Thursday, April 26, 2018

‘क' से कविता की अल्मोड़िया चाल


‘​क से कविता’ आयोजित करने वाले भी भली—भांति जानते हैं कि वह अचानक नए लोगों को खड़ा कर रही है। दरअसलए उत्तराखंड की जमीन में मौजूद साहित्यानुराग की उर्वर शक्ति ही इसकी बुनियाद बनाती है। लोग हैं इसलिए वे कविता को आमंत्रित करते हैं.
उत्तराखंड के सभी जनपदों में ‘क से कविता’ मंच गठित
- भास्कर उप्रेती 

आख़िरकार अल्मोड़ा नगर में 25 मार्च को ‘क से कविता’ की शुरुआत हो गयी. शुरुआत भी एक मुकम्मल शुरुआत. इधर ‘क से कविता’ ने ‘ए’ से शुरू होने वाले अल्मोड़ा में अपना परचम लहराया, उधर महान कविताफरोश सुभाष रावत ने लंबी और गहरी साँस ली। उन्होंने जब गहरी संतोष भरी साँस ली तो हम सब कविता प्रेमियों को भी अपनी खुदी पर नाज हो आया. क्यों न होता ? उत्तराखंड ऐसा प्रदेश बन गया था, जहाँ अब हर जिले में कविताएं हो रही थीं। फ्रीफंड की कविताएं. मार्च के महीने में साहित्य के कई मठों में कवियों पर खूब फंड उड़ेला जाता है। यहाँ जनता अपना प्यार कविताओं पर उंडेल रही थी।

कविता कहने के लिए लोग घरों से निकल पड़ते हैं या कविताओं को होस्ट करने के लिए घरों में बुलाते हैं। कवि समाज के लोग नहीं, यह लोग हैं फकत कविताप्रेमी लोगण् जोअपनी नहीं दूसरों की कविताएं पढ़ते हैं. वे जगह—जगह की कविताएं पढ़ते हैं। लोक की कवितायेँ, जन की कवितायेँ, हिंदी की कवितायेँ, भारतीय भाषाओं की कवितायेँ, विश्व भाषाओं की कविता। नारी कविता, दलित कविता, गोरी कविता, काली कविता।

कोई भी पूछना चाहेगा कविता क्यों? कविता ही क्यों
मगर हमने इस सवाल का उत्तर कभी नहीं तलाशना चाहा कविता को खुद बताने दो।

सुभाष भाई पिछले दो साल से अपने सपने को लेकर हर शनिवार दिल्ली से भागे चले आते हैं। कभी पिथौरागढ़, कभी अगस्त्यमुनि तो कभी उत्तरकाशी। 1994 में उत्तराखंड आन्दोलन के दौरान उनकी थियेटर टीम ने एक नाटक जगह—जगह किया था। उसका नाम था मिशन 2020। नाटक एक प्रदेश के रूप में अवतरित हो रहे उत्तराखंड की खूबियाँ बताता था। उत्तराखंड बना नहीं था, उसे बनना था। लेकिन, उस समय उसके बीज जिस भांति अंकुरित हो रहे थे, उससे शेक्सपियर के जूलियट सीजर नाटक सी डरावनी ध्वनियाँ गूँज रही थीं। आज का उत्तराखंड वही है जो कला दर्पण का नाटक भविष्यवाणी में कह रहा था। मगर, ऐसा ही उत्तराखंड चाहिए था हमें।

हमें तो रामगढ़ की चोटी पर बैठे टैगोर वाला उत्तराखंड चाहिए था। हमें महादेवी का उमागढ़ वाला उत्तराखंड चाहिए था। हमें चंद्रकुंवर बर्त्वाल वाला हिमवंत चाहिए था। हमें लैंसडाउन की उकाव से उमड़ते नागार्जुन के घिरते बादल चाहिए थे। हमें स्वामी मन्मथन और प्रो. डी.डी. पंत के सपनों का विश्वविद्यालय चाहिए था, गिर्दा का ‘धुर जंगल फूल फूलो यस जतन करुलो’ और ‘हाँ न पटरी माथा फोड़े ऐसा हो स्कूल हमारा’ वाला प्रान्त चाहिए था। उसमें गुमानी के ‘काफल’ चाहिए थे, मोहन उप्रेती के हुड़के की थाप होनी थीं। घाटियों और धुरों में पंडित उदयशंकर का आलाप सुनाई पड़ना था। मगर हो न सका।

