Saturday, April 21, 2018

पढ़ती हूँ उनकी चुप

पढ़ती हूँ उनकी चुप जो रहते हैं आस पास
दीखते हैं अक्सर हँसते हुए सहज से
कभी-कभार चुप हो जाते हैं
फिर लौट आते हैं सहजता ओढ़कर

पढ़ती हूँ उनके भीतर की उथल-पुथल
जिसे भीतर दबाये वो जुटे हैं
इस देश, इस समाज को बेहतर बनाने में

वो देश जो अब उन्हें अपना मानने से इंकार करने लगा है
वो देश जिससे उन्हें भी है उतना ही प्यार
जितना है हम सबको
लेकिन उनका देश प्रेम संदिग्ध हो गया है अचानक
उन्हें प्रमाण देना होता है पल-पल
अपनी देशभक्ति का
उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाने को मजबूर किया जाता है
जबकि वो असल में नहीं लगाना चाहते
किसी भी देश या व्यक्ति के खिलाफ नारे
कि नफरत से नफरत को कैसे जीत सकता है कोई

गलती से भी पाकिस्तानी गायक, खिलाड़ी या साहित्य
की तारीफ़ से उन्हें सायास बचना होता है
उन्हें किराये के मकान आसानी से नहीं मिलते
यात्राओं में उनकी जांच ज्यादा मुस्तैदी से की जाती है

वो फेसबुक, ट्विटर पर कुछ लिखने से बचते हैं
बच्चों को जल्दी से सुला देते हैं
बीवी की आँख में छाए डर का सामना नहीं कर पाते
किसी किताब में गड़ा देते हैं आँखें

गुझिया और सिंवई का स्वाद साथ में लेते हुए
बड़े हुए थे जिन दोस्तों के साथ
उनके हाथ अब कंधे पर महसूस नहीं होते

पढ़ती हूँ उनके भीतर का संसार
जिसे वो लिख नहीं पायेंगे कभी
जिसे छुपाने के लिए वो मुस्कुराते रहेंगे आसपास ही.

Saturday, April 14, 2018

हरसिंगार सी झरती है फिल्म 'अक्टूबर'


सामने स्क्रीन पर क्या चल रहा था, क्या नहीं, पता नहीं लेकिन देह पर हरसिंगार झरते से महसूस हो रहे थे. बेहद कड़वे मन, कसैले समय में किसी फिल्म का रुख करना असल में खुद को निजात देने की कोशिश करने जैसा था. कुछ भी नहीं पता था फिल्म अक्टूबर के बारे में सिवाय शुजीत सरकार के. जैसा मेरा मन उलझा हुआ था वैसी ही उलझी हुई सी फिल्म शुरू हुई. फिल्म का मुख्य किरदार ('नायक' कहने का मन नहीं कर रहा कि शुजित ने उसे नायक की तरह गढ़ा भी नहीं है) भी उलझा हुआ ही दिखा. यूँ लगा परदे पर अपने भीतर की बेचैनी को देख रही हूँ. कौन सी बेचैनी, कैसी उलझन? पता नहीं.

वो उलझनें बहुत आसान होती हैं जिनके बारे में हम स्पष्ट होते हैं, जो सामने से दिखती हैं लेकिन उनका क्या जो खुद को ही समझ में नहीं आतीं. लेकिन हर वक्त परेशान करती रहती हैं, चैन से रहने नहीं देतीं. न दोस्त समझ पाते हैं, न घरवाले. कहाँ से समझेगा कोई जब खुद को ही कुछ समझ नहीं आता बस कि जो जैसा है, वैसा मंजूर नहीं होता. दीवार पर जोर से मुक्का मारने का जी चाहता है, बीच सड़क पर जोर से चिल्लाने का या तौलियों को जूतों से कुचलने का.

डैन (वरुण धवन) ऐसी ही उलझनों से गुजर रहा है. रोज डांट खाता है, हर काम में गलती करता है जिसका उसे कोई अफ़सोस नहीं. दोस्त उसका साथ तो देते हैं, समझ नहीं पाते. इन्हीं उलझनों के दरमियाँ जिन्दगी एक नया पन्ना खोलती है, बिलकुल अनपेक्षित. उसके साथ काम करने वाली उसकी सहयोगी (ठीक से दोस्त भी नहीं) एक भयानक एक्सीडेंट का शिकार हो जाती है और कोमा में चली जाती है.

अस्पताल, नर्स, डाक्टर, महंगे बिल, उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच की जंग और डैन. फिल्म बहुत धीरे-धीरे आगे बढती है बिलकुल उसी तरह जैसे सरकता है बुरा वक़्त धीरे-धीरे. व्यवहारिक होने न होने की तंग गलियों से गुजरते हुए, हर बात को लॉजिक के लेंस से देखने और न देखने के फासले को साफ़ करते हुए फिल्म जिन्दगी के बेहद करीब जाती नज़र आती है.

दुःख तब दुःख नहीं लगता जब आप उसे स्वीकार कर लेते हैं कि हाँ यह तो है फिर उससे लड़ते हैं प्यार से, दुश्मनी से नहीं. मुश्किल वक्त में भीतर की ताकत को समेटा कैसे जाता है, कैसे उसमें रंग भरे जाते हैं यह निर्देशक शुजीत सरकार और फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी ने सलीके से परदे पर रचा.

वरुण धवन के दीवानों को शायद इसमें उनका वरुण धवन न मिले लेकिन जो मिलेगा वो उन्हें हैरत में डाल देगा. वनिता संधू पहली फिल्म में ही दिल जीत लेती हैं और गीतांजली राव की अदाकारी भी आपका हाथ थाम लेती है. यह फिल्म दिल में उतरने वाली फिल्म है, बहुत धीरे-धीरे, जैसे उतरते हैं हरसिंगार के फूल शाखों से और जैसे घेरती है उनकी खुशबू. देर तक असर रहने वाला है फिल्म का. इसे देखते हुए रिल्के याद आते रहे, 'अगर तुम्हारे जीवन में अब तक जाने हुए दुःख से (वो अवसाद कहते हैं) बड़ा दुःख गुजर रहा है, तो तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए बल्कि जीवन का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है.'

कैमरे का  काम यानी सिनेमेटोग्राफी, बैक ग्राउंड म्यूजिक, कम, छोटे और प्रभावी संवादों ने फिल्म को खास बनाया है. फिल्म सिनेमा हॉल में छूट नहीं जाती, साथ चली आती है न जाने कब तक साथ रहने को जैसे साथ चलती रहती है कोई कविता, किसी नदी की नमी, किसी पेंटिंग की लकीरें, उसके रंग.

यह अक्टूबर हर महीने में घुल जाएगा.

Friday, April 13, 2018

मुझे तेज़ धार वाली कवितायें चाहिए


मुझे तेज़ धार वाली कवितायें चाहिए
जिनके किनारे से गुजरते ही लहूलुहान हो जाए जिस्म
जिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगे
सब कुछ सह लेने वाला सब्र

मुझे ढर्रे पर चलती जिन्दगी के गाल पर
थप्पड़ की तरह लगने वाली कवितायें चाहिए
कि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवन
और आखिर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चाल

मुझे बारूद सरीखी कवितायें चाहिए
जो संसद में किसी बम की तरह फूटें
और चीरकर रख दें बहरी सरकारों के
कानों के परदे

मुझे बहुत तेज़ कवितायें चाहिए
साँसों की रफ़्तार से भी तेज़
समय की गति से आगे की कवितायें
हत्यारों के मंसूबों को बेधती कवितायें
और हो चुकी हत्याओं के खिलाफ
गवाह बनती कवितायें

मुझे चाहिए कवितायें जिनसे
ऑक्सीजन का काम लिया जा सके
जिन्हें घर से निकलते वक़्त
सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सके
जिनसे लोकतन्त्र को
भीड़तंत्र होने से बचाया जा सके

मुझे चाहिए इतनी पवित्र कवितायें कि
उनके आगे सजदा किया जा सके
रोया जा सके जी भर के
और सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सके

मुझे चूल्हे की आग सी धधकती कवितायें चाहिए
खेतों में बालियों सी लहलहाती कवितायें चाहिए
मुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कवितायें चाहिए
भोली गिलहरी सी फुदकती कवितायें चाहिए


मुझे इस धरती पर मनुष्यता की फसल उगाने वाली कवितायें चाहिए.

