Saturday, February 9, 2019

उगना बसंत का





एक कवि को उसकी कविता के लिए
भेज दिया जाना सीखचों के पीछे
खुलना है उम्मीदों की पांखे
कि बची है कविता में कविता
और भागते-दौड़ते जिस्मों में
बची ही जिन्दगी भी

नजरबंद किया जाना लिखते-पढ़ते लोगों को
ऐलान है इस बात का कि
नज़राना हैं ऐसे खूबसूरत लोग दुनिया के लिए
कि उनमें बचा है हौसला
सच लिखने का

गुम हुए युवा बेटे को ढूंढती माँ की धुंधलाती नज़र
उसे मिलने वाली धमकियां
सड़कों पर मिलते धक्के
बताते हैं कि कितना डरा हुआ है
सत्ता का चेहरा
और उतना ही है बेनक़ाब भी

परोसी गयी हर बात पर भरोसा करती
बिना सोचे समझे व्यक्ति से भीड़ बनती
और क्रूर खेल में शामिल होती जनता
गवाही है इस बात की
कि शिकार वही है सबसे ज्यादा
उसी सत्ता की जिसके वो साथ है

अपना ही मजाक उड़ाते चुटकुलों को फॉरवर्ड करती
उड़ाती अपना ही परिहास
कैद करती खुद को खुद की मर्जी से
त्याग, समर्पण और देवी जैसे शब्दों के कैदखानों में
ये स्त्रियाँ
सदियों पुरानी पितृसत्ता की साजिश का आईना हैं

इन सबके बीच
पंछियों का लेना बेख़ौफ़ ऊंची उड़ान
बच्चों की आँखों से छलकना उम्मीद
उनका यकीन करना प्रेम पर
मानना बसंत का उत्सव
उगना है बंजर ज़मीन पर नन्ही कोंपलों का...

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (11-02-2019) को "खेतों ने परिधान बसन्ती पहना है" (चर्चा अंक-3244) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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बसन्त पंचमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Anita saini said...

बहुत सुन्दर सृजन
सादर