जो था और है वह है पस्ती थियेटर ठप, जनगीत चुप, लेखक गायब, कवि लापता। पत्रकार पतित, शिक्षक गैर—हाज़िर। दोष किसको ? सरकार का सरकार जिसके बारे में सब कहते हैं उनकी हो नहीं सकती, उनके लिए कुछ कर नहीं सकती।

बातें थीं, चिंताएं थीं। शोक था, विलाप था, मगर पहल नहीं थी। पहल करें भी तो करें कैसे? तानाशाह का भय कंपित करता था। चेतन, अर्द्धचेतन, अवचेतन सब एक नियति के शिकार।

इसी बीच देहरादून में कुछ प्राणियों ने एक यूटोपिया रचा। जैसे शमशेर कहते थे न ‘कविता न सही’ हाथ की छटपटाहट ही सही. बैठे—ठाले इन प्राणियों को सपना आया. ‘प्रतिरोध न सही, कविता ही सही. कविता होने लगी। देहरादून से यह हल्द्वानी पहुँची। फिर उत्तरकाशी, टिहरी, श्रीनगर, पौड़ी, अगस्त्यमुनि, रुद्रपुर, खटीमा, लोहाघाट, रुड़की, पिथौरागढ़, बागेश्वर और अब अल्मोड़ा, अल्मोड़ा ‘अ’ से और ‘ए’ से शुरू होता है, लेकिन अल्मोड़ा को शुरू होने में थोड़ा टैम लग गया।

पाश कहते हैं न, ‘सपनों के लिए लाज़िमी है झेलने वाले दिलों का होना’ कविता के सपने उन्हें कैसे आएंगे जो कभी बेचैन नहीं होते। लेकिन रेत में अपनी मुंडी घुसेड़ देने से तो अच्छा है कविता ही पढ़ लें। अपनी बेचैनी को कोई ठौर तो मिले. दुनिया से रुखसत होते हुए यह तो कहा जा सकेगा कि नहीं बदल सके हम दुनिया यारो, मगर हमने सपनों के बीज तो जगह—जगह फेर दिये. सपने बचे रहेंगे तो बदलने की भी कूबत बनी रहेगी।

खैर थोड़ी सी बात ‘क से कविता’ की अल्मोड़िया चाल की। 25 मार्च की सुबह नौकरी के काम से मैं रुद्रपुर के कॉर्बेट इन में पड़ा हुआ था। पता नहीं किस गरज से मैंने कमरे की चिटकनी नहीं लगायी। सुबह के खर्राटों में मेरे मोबाइल की चीख उठी। किसी तरह सिकुड़ते—सिकोड़ते हुए मोबाइल उठाने को होता हूँ तो खुली आँखें अचंभित हो उठती हैं। मेरे सामने एक स्मार्ट सा आदमी अपनी दंतमाला खोले मुस्कान बिखेर रहा था। मन से एक आवाज आई. ओह यह कविता का विदूषक! जी हाँ कविताफरोश सुभाष रावत वह और पहले आ चुके थे. फ्रेश हो चुके थे। अब हाज़िर हो रहे हैं।

शायद यह बात उन्होंने निम की ट्रेनिंग में सीखी होगी। सीधे रिपोर्ट करते हुए कहते हैं—जी हाँ हम पहुँच चुके हैं। हेम पंत कुछ ही मिनटों में हाज़िर होते होंगे। हम ठीक 6 बजे यहाँ से रवाना हो जायेंगे। मेरे मन से आवाज आई— ‘यह साँचे में ढला हुआ आदमी कैसे कविता का आदमी हो गया। ‘कविता का आदमी तो शर्तिया बेतरतीब होना चाहिए। बहरहाल हेम भी उस समय प्रकट हो गए। वो भी इनसे कम नहीं हैं। सुभाष दा चलो लेट नहीं होना है। 10 बजे शुरू हो जाएगा।

मुझे याद आया कि बीते दिन यह योजना बनी थी कि अल्मोड़ा में ‘क से कविता’ करने के लिए सुभाष दा और हेम रानीखेत के बाटे अल्मोड़ा पहुँचेंगे। अल्मोड़ा में नीरज भट्ट जी—जान से कविता कराने को जुटे हुए हैं। मैंने दोनों को शुभकामनाएं दीं, ‘कविता का अंतिम किला’ फतह करने के लिए। अंतिम इस मायने में कि अब तक 12 जिलों में ‘क से कविता’ होने लगी थी।

