Sunday, April 1, 2018

सुकून नहीं संभलता


विरह संभल जाता है, दुःख संभल जाता है, मुश्किलें पार हो जाती हैं लेकिन वो एक लम्हा जो दिल से दिल की राह लेता हुआ आँखों में जा बैठता है वो संभाले नहीं संभलता. वो एक हाथ जो ठीक उस वक़्त काँधे पर महसूस होता है जब आप तन्हाइयों के रसातल में डूबते जा रहे हों उस हाथ की छुअन का जादू नहीं संभलता. इंतजार संभल जाता है, बाट जोहना संभल जाता है, महबूब की एक नज़र नहीं संभलती,आंसू संभल जाते हैं, पीड़ा की तो जैसे आदत सी हो चली हो, लेकिन राहत भरा एक पल का साथ नहीं संभलता. दूर देश बैठे किसी की याद में होने वाली आवाजाही नहीं संभलती, उस देश की हवाओं में घुलकर आने वाली सांसों की जुम्बिश नहीं संभलती, चौदस का चाँद संभल जाता है, रातरानी की खुशबू संभल जाती है, दोस्त की हथेलियों में हथेलियाँ छुपा देना और चुपचाप साथ चलते जाने का सुख नहीं संभलता...

मौसम अंगड़ाई ले रहा, जागती हुई रात का जादू सांसें ले रहा है, इश्क़ शहर में नन्हे से ख़्वाब को सर्द हवाओं ने आ घेरा है, जिसे गर्म साँसों की चादर में सुकून है...ये सुकून नहीं संभलता. सच्ची.

(इश्क़ शहर, मुद्दत बाद मिला इतवार)

6 comments:

kuldeep thakur said...

जय मां हाटेशवरी...
अनेक रचनाएं पढ़ी...
पर आप की रचना पसंद आयी...
हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
इस लिये आप की रचना...
दिनांक 03/04/2018 को
पांच लिंकों का आनंद
पर लिंक की गयी है...
इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (03-04-2017) को "उड़ता गर्द-गुबार" (चर्चा अंक-2929) पर भी होगी।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Sudha Devrani said...

बहुत सुन्दर...

शुभा said...

वाह!!बहुत खूब ।

Meena Sharma said...

एक एक पंक्ति गहरे जज्बातों से निकली हुई....

Tejkumar Suman said...

बहुत सुन्दर ।