Friday, May 11, 2018

और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.


जिन्दगी में किसी ख़ुदा की जरूरत नहीं. ख़ुदा आया भी अगर तो दोस्त की तरह. साथ में चाय पी, गप्पें मारीं, एक दूसरे से गिले शिकवे किये लेकिन सजदे नहीं किये. क्योंकि मोहब्बत में या दोस्ती में हम सज़दे करते थकते नहीं, लेकिन किसी की ख़ुदाई के आगे घुटने कभी टेके नहीं. जो टेके होते तो जीवन शायद थोड़ा आसान हुआ होता. यानि जीवन का यूँ पेचीदा होना खुद चुना है और इस चुनाव पर फ़ख्र है. तो ऐ दुनिया के ख़ुदाओं, खुद को ख़ुदा समझने वालों, दोस्त बनकर ख़ुदा में तब्दील होने वालों, पतली गली से निकल लो क्योंकि हम मोहब्बत के सजदे में हैं.

दोस्त बन-बन के मिले, मुझको मिटाने वाले,
मैंने देखे हैं कई रंग जमाने वाले.

मैं तो इखलाक़ के हाथों ही बिका करता हूँ
और होंगे तेरे बाज़ार में बिकने वाले.

3 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

कुछ बिकने के लिये ही होते हैं बिकते चले जाते हैं
कुछ बिकना चाहते हैं कोई खरीदना नहीं चाहता है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (13-05-2018) को "माँ के उर में ममता का व्याकरण समाया है" (चर्चा अंक-2969) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Kavita Rawat said...

अपना मार्ग खुद न चुना तो किया जिया, असल में जीते वही है जो खुद अपना रास्ता बनाकर चलते हैं
बहुत सुन्दर