मेरे खाप में लटपटी नींद चपड़—चपड़ कर रही थी। मैं सोने की कोशिश करने लगा मगर तभी पता नहीं क्यों मृणाल पाण्डे की किताब का टाइटल मेरे जेहन में गूँज पड़ा। ‘ओ रे अल्मोड़ा’। मैं अचकचाकर बैठ गया। मैंने मोबाइल से सुभाष दा को धात लगायी, मुझे भी ले जाओ, मेरा मन भी आने का कर रहा है। वहां से दोनों खितखित करने लगे। देखा कविता का कमाल! मैं झटपट तैयार हुआ और हम कार में जा घुसे। सुभाषदा रोडवेज की बस से अब तक कविता—धर्म के प्रचार—प्रसार को गए हैं। पिछली दफा तो वे मेरी बाइक की पीठ पर बैठकर बागेश्वर पहुंचे थे। जहाँ से फिर भराड़ी पहुँच गए। फिर गरुड़—कौसानी होते हुए वापिस दिल्ली की बस में जा घुसे थे। हम उनकी बहादुरी की सान में धार लगाते रहे। मगर इस बार हेम ने तय किया था कि कविता के होलटाइमर को थोड़ा आराम के साथ कविता—स्थल तक ले जाया जाए।

मटकोटा मोड़ से गुजरते हुए हमें पहले पत्रकार जगमोहन रौतेला और फिर मीडिया—गुरु भूपेन सिंह की भी फाम हो आई। ‘चलोगे? पहले रानीखेत में उमेश डोभाल और फिर अल्मोड़ा की धार में कविता कौन भला ऐसा रोमानी सपन ठुकराए। जग्गू दादा बोले, यार वैसे तो फूफाजी की तेरहवीं हैं, लेकिन वहां भी चलूँगा तो ठीक ही हुआ। भुप्पी दा बोले ‘अरे मुझे डिस्टर्ब क्यों कर देते हो बार—बार, अब कह रहे हो तो जाना ही पड़ेगा। इस तरह हम पांच जन हल्द्वानी से हो गए। उस दिन तो ऐसा लग रहा था मानो किसी से भी कविता के लिए चलने को कहते चल ही देता।

रानीखेत में हम ख़राब वक़्त शुरूहोने से ठीक पहले पहुँचे। सौज्यू की बकेट पर बनी सुंदर और सार्थक कलाकृतियों को देख मन प्रसन्न हो उठा। ललित कोठियाल ने टीम हल्द्वानी की चिप लगाकर हम लोगों का ग्रुप फोटो खेंचा। सभागार में हालाँकि चारु तिवारी बोलकर निमा चुके थे। लेकिन शेखर दा मंद—मंद लौ में सुलगरहे थे। उत्तराखंड की दशा, दिशा, दृष्टि का समूचा—समग्र आख्यान। हमारा रिवीजन हो गया। उनसे तो एक ही बात सौ—सौ बार सुनने का मन करता है। राजदूत भंडारी जी जैसे ही संस्कृत का उच्चार करते हुए आये तो हमने बाहर निकलकर गढ़वाल के ओने—कोने से पहुंचे मित्रों से मिलने—भेंटने का लुत्फ़ उठाया। देहरादून से योगेश दा ‘भट्ट’ अपनी अदा के साथ आये थे। मनीष सुन्द्रियाल हमेशा की तरह मौजूद थे। व्योमेश जुगरान जी से सकल रूप में पहली भेंट थी। एक कोने से अपने 23 साल पुराने दगड़ीयों के साथ अरुण कुकसाल टिमटिमा रहे थे। महेश पाण्डेय जी और पी.सी. तिवारी जी की शिकायतों ने भी हमें और परिपूर्ण किया। अंदर पुरस्कारों का रेला शुरु हुआ। इधर से गीता गैरोला दीदी की टोली जीप भरकर आ धमकी। साथ में पंखुड़ी और सुमन केसरी। हम धन्य हुए। गीता दी जहाँ न पहुंचें वो कार्यक्रम ही क्या।