अपना हक छीन लेने वाली कवितायें चाहिए

मुझे स्थिर तालाब में
एक शरारती बच्चे द्वारा फेंकें गए कंकड़
सरीखी कवितायें चाहिये
जो स्थिरता को भंग कर दें

हाथ से छू जाए तो लहू रिसने लगे
ऐसे सीसे से सने मांझे सी कवितायेँ चाहिए.
अपने हक के लिए सदियों तक धरने पर बैठने वाली नहीं
उठकर अपना हक छीन लेने वाली कवितायें चाहिये

रोजमर्रा की ऊब भरी जिन्दगी से टकराने वाली
रोज नए रास्तों की तलाश करने वाली कवितायें चाहिए
सरहदों पर खिंची सीमाओं को मिटा देने वाली
सत्ताओं को औंधे मुंह गिरा देने वाली कवितायें चाहिये

मुझे बच्चों के बस्तों में छुपाकर रखी गयी कॉमिक्स सी कवितायें चाहिए
बिना पुकारे तुम तक पुकार बनकर पहुँच जाने वाली कवितायें चाहिये

मुझे शरद के कंधे से टिककर
दूर कहीं गुम हो जाने वाले रास्तों को
ताकती कवितायें चाहिए
तुम्हारी याद की तरह
अदरक वाली चाय में घुल जाने वाली कवितायें चाहिए.

Thursday, April 12, 2018

पुलिस, पुजारी और देश


जब कुछ भी नहीं पता था देश और समाज के बारे में. कानून और अपराध के बारे में. नहीं पता था धर्म का काम क्या है, कैसा होता है आस्थाओं का चेहरा, कि पुलिस किसे बचाती है, किससे बचाती है. (और वक़्त आने पर पुजारी और पुलिस से कौन बचाता है ) बहुत कम उम्र की एक छोटी सी बच्ची को तब से डर लगता था पुलिस और पुजारी दोनों से.

मंदिर में जाती तो प्रसाद देने वाला पुजारी को कभी प्रेम से, भक्तों को सम्मान से देखते हुए, कभी उनसे इंसानों की तरह पेश आते नहीं देखा. प्रसाद लेने के लिए जो लाइन लगा करती थी उसमें अपना नम्बर आते-आते वो लड़की डर से कांपने लगती थी बावजूद इसके कि साथ होते थे तमाम घरवाले, फिर भी. मोटे तोंद वाले पहलवान नुमा पुजारी ने उसके ठीक पहले वाली औरत को डांट दिया था. किसी तरह अपना नम्बर आते ही बेहद सावधानी से अपनी नन्ही हथेलियाँ प्रसाद लेने के लिए बढ़ा दिया करती थी. इतनी सावधानी से कि पुजारी की उँगलियाँ छू न जाएँ कहीं. टीका लगाते वक़्त कहीं पीठ पर हाथ न फेर दे पुजारी. एक बार आशीर्वाद देते हुए सर पर रखा हाथ उसकी पूरी पीठ पर फिसलता गया था, कई महीनों तक अंगारों सी दहकती रही थी उसकी पीठ. हालाँकि उसे नहीं बताया गया था 'बैड टच' के बारे में.

वो अख़बार नहीं पढ़ती थी, टीवी उन दिनों हुआ नहीं करते थे फिर कैसे उसके मन में पुलिस के प्रति इतना भय भर गया. पुलिस को देखते ही भीतर तक सहम जाया करती थी. माँ के पीछे छुप जाया करती थी लेकिन माँ से इस बारे में कुछ कह नहीं पाती थी. एक बार रेलवे स्टेशन पर एक पुलिसवाले को देखकर वो इतना डर गयी थी कि कई दिन तक उसे बुखार रहा. कोई नहीं समझ पाया था कि वो डर उस पुलिसवाले की उन नज़रों से उपजा था जो दूर से उसे देख रही थीं, और अश्लील तरह से मुस्कुरा रहा था वो. हालांकि किसी ने नहीं बताया था उसे सच्ची और झूठी मुस्कुराहटों के बारे में, अच्छी और बुरी निगाहों के बारे में.

आज समूचा देश पुलिस और पुजारियों की गिरफ्त में है. इतना अँधेरा है चारों ओर, इतना खौफ़. रास्ता कोई नहीं. और यह कोई दुर्घटना नहीं है, इस अँधेरे को बाकायदा उगाया गया है, बोया गया है. हम समझ क्यों नहीं पाते कि हमारे खिलाफ हमें ही इस्तेमाल किया जा रहा है सदियों से.


Thursday, April 5, 2018

मारीना मेरा पहला प्यार

जिसे आप प्यार करते हैं उस पर लिखना मुश्किल होता है. इसी मुश्किल के कुछ हिस्से 'समास 16' में प्रकाशित हुए हैं. यह शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक के अंश हैं. मुझ तक इन अंशों को पढने के बाद प्रतिक्रियाएं तो पहुँचती रहीं लेकिन पत्रिका जाने कैसे रास्ते भटकती रही, मुझ तक पहुंची नहीं. आखिर एक सैलानी काम आया, संजय सैलानी ने पत्रिका भेजी जो मुझे आज ही मिली है. यह मेरे और मारीना के प्यार की दास्ताँ है. समझने वाले समझते ही हैं कि प्यार की दास्ताँ जैसी भी हो हर बार पलकें नम कर जाती है. 


मरीना त्स्वेतायेवा (8 अक्तूबर १८९२- 31 अगस्त १९४१)

मरीना त्स्वेतायेवा रूस की एक महान कवियत्री हैं. ‘थे’ शब्द का इस्तेमाल मैं जानबूझकर नहीं कर रही हूँ कि मैंने जिस मारीना को जाना था वो अपने समय और काल को पार करके मुझसे मिली थी. पहली ही मुलाकात में उससे दोस्ती हो गयी थी और उसके बाद यह दोस्ती अब तक बनी हुई है. मेरी मारीना तस्व्तायेवा से दोस्ती करवाई थी डा वरयाम सिंह ने. उनकी पुस्तक कुछ ख़त कुछ कवितायेँ मैंने करीब १४ बरस की उम्र में पढ़ी थी. उस छोटी सी उम्र में मुझे क्या समझ में आया क्या नहीं लेकिन कुछ तो था जिसने जिन्दगी को देखने का, रिश्तों को समझने का, भावनाओं को महसूस करने का ढब ही बदल दिया. ‘जीवन में मुझे मुलाकातें अच्छी नहीं लगतीं, माथे टकरा जाते हैं, जैसे दो दीवारें. इस तरह भीतर जाया नहीं जाता. मुलाकातें मेहराब होनी चाहिए.’ या किसी के विचार तो पसंद हो सकते हैं पर उसके नाखूनों के आकार सहन नहीं भी हो सकता है. उसके स्पर्श का प्रतिउत्तर तो दिया जा सकता है पर उसके मूल्यवान भावों का नहीं. ये अलग लग क्षेत्र हैं. आत्मा आत्मा से प्रेम करती है, होंठ, होंठो से लेकिन अगर आप इन्हें मिलाने लगेंगे या मिलाने का प्रयास करेंगे ईश्वर न करे आप सुखी नहीं होंगे.

जिन्दगी के प्रति प्रेम से भरी एक बच्ची किस तरह बड़े होते हुए चीज़ों को देखती है, महसूस करती है, रूस की क्रांति के दिन, पहले और दूसरे विश्व युध्ध का समय, पिता ईवान व्लादिरिमोविच इतिहासकार और रूस के संग्रहालय के संस्थापक. पिता की दूसरी पत्नी से जन्मी मारिना और अनास्तासिया दो बहनें. पिता की पहली पत्नी से जन्मे आंद्रेई और वलेरिया के साथ उनके रिश्ते. माँ की उदासियाँ, बीमारियाँ, माँ की असमय मौत और इन सबके बीच मारीना का भटकता कवि मन. कमसिन उम्र का प्यार और विवाह. पति का व्हाइट आर्मी से जुड़ा होना, देश के बिगड़ते राजनैतिक हालात और जूझना आर्थिक हालात से भटकना दर ब दर. भूख से बचाने के लिए बेटी को अनाथालय में छोड़ने का निर्णय और उसकी मृत्यु, बेटी के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाना कि दूसरी बेटी को तेज़ ज्वर. फिर देश से बाहर जाना. निर्वासन के अनुभव, पीड़ा, संघर्ष. आखिरी सांस तक जिन्दगी के लिए/प्रेम के लिए शिद्दत से महसूस करना और अंत में छूट ही जाना सब कुछ.

मारीना जिन्दगी के प्रति आकंठ प्रेम से भरी थी. प्रेम ही उसके लिए जिन्दगी का दूसरा नाम था. उसे अपने लिखे में ही मुक्ति मिलती थी. जिन्दगी की कठोरतम परिस्थितियों में भी उसने लिखना नहीं छोड़ा. लिखना उसके लिए सांस लेने जैसा था. अपनी आखिरी साँस लेने से पहले भी वह लिख रही थी. वो लिखती थी डायरी, खत, कवितायेँ, संस्मरण. उसे बहुत जल्दी किसी से भी प्रेम हो जाता था...लेकिन प्रेम के मायने उसके लिए दुनियावी मायनों से बहुत अलग थे.

डा वरयाम सिंह ने मारीना से मुलाकात कराकर उससे और मिलने की उसे और जानने की प्यास को बढा दिया था. कई बरस तक ‘कुछ ख़त कुछ कवितायेँ’ ‘आयेंगे दिन कविताओं के’ और बाद में ‘बेसहारा समय में’ पढ़ती रही. (ये तीनों किताबें डा वरयाम जी के ही अनुवाद हैं) इस बीच कुछ संस्मरण लिखे मारीना पर जिसमें मैं उससे बातें करती थी, सवाल करती थी. इन्हीं सबके दौरान एक बार एक दोस्त ने कहा कि इतना ही प्यार है मारीना से तो मिल आओ न वरयाम जी से. वरयाम जी से मिलने की बात सुनते ही मेरी आँखें भर आई थीं. आखिर वही तो थे जिन्होंने हाथ पकडकर दोस्ती करायी थी मारीना से. 2009 में मैं जे एन यू गई वरयाम जी से मिलने. वो बहुत प्रेम से मिले, उन्होंने मेरे द्वारा मारीना पर लिखे छुटपुट संस्मरण पढ़े, मेरे और मारीना के प्रेम के किस्से सुने और कहा, ‘तुम करोगी मारीना पर काम.’ ये उनका प्यार था कि उन्होंने मारीना पर रूसी भाषा वाली काफी किताबें मुझे दीं. मेरे लिए रूसी भाषा की वो किताबें सिर्फ कुछ काले अक्षर भर थीं फिर भी उन अक्षरों को छूते हुए महसूस करना था मारीना को उसकी भाषा में.

वरयाम जी ने जे एन यू मारीना पर सामग्री तलाशने में मदद की. मारीना को जितना जाना और जानने की इच्छा होती गयी. उसके और मेरे दरम्यान न सिर्फ सौ साल से अधिक का फासला था बल्कि बल्कि भाषाएँ भी दीवार थीं. जानकारियां आधी अधूरी ही मिलती रहीं. एक जगह से मिली जानकारी दूसरी जगह से मिली जानकारी से अलग होती तो मुश्किल और बढ़ जाती. ऐसे में मेरी सारी दुविधा को दूर किया मारीना ने ही कि मैंने उस पर किताब नहीं उसके बारे में इकठ्ठी की गयी जानकारियों पर आधारित कुछ संस्मरण लिखे. प्यार से. वो लगातार एक दोस्त की तरह इस पूरी यात्रा में मेरे पास रही, मेरे साथ रही.भाषा हमारे दरम्यान एक ही थी प्रेम की. तथ्य हो सकता है कुछ ऊपर नीचे हो गए हों लेकिन उसके भाव बचाए रखने का पूरा प्रयास किया है. उसे भाषा से पार जाकर, देश की सीमाओं से पार जाकर सुनने का, उसके लिखे को महसूस करने का प्रयास किया है. इसीलिए इसे नाम दिया है.’मारीना मेरा पहला प्यार’. उसके जीवन का जो टुकड़ा यहाँ दिया है उसका संदर्भ इतना है कि रूस से निर्वासित होकर जब मारीना पराये देशों में भटक रही थी, जिन्दगी के टुकड़े समेट रही थी तो बीच में कुछ हिस्सा प्राग में भी बीता. ये प्राग में बीते उसके दिनों की झलक है. ये अंश संवाद प्रकाशन से प्रकाशित होकर जल्द आने वाली पुस्तक ‘मारीना त्स्वेतायेवा मेरा पहला प्यार’ से हैं.



Tuesday, April 3, 2018

जब वह खुद से खुश नहीं रहती


वो जब अपने पास लौटना चाहती हैं
तो लौटती हैं रसोई में
बटोरना चाहती हैं सबकी मुस्कुराहटें
तो इंटरनेट पर खोजती हैं नयी-नयी  रेसिपी

भीतर के बिखराव सिमटते नहीं
तो समेटने लगती हैं बिखरा घर
पड़ोसन से बन सकें अच्छे रिश्ते
शामिल होती है मोहल्ले की चर्चाओं में

घरवालों को फ़ालतू सा लगता है उनका पढ़ना- लिखना
इसलिए किताबों को स्टोर में रख
किताबों वाली जगह पर सजाती हैं शो पीस

कोई कुहासा झांकता है पलकों से जब भी बाहर
उसे दिखाती हैं गुलदान में सजाये ताजा फूल
मन की चिड़िया उड़ने को होती है बेताब
तो देखती हैं चिड़ियों से भरा आसमान

उनसे सब खुश रहते हैं तब
जब वह खुद से खुश नहीं रहतीं,


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Sunday, April 1, 2018

सुकून नहीं संभलता


विरह संभल जाता है, दुःख संभल जाता है, मुश्किलें पार हो जाती हैं लेकिन वो एक लम्हा जो दिल से दिल की राह लेता हुआ आँखों में जा बैठता है वो संभाले नहीं संभलता. वो एक हाथ जो ठीक उस वक़्त काँधे पर महसूस होता है जब आप तन्हाइयों के रसातल में डूबते जा रहे हों उस हाथ की छुअन का जादू नहीं संभलता. इंतजार संभल जाता है, बाट जोहना संभल जाता है, महबूब की एक नज़र नहीं संभलती,आंसू संभल जाते हैं, पीड़ा की तो जैसे आदत सी हो चली हो, लेकिन राहत भरा एक पल का साथ नहीं संभलता. दूर देश बैठे किसी की याद में होने वाली आवाजाही नहीं संभलती, उस देश की हवाओं में घुलकर आने वाली सांसों की जुम्बिश नहीं संभलती, चौदस का चाँद संभल जाता है, रातरानी की खुशबू संभल जाती है, दोस्त की हथेलियों में हथेलियाँ छुपा देना और चुपचाप साथ चलते जाने का सुख नहीं संभलता...

मौसम अंगड़ाई ले रहा, जागती हुई रात का जादू सांसें ले रहा है, इश्क़ शहर में नन्हे से ख़्वाब को सर्द हवाओं ने आ घेरा है, जिसे गर्म साँसों की चादर में सुकून है...ये सुकून नहीं संभलता. सच्ची.

(इश्क़ शहर, मुद्दत बाद मिला इतवार)