिभा 

हम संभवतः गांव की उन आखिरी पीढ़ी में से हैं जिन्होंने अपने बुजुर्गों से खूब सारे किस्से कहानी सुने हैं। हर मौके के लिये हमारे बजुर्गों के खजाने में ऐसे ही आख्यान भरे पड़े होते थे। ये आख्यान पिण्डर नदी के गोल पत्थरों की तरह खूब भारी, चमकीले और सुगढ़ होते हैं। ऐसे पत्थर जिन्होंने पिण्डर नदी के अथाह पानी को बहते देखा है। वर्षों से विपदाओं-आपदाओं से घिसटते-घिसटते जैसे ये पत्थर गोल हो गये हैं वैसे ही लोक की मौखिक परम्पराओं से आते-आते लोक अख्यान भी सुगढ़ और खूबसूरत हो गये हैं। इनमें जीवन जीने का सार है। ये किसी महादेश के संविधान की धाराओं, उपधाराओं, अधिकार, कर्तव्य और निति निर्देशक तत्वों की तरह लगते हैं। 

बस एक फर्क रहता है कि इन आख्यानों के खिलाफ जाने पर कोई दण्ड या अवमानना नहीं होती। लेकिन प्रकृति समय-समय पर अपना दण्ड किसी न किसी प्राकृतिक आपदा के रूप में जरूर देती रहती है। और तब-तब ये आख्यान अपनी सार्थकता और महत्व की ओर याद दिलाते हैं।

आज भी अचानक किसी घटना को देखते हुए ये मुझे लोक के आख्यान याद आ जाते हैं। ये आख्यान मुझे प्रकृति को देखने, समझने और उससे अतःक्रिया की तमीज देते हैं। इनका साथ होना चीजों को देखने समझने के नजरिये को भी देते हैं। ऐसे ही कुछ आख्यानों को आप से साझा कर रहा हूं।

गोपेश्वर से ऋषिकेश आते-जाते ऑल वेदर रोड़ का निर्माण कार्य को देखते रहता हूं। बड़े-बड़े बुल्डोजर पहाड़ को काटकर खूब चौड़ी रोड़ बना रहे हैं। पहाड़ की कटान से आये मलबे को जगह-जगह डंपिग जोन बनाकर डंप किया जा रहा है। आप अगर गौर करेंगे तो देखेंगे कि रोड़ की कटान से निकला अधिकांश मलबा ऐसे बरसाती गदेरों में उड़ेला जा रहा है। जिनमें आजकल बहुत कम पानी या कुछ जगह तो सिर्फ नमी बाकी है। लेकिन जब बरसात में इनमें रवानगी पर होते हैं तो इनमें खूब पानी होता है, तब क्या होगा? जब-जब में सड़क किनारे डंपिग 
जोन के बोर्ड देखता हूं तो मुझे कड़ाकोट चोपता क्षेत्र के बजुर्गों से सुनी कहानी याद आती है। 


एक पहाड़ी गदेरा जो बरसात में विशाल नदी की तरह हो गया है। बड़े अक्कड़ के साथ पिण्डर नदी से अपने बेटे के लिये रिश्ता मांगने जाता है। उसक रौद्र रूप और पानी की विशालता से पिण्डर नदी थोड़ा सकुचाती है। फिर सोचती है कि अभी अगर मना किया तो यह गदेरा उसको तहस-नहस कर सकता है। हां कर दूं तो ऐसे घमण्डी और बरसाती गदेरे के साथ उसकी बेटी कैसे रह गुजर करेगी। काफी सोच-विचार कर पिण्डर नदी कहती है कि आजकल तो बहुत पानी बरस रहा है और फुर्सत ही नहीं है इसलिये आप जेठ के महीने में आइयेगा। शादी खूब धूमधाम से करेंगे। जेठ में जब सारे बरसाती गदेरे सूख जाते हैं या उनका पानी इतना कम हो जाता है कि उनको गदेरा कहना ही बेकार है। ऐसे में जेठ आते ही गदेरा अपना सूखा सा मुंह लिये पिण्डर को ताकते रह जाता है। 

