Wednesday, September 12, 2018

फेवरेट सिनेमा- कभी अलविदा न कहना


'कभी अलविदा न कहना' जाने क्यों यह फिल्म मुझे काफी अच्छी लगी थी जबकि स्टार फेवरेज्म बिलकुल नहीं है इसका कारण.यह फिल्म रिश्तों के उन पेचोखम को खोलती है जो बेहद बारीक़ हैं और जिन पर समाज अभी भी ठीक से बात नहीं करता. शादी होती है क्योंकि शादी होनी होती है. प्यार वही है जैसा फिल्मों में देखा, किताबो में पढ़ा या दोस्तों से सुना. यह फिल्म इस देखे सुने के पार जाने का प्रयास करती है.

कोई बहुत अच्छा होगा तो उससे प्यार हो ही जायेगा यह भला किस तरह संभव है ठीक उसी तरह जैसे किसी से प्यार न होने का कारण उस व्यक्ति का बुराइयों से भरा होना भी क्यों जरूरी है. दो बहुत अच्छे लोगों में भी सब कुछ अच्छा, ठीक तथाकथित आदर्श होते हुए भी प्रेम का एलिमेंट मिसिंग हो सकता है लेकिन इस मिसिंग होने की समझ न तो व्यक्तियों में है न समाज में. अगर किसी से अलग होना है तो उसकी हजार कमियां सामने रखनी होती हैं और किसी का हाथ थामना हो तो उसकी हजार अच्छाईयां.जबकि मन का बावरा पंछी उस डाल पर जाकर भी बैठ सकता है जिसके फल उसे पसंद न हों. इस फिल्म में किसी को हीरो किसी को विलेन नहीं बनाया गया. शादी के पक्ष में बेमतलब के तर्क नहीं रखे गये. बस नहीं है तो नहीं है प्यार शादी में. कोई जबरदस्ती है क्या कि होना ही चाहिये क्योंकि पति अच्छा कमाता है, गुड लुकिंग है, केयरिंग है या पत्नी सुंदर है, डायनमिक है, इसी चश्मे से लोगों को, रिश्तों के देखने वाले समाज के लिए इस फिल्म को हजम करना आसान नहीं हुआ था.

यह फिल्म संवेदनशील होने वाले उस चश्मे से भी धूल पोछती है जहाँ हम अतिरिक्त केयर करके या ख्याल रखके भी एक अनमना सा बोझ डालते हैं साथी पर और अपने भीतर अनजाना सा सुपिरियटी कॉम्प्लेक्स पाल लेते हैं.

उस वक़्त भी इस फिल्म पर काफी बवाल हुआ था. हमने अख़बार में इस पर लम्बे समय तक परिचर्चा भी चलाई थी. बवाल होता भी क्यों न कि अच्छा घर, नाक नक्शा, खानदान, सैलरी देखकर रिश्ते तय करने वाला समाज जो है यह. और शादी के बाद कितनी भी सडन, घुटन, पीड़ा क्यों न हो भीतर शादी के फ्रेम को चमका कर रखने वाला समाज जो है यह. इस फिल्म ने मेरे लिहाज से इस तरह सोचने, देखने और महसूस करने की स्पेस की बात की थी.2006 में आई करन जौहर की इस फिल्म का संगीत भी अच्छा था.



2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

क्या कहें बहुत कम फिलम देखते हैं पर ये देखी जैसी याद आ रही है और यादों का क्या करें वो भी फिलम की याद का ? महसूस होना भी कम होने लगा है आजकल देख देख के फिलम अपने सामने सामने होती हुई। 2006 12 साल पहले की ही तो बातें हैं।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (14-09-2018) को "हिन्दी दिवस पर हिन्दी करे पुकार" (चर्चा अंक-3094) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हिन्दी दिवस की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'