Wednesday, October 3, 2018

उम्मीद यहीं कहीं है



उस रोज मैं देहरादून के एक इंटर कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ कुछ बातचीत कर रही थी. दूरस्थ इलाके के इस इंटर कॉलेज में बच्चे कई कई किलोमीटर की पहाड़ियों से उतर कर आते हैं और प्रिंसिपल सर इस बात के मर्म को समझते हैं इसलिए भरपूर कोशिश करते हैं कि बच्चों की पढ़ने की इच्छा के चलते इतने दूर चलकर आने को ज्यादा से ज्यादा सम्मान कैसे दिया जाय, कैसे बच्चों के समय व पढ़ने की इच्छा को भरपूर खुराक दी जाय. इसी बाबत यहाँ शिक्षक साथियों के साथ हर महीने अकादमिक चर्चा की शुरुआत हुई है.

उस रोज भी हम उसी बाबत बात कर रहे थे जब किसी कोचिंग संस्थान के दो साथी वहां आये. प्रिंसिपल सर ने उनकी बात को ध्यान से सुना। उन कोचिंग वाले लोगों ने अपना प्रोजेक्ट बताया कि इंटर पास करने के बाद बच्चों का एक टेस्ट लेंगे और जो टॉपर्स होंगे उनके लिए फ्री कोचिंग की सुविधा होगी. प्रिंसिपल सर ने बहुत धैर्य के साथ उनकी बात सुनते हुए कहा कि क्या आप जानते हैं ये बच्चे कहाँ से आते हैं. कितनी दूरी तय करके, कितना पैदल चलकर, किन पहाड़ी ऊबड़ खाबड़ रास्तों से? इन बच्चों के लिए यहाँ कॉलेज आना ही इतना मुश्किल है ये आपकी कोचिंग कैसे पहुँचेंगे भला. लेकिन इससे इतर एक बात मेरे मन में चल रही थी कि जो बच्चे सिलेक्ट नहीं होंगे उनके लिए क्या? यही बात प्रिंसिपल सर ने कहकर मेरे मन का बोझ हल्का कर दिया.

सारी दुनिया टॉपर्स सिलेक्ट कर रही है, सबके सिलेक्शन का क्राईटरिया नामी कॉलेज अच्छे मार्क्स ही हैं. तो फिर उनका क्या जिनके सामान्य नंबर आते हैं. जो सिलेक्ट होते होते रह जाते हैं, या जो इस रेस में बहुत पीछे छूट जाते हैं, कुछ तो डर के मारे इस रेस में दौड़ते भी नहीं. क्या कोई ऐसी कोचिंग या संस्था है जो पूछती हो कि जिन बच्चों को सीखने में दिक्क्त है उनके लिए हम हैं न? जो सिलेक्ट नहीं होते हम उनका ही हाथ थामेंगे कि सिलेक्टेड लोगों के साथ तो दुनिया है ही. क्या कोई ऐसी कंपनियां हैं या कभी होंगी जो चुनकर ले जाती हों हिम्मत हारे, मुरझाये लेकिन प्रतिभाशील लोगों को इस भरोसे कि वो उनके हुनर को निखार लेंगे।

सचमुच ये अच्छे नंबरों की दौड़ ने हमारा सबसे कीमती सामान हमारे भीतर का पानी छीन लिया है. उस रोज प्रिंसिपल सर की यह बात सुनकर कि उन बच्चों का क्या जो सिलेक्ट नहीं होंगे, हमारे लिए तो वो भी उतने ही अज़ीज़ हैं, बहुत अच्छा लगा. हम कितना ही प्राइवेटाइज़ेशन की ओर भाग लें लेकिन उम्मीद सरकारी स्कूलों की ओर से ही खुलती नज़र आती है जहाँ शिक्षक हर बच्चे के साथ निजी जुड़ाव के साथ काम कर रहे हैं और किन्ही कारणों से पीछे छूट गए बच्चों के पीछे खड़े होते हैं, उनके सर पर हाथ फेरते हुए कहते हैं कि मैं हूँ न! उस एक लम्हे में बच्चों की आँखों में जो चमकता है न पानी वही उम्मीद है!

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (05-10-2018) को "छिन जाते हैं ताज" (चर्चा अंक-3115) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी said...

उम्मीदें मरनी नहीं हैं उम्मीदें जिंदा रहनी चाहिये कोई देखने वाला नहीं रहेगा तो तमाशे बेकार हैं।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन देश की दूसरी महिला प्रशासनिक अधिकारी को नमन : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...