अब आप सोच रहे होंगे मैंने ये कहानी क्यों सुनाई। मैं चाहता हूं कि देशभर के जितने भी इंजिनियरिंग संस्थान हैं वहां के छात्रों को इस कहानी को जरूर सुनाना चाहिए। मेरी माने तो उनके कोर्स में इसको जितना जल्दी हो सके शामिल कर दीजिए। ताकि वे इसके मर्म को समझ पायें कि कोई भी बरसाती गदेरा बरसात में किसी नदी से ज्यादा विकराल हो सकते हैं। जब उन्हें ऐसे पहाड़ी इलाकों में कोई योजना तैयार करनी हो तो वे बरसाती गदेरे की ताकत का आंकलन कर अपनी योजना तैयार करें। अभी आप देख ही रहे होंगे कि ऑल वेदर रोड़ का पूरा मलबा ऐसे ही बरसाती गदेरों में डंप किया जा रहा है। इसका खामियाजा आने वाली बरसात में नदी और उसके किनारे के रहवासियों को भुगताना होगा। तब इसको प्राकृतिक आपदा नाम दिया जायेगा। जबकि यह लोक के उन आख्यानों की अवमानना का दण्ड है जो प्रकृति के नियमों के विपरीत आचरण के लिये मिलेंगे।

कुछ महीनों पहले मैं साथी ठाकुर नेगी के साथ फूलों की घाटी घूमने गया। खड़ी चढ़ाई हमको एक अलग दुनिया की ओर ले जा रही थी। वहां पेड़ों से छट कर आ रही धूप सहलाती रही थी। पेड़ों पर भांति-भांति की पक्षियों का कलरव रोमांचक संगीत जैसा था। पहाड़ी गदेरे से तेजी से बह रहे पानी से उपजा गीत हमको अलग लोक में होने का अहसास दिला रहा था। हम खड़ी चढ़ाई चढ़ते-चढ़ते इसका आंनद उठा ही रहे थे कि हैलीकैप्टर की गर्जना ने इस पूरे माहौल को ध्वस्त कर दिया। ऐसा लगा जैसे पूरी भ्यौंडार घाटी में कोई युद्ध हो रहा हो। ऐसे में हॉलीवुड की फिल्मों के तमाम दृश्य याद आ रहे थे। लगातार आज जा रहे इन दैत्याकार हैलीकैप्टर की गर्जना में हम ठगे से कहीं गुम हो गये।

वहां पर्यटकों और स्थानीय जनों से बातचीत की तो पता लगा कि इस तरफ किसी का ध्यान ही नहीं है कि इन गर्जना करने वाले यातायात के मंहगे साधन हैलीकैप्टर से यहां के जीव-जन्तुओं, पहाड़ों पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। हां उनके अनुभव जरूर कहते हैं कि अब इस घाटी में पहले की तुलना में पक्षियों का दिखना तेजी से साल दर साल घटता जा रहा है। पहले आपको खूब सारे जंगली जानवर पहाड़ी या गदेरों के किनारे पानी पीते दिख जाते थे जो अब काफी कम ही दिखता है।

ऐसे में मुझे अपने बजुर्गों से सुना किस्सा रह रह कर याद आता है। बुजुर्ग कहते थे कि जंगल में ज्यादा तेज आवाज में बोलना या गाना नहीं चाहिए। ऐसा करने से आंछरी (परियां) हरण कर लेती है। अपनी मौत के डर से जंगलों में चारा-पत्ती या जलावन के लिये जा रही महिलायें और पुरूष को धीरे-धीरे बातचीत या गीत गुनगुनाते थे। इस बात के पीछे जंगल की आंछरियों वाले डर को यदि छोड़ लिया जाय तो इस बात के मूल में जंगलों पर निर्भर इस समाज को वहां की जैविक संपदा और जंगल के पशु पक्षियों की फिक्र ज्यादा दिखती है। आदमियों की चीख पुकार से वे डर सकते थे। जंगल में पशु-पक्षियों का डरना उस क्षेत्र से पलायन का कारण हो सकता था। जिससे फूलों के परागण, नये बीज का इधर उधर बिखेरने की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। इससे जंगल बनने और बढ़ने की पूरी व्यवस्था भंग हो सकती थी।
इस किस्से को उन तमाम निर्माण कंपनियों के लिये तैयार हो रहे युवाओं को जरूर सुनाना चाहिए। ताकि वे बड़े-बड़े विस्फोटक से पहाड़ों को खत्म करने से पहले सोच पायें। उन तमाम हेली कंपनियों को अनुमति देने वाले अधिकारियों को जरूर सुनाना चाहिए ताकि वे बर्फिले या जैव विविधता वाले जंगलों के बीच स्थित चार धाम में हेलीकैप्टर की गर्जना के बजाय सहज और सुलभ यातायात का कुछ और रास्ता निकाल पायें।