नीरज बार—बार समय से आने का अलार्म बजा रहे थे तो हम खिसक लिए। भूपेन सिंह को वहीं छोड़ना पड़ा क्यूंकि उन्हें मीडिया के हालातों पर कुछ जरूरी बात वहाँ रखनी थीं। कठपुड़िया में दाल—भात खाया। पहाड़ी खाना खिलाने की जिरह की मगर दाज्यू बोले कोई नहीं खाता सैप अब आप कह रहे होए लेकिन यहाँ के गिराक तो अरहर की दाल ही मांगने वाले हुए। छोटे स्टेशन के लिहाज़ से बहुत सारी खाने की दुकानें हैं यहाँ लेकिन सब के बाहर मोमो के ही चिट लटके हैं।

खैर हम थोड़ी देर में कोसी पुल की तारीफ करते—करते स्यालीधार पहुँच गए। अब जाकर कविता पर बात फोकस हुई। सुभाष दा का निर्देश हुआ नीरज को फोन लगाकर पूछो कितने आए। कितने वाला सवाल बहुत जरूरी था. अल्मोड़ा में कविता को कैसे देखा जाएगा जाने. इसी बीच हेम को कल्याण मनकोटी ने आने की इत्तिला दी. अब हम एक—एक क्षण में और सुनना चाहते थे। लोग जुड़ रहे थे, मगर कितने आएंगे टोटल धुंधलका था। हमने मित्र पुलिस की अनुपस्थिति देखकर माल रोड की बाइक पार्किंग में कार घुसेड़ दी और दौड़े—दौड़े जी.जी.आइ.सी. की सीढ़ियाँ उतरनी शुरू कीं ताने से अंदर देखा कुछ लोग थे। फिर हाल में पहुंचे ठीक—ठाक लोग थे।

नीरज को भी ठीक-ठीक नहीं पता था. कविता क्या बला है. हल्की बूंदाबादी शुरू हो चुकी थी पर हौले—हौले लोग बढ़ ही रहे थे। संख्या 25 पार हुई तो हमने सभा शुरू करने की घोषणा की। चेहरे के अंदर चेहरे पढ़ने में अल्मोड़यों का कोई सानी है ? धीर—गंभीर चेहरों के भीतर बैठा प्रश्नवाचक जानने को उत्सुक था कि आखिर ये क्या बेचने आये हैं और क्या भिड़ा के जाना चाहते हैं। इनमें दुकानदार थे, छात्र थे, शिक्षक थे, इंजीनियर थे समाजसेवी थे। नीरज जैसे अपरिभाषित युवा भी थे। टुकुर—टुकुर ताक रहे नीरज पंत जी को कुछ—कुछ आईडिया था प्रभात उप्रेती जी की सिफारिशी सूचनाओं की वजह से। मगर, बाकी सबकी आँखों में प्रश्न अधिक थे। हम थोड़ा तो ताड़ गए, यहाँ ऐसे ही दाल नहीं गलेगी।

अल्मोड़ा एक नाम नहीं एक विचार है

अल्मोड़ा हम सबके लिए उत्तराखंड के लिए और कहना चाहिए नार्थ इंडिया के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा है। और हम बेहद खुश हैं कि आज हम अल्मोड़ा में हैं। तने हुए चेहरे थोड़ा मुलायम पड़े। मगर क्या अल्मोड़ा में अल्मोड़ा है। हम पूछने आए हैं जिसे हम अल्मोड़ा नाम से जानते हैं, क्या यह वही अल्मोड़ा है। पी.सी. जोशी का अल्मोड़ा, हुड़किया वकील वाला, मोहन उप्रेती वाला। सुमित्रानंदन पंत वाला। गौरीदत्त पांडेय वाला। खुशीराम वाला ? वही अल्मोड़ा है जहाँ गुरदत्त को, जोहरा को और बलराज साहनी को पंडित उदयशंकर ने साधा था। निश्चित रूप से इस आक्रामकता से प्रश्नवाचक सामान्य मुद्रा में आ गए। हमने बताने की बजाय पूछने की कोशिश की। हमें अफ़सोस है अल्मोड़ा में कविता शुरू होने में वक़्त लग गया। मगर क्या कोई कविता अल्मोड़े के बगैर पूरी हो सकती है? हम इसीलिए यहाँ आये हैं।

सच में यह कोई पेंतरेबाजी वाला मामला नहीं था। हमें वाकई जानना था कि वो अल्मोड़ा जिसे दुनिया जानती है, आज इतना चुप क्यों है। वीर बालकों के जोखिमों वाला अल्मोड़ा इतना नपा-तुला क्यों है ? इस शुरुआती बातचीत के बाद हम सब एक धरातल पर थे। हम यह मान रहे थे कि अल्मोड़े को चुप नहीं रहना चाहिए और समय आ गया है कि अल्मोड़ा बोले. सबको जगाने वाला अल्मोड़ा आज चुप नहीं रह सकता। सुभाष दा ने कविता कविता की घंटी बजायी और उधर अल्मोड़ा की आवाज सुलगने लगी। पहले धीमी—धीमी, फिर मध्यम और फिर गगन हिलोर कर।

नीरज पांगती से सुनाना शुरू किया। पांगती ने पाश की ‘सबसे खतरनाक’ सुनाई. महेंद्र ठकुराटी ने मीरा के छंद गाये। नीरज पंत ने सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की ‘तुम सोचते होगे’ और बल्ली सिंह चीमा की ‘भूख से लड़ते हुए इंसान’ पेश की। मनीष पंत ने योगेश की कविता ‘नहीं दवाई अम्मा’। मोतीप्रसाद साहू ने अवध बिहारी श्रीवास्तव की ‘मंडी चले कबीर’, चंद्रा उप्रेती ने महाश्वेता देवी की ‘आ गयी तुम’, ललित योगी ने जयशंकर प्रसाद की ‘सब जीवन बीता जाता है’ सुनाई। राजेंद्र भट्ट ने गिर्दा की ‘ततुक नी लगा उदेख’ गाई तो हेम ने हीरा सिंह राणा की ‘लस्का कमर बाँधा’ गाई. दीपा गुप्ता ने हरिवंशराय बच्चन की ‘दिन जल्दी जल्दी ढलता है’, प्रतिभा ने देवल आशीष की ‘प्रिय तुम्हारी सुधि को मैंने’, नीरज भट्ट ने चंद्रकुंवर बर्त्वाल और दुष्यंत कुमार, जगमोहन रौतेला ने मदन मोहन डुकलान, भास्कर ने केदारनाथ सिंह की, सुभाष रावत ने कैश जौनपुरी की ‘मैं नमाज नहीं पढूंगा’ सुनाई। लक्ष्मी आश्रम कौसानी से आई मीनू ने अपने मधुर कंठ से ‘मैं तुमको विश्वास दूं, तुम मुझको विश्वास दो’ गाकर सभी के कंठ को समवेत कोरस में बदल दिया. खैर 28 जनों में से 25 ने कविताएं पढ़ीं और अल्मोड़ा में ‘क से कविता’ का शानदार आगाज हो गया। अलग-अलग तेवर और कलेवर की कविताएं सामने आयीं. यह खुद से या समूह के विवेक से ही हो गया कि इसमें भिन्नता और विविधता को जगह मिल पाई।

‘क से कविता’ के कुछ नियम बनाये गए हैं या कहें वह नियम नैसर्गिक रूप से विकसित होते गए हैं। सुभाष ने बताया कि अपनी नहीं, अपने दोस्त की नहीं, अपनी पसंद की बड़ी कविता यह पहली शर्त है। दूसरा, किसी भी बैठक में कोई अध्यक्ष नहीं, कोई विशेष नहीं। बराबर सभी सम्मानीय। तीसरा, एक व्यक्ति की एक ही कविता। चौथा, जगह ऐसी चुनें जो सबको भाये। जहाँ सब आना पसंद करें। उन्होंने बताया कि कविता को लिखकर या प्रिंट कराकर साथ लायें। कविता स्थल पर पहुंच कर कविता ढूंढना कविता की गंभीरता को कम करता है। एक नियम यह भी बताया गया कि समूह में यदि कोई बड़ा कवि भी है तो भी उसकी कविता कोई और नहीं पढ़ सकेगा। हाँ कवि की अनुपस्थिति में उसकी कविता लायी जा सकती है. मीडिया में छपने—छपाने की रस्म से बचा जाएगा। मीडिया को जब तक खुद इसे कवर करना जरूरी न लगे, तब तