Thursday, October 25, 2018

कोई हमें सताये क्यों


दिल ही तो है न संग-ओ-ख़ीश्त दर्द से भर न आये क्यों 
रोयेंगे हम हज़ार बार कोई हमें सताये क्यों 

दैर नहीं हरम नहीं दर नहीं आस्ताँ नहीं 
बैठे हैं रहगुज़र पे हम गैर हमें उठाये 

क्यों क़ैद-ए-हयात-ओ-बन्द-ए-ग़म अस्ल में दोनों एक हैं 
मौत से पहले आदमी ग़म से नजात पाये क्यों 

'ग़ालिब"-ए-ख़स्ता के बग़ैर कौन से काम बन्द हैं 
रोइये ज़ार-ज़ार क्या कीजिये हाय-हाय क्यों.

- ग़ालिब 

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

स्व जगजीत सिंह ने प्राण फूँके हैं गालिब की इस गजल में।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (27-10-2018) को "पावन करवाचौथ" (चर्चा अंक-3137) (चर्चा अंक-3123) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बहुत बढ़िया

Onkar said...

बहुत खूब