आप कभी फूलों की घाटी घूमने जाओ तो रास्ते में भ्यूडार नदी के किनारे नदी के मलबे से दबे गांव को देख सकते हैं। किसी दौर में सौ सवा सौ घरों वाले इस गांव में हजार पन्द्रह सौ लोग रहते थे। नदी की बाढ़ के मलबे से यह आधा गांव दब गया। इस भयावह हादसे के बाद गांव के लोग दूसरी जगहों पर बसने को मजबूर हुए। 

क्या आप सोच रहे हैं कि इसको लेकर भी मैंने अपने बुजुर्गों से कुछ सुना है। यदि आप ऐसा सोच रहे हैं तो आप सही हैं। बुजुर्ग जब-तब कहते थे नदी का बासा कुल का नाशा। यानि नदी के किनारे बसना मतलब अपने कुल का नाश करना। पहाड़ में रिवर बेड ढ़ालदार होने के चलते नदियों का बहाव बहुत अधिक होता है। ऐसे में बरसात के समय नदियों का पानी बढ़ते ही वे किनारे की ओर अंधाधुंध कटाव करती है। नदियों के इस व्यवहार को देखकर ही पहाड़ के बुजुर्गों ने यह लोकोक्ति गढ़ी होगी। इस लोकोक्ति के गढ़ने और हम तक पहुंचने तक की यात्रा में न जाने कितने पहाड़ी गावों के तबाह होने के दर्दनाक अनुभव इसके अंदर समाहित हैं।

नदियों के किनारे अव्यवस्थित बसाहटों के चलते ही उत्तराखण्ड में हर साल हजारों की संख्या में लोग प्रभावित होते हैं। अगर इस आख्यान को हमारे नीति नियंताओं और हमारे राजनेताओं ने सुना और इस पर मनन किया होता तो वे केदार नाथ से लेकर पूरे पहाड़ की नदियों के किनारे बसने पर सख्त रोक लगाते। अगर वे ऐसा करते तो आपदा में केदारनाथ सहित पूरे पहाड़ में हजारों लोगों की जान को बचाया जा सकता था।

भौगोलिक चिंतन का इतिहास को देखे तो इसमें प्रकृति के साथ अन्तःकरण को लेकर तमाम विचार और विचारधाराओं की बात की जाती है। इनमें मुख्य रूप से तीन वाद दिखते है। मनुष्य जब प्रकृति के सानिध्य में था वह उसकी हर घटना के अनुरूप चलता था जिसे विद्यानों ने निश्चयवाद नाम दिया। मानव ने धीरे धीरे तकनिकी विकास के जरिये प्रकृति को अपने वश में करने की। इस कोशिश का परिणाम यह रहा कि उसने प्रकृति का अंधधुध दोहन किया और उसके दुष्परिणाम आज पूरा विश्व भुगत रहा है। आज भी इस तरह की कोशिशे जारी है। 

ऐसे दौर में भूगोलवेता ग्रिफिथ द्वारा सुझाए गए नवनिश्चयवाद का विचार दिया जिसे पर्यावरणीय निश्चयवाद भी कहा जाता है। पूर्णतः आश्रित और अंधाधुध दोहन के बीच नवनिश्चयवाद आज ज्यादा कारगर लगता है। यह सड़क के नियम की तरह रूको, देखो और जाओ जैसी बात है। यानि प्रकृति के साथ समन्वय जहां प्रकृति के विरोध में लग रहा है वहां रूक जाओ और जहां-जहां संभव हो और जो प्रकृतिसम्मत हो वहां काम करो। जिसमें प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर विकास की बात की जा रही है। ऐसा विकास जिसके केन्द्र में सिर्फ मानव नहीं है बल्कि उसके परिवेश में विद्यमान जीव जन्तु और वनस्पति भी है। 

आप इन तमाम आख्यानों को सुनने के बाद कहेंगे कि मेरा ये व्याख्यान तो विकास विरोधी है। पहाड़ को विगत दो दशकों से देखने समझने के अनुभव के आधार पर मैं इन बातों को कहने की कोशिश कर रहा हूं। मैं इस बात को कहने की कोशिश कर रहा हूं कि देश के हर गांव में विकास की किरण पहुंचनी ही चाहिए। लेकिन उस किरण को पहुंचने के रास्ते, साधन और प्रक्रिया क्या हो इस पर सोचा जाना चाहिए। यदि हम विकास को लेकर एंकाकी सोच में फंसे रहे और अन्य जगहों के विकास का मॉडल संवेदनशील पहाड़ों पर भी थोपते हैं तो आप विकास नहीं विनाश के बीज बो रहे हैं।

सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी होने के नाते में पूर्णविश्वास से कहता हूं कि लोक में व्याप्त इन आख्यानों को यदि हम अपने व्याख्यान या सीखने-समझने की प्रकियाओं का हिस्सा बनाना ही होगा। यदि हम ऐसा करते हैं तो हम आदिवासियों को उनकी जमीनों से खदेड़ने से पहले ठिठक पायेंगे। हम पहाड़ों को रौंदने वाले इस भवाहव विकास के पहिये को रोकर प्रकृति के साथ सामंजस्य करने वाले अन्य साधनों की ओर देख पायेंगे या खोज पायेंगे। ऐसा करना समय के साथ-साथ इस धरती और यहां के रहने वाले तमाम जीवधारियों के हित में होगा। वरना हम विकास के ऐसे शिखर पर होंगे जहां मानव तो होंगे लेकिन मानवता कहीं नहीं दिख रही होगी।

Tuesday, March 12, 2019

कुछ पैगाम भेजे हैं



फागुनी खुशबू
आम की बौर की बौराहट के साथ
आवारगी के तमाम राग भेजे हैं

नीले पंखों वाली चिड़िया
की आवाज भेजी है
लड़कपन के तमाम सवाल भेजे हैं

साईकल की उतरी हुई चेन
और हाथों में सनी ग्रीस के निशान भेजे हैं
तुम्हारे पीछे भागने की मेरी इच्छा
और तुम्हारे ढूँढने पर छुप जाने के
शरारती खेल भेजे हैं

उतरती शाम के साए तले
अजनबी रास्तों में खो जाने के
ख्वाब भेजे हैं

तुम्हारी कलाई में रक्षा धागे की जगह
खुद को बाँध देने के ख्याल भेजे हैं

मोहब्बत भरे कुछ सलाम भेजे हैं

तुम्हारी उदास आवाज के नाम
कुछ पैगाम भेजे हैं


Wednesday, March 6, 2019

वो शाम अब तक ढली नहीं है


एक रोज जब 
तुम्हारे क़दमों की 
लय से लय मिलाते मेरे कदम 
तय कर रहे थे 
जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफर 
तो आसपास खिल उठा था 
मुस्कुराहटों का मौसम 

वो शाम अब तक ढली नहीं है
वो लम्हे अब तक महक रहे हैं.



Monday, March 4, 2019

बिना तुम्हारी मर्जी


बहुत चुपके से
बैठ जाता है वो
एकदम करीब आकर

पूछता नहीं तुम्हारी रज़ा
न देखता है उम्र
न समय, न हालात

वो जानता है कि तुम्हें
नहीं था उसका इंतज़ार न
बल्कि चिढ़ते ही थे तुम
उसके जिक्र से

फिर भी वो तुम्हारे काँधे से लगकर
एकदम सटकर बैठ जाता है
सामने डूबता सूरज
उगने लगता है तुम्हारे भीतर
कि तुम्हारी पूरी दुनिया बदलने लगती है

डरी सहमी आँखों में साहस तैरने लगता है
उदासी बाँधने लगती है पोटली
लौट आती हैं तमाम
अधूरी ख़्वाहिशें

तुम्हारी 'हाँ' या 'न' की परवाह किये बगैर
वो आता है और
चला जाता है तुम्हें साथ लेकर

हाँ, बिलकुल इसी तरह आता है प्रेम
और ठीक इसी तरह आती है मृत्यु।





Saturday, March 2, 2019

फिर खिले उम्मीद की कोई शाख...


मृत्यु बाहर नहीं घटती, भीतर घटती है. बाहर शोक का शोर घटता है जो एक लय में बढ़ता जाता है फिर शांत होकर सो जाता है. शोर जितना अधिक होता है, शोक उतना क्षीण। इन दिनों शोर बहुत है, मृत्यु का शोक. पूरा देश शोक में है, शोर में भी. शोक को शोर में बदल देने का पूरा कारोबार है. जो शोर में हैं वो दूसरों से पूछते हैं, तुम शोक में नहीं हो? यानी तुम्हें दुःख नहीं? कैसे इंसान हो तुम, इतना कुछ गुजर गया तुम्हें दुःख ही नहीं. लेकिन वो जो शोक में हैं वो शोर में होना नहीं जानते, जानना चाहते भी नहीं. दुःख हमेशा आंसुओं से बड़ा होता है, बहुत बड़ा. मैं शोक और शोर के द्वंद्व के बीच के फासलों को देख रही हूँ.

मैंने इस बरस बहुत सारी मृत्यु को आसपास देखा है. सालों मंडराने के बाद एक दिन चुपके से घट जाते हुए. उसके मंडराने का शोर घट जाने के साथ ही शांति में बदलते देखा है. खुद को नन्हे-नन्हे फिल्म या धारावाहिक के दृश्यों पर सिसकने से न रोक पाने वाली मैं मृत्यु के पलों में बुत ही रही हूँ हमेशा. फिर लम्बा समय गुजर जाने के बाद उस शोक को किसी सूनेपन में टूटते महसूस भी किया है. अजब है न सब. पर सच है. मृत्यु भीतर घटती है, शोक भी भीतर ही घटता है और शोक से लड़ने का साहस भी भीतर ही. फिर बाहर क्या है आखिर? 

मृत्यु ही नहीं जीवन भी भीतर ही घटता है, अन्तस में, भावनाओं के सबसे निजी कक्ष में. बाहर जीवन का विस्तार है, सुख की दशा में ख़ुशी से नाचती बूँदें, दुःख की दशा में प्रकृति का विलाप लगने लगती हैं. जब सब कुछ भीतर है तो इस भीतर के परिमार्जन की कोई बात क्यों नहीं। क्यों बाहर शोर का इतना सारा कचरा है?

अभी हाल ही में एक साथ में काम करने वाले साथी ने अपना जीवन साथी खोया है. कुछ दिन भीतर बाहर का शोर उछाले लेता रहा. भीतर घटती मृत्यु को जीवन में बदल पाने के प्रयास चलते रहे लेकिन मृत्यु घट चुकी थी. साथी जा चुका था. सरहद पर भी बहुत सारी मृत्यु घट रही है, शोर चिता की लपटों के साथ सिमट  जाता है बचता है सिर्फ शोक. गहन शोक. यह शोक शोर से डरता है. संवेदना के शब्दों से घबराता है. 

बाहर बारिश हो रही है. मुझे नहीं पता कि उस गहन शोक में अपने अन्तस के सूनेपन को कोई कैसे संभाल रहा होगा. मुझे नहीं पता कि दुनिया के किसी भी शब्दकोश में ऐसा कोई शब्द है जो भीतर घटते रुदन, अकेलेपन और शोक पर मरहम की तरह रखा जा सके. सबको अपने युद्ध खुद लड़ने हैं, अपना शोक खुद अपने कंधे पर उठाना है. फिर शोर क्यों बरपा है आखिर? 

देश और पड़ोस में कोई फर्क नहीं. दुःख जहाँ है वहां कोई शोर पहुँच नहीं सकता और शोर जहाँ है वहां दुःख कैसे टिकेगा भला? किसी के दुःख का, किसी के प्रेम का, संवेदना का हिसाब माँगना अश्लील है. सच में दुःख में डूबा व्यक्ति न किसी से हिसाब मांगेगा और न ही कोई हिसाब दे सकेगा. 

बाहर बारिश की बूँदें टूट रही हैं, भीतर टूट रहा है मन आहिस्ता आहिस्ता. दुआ है कि जो जहाँ है अकेला, उदास वहां शक्ति का जन्म हो. उसके भीतर फिर खिले उम्मीद की कोई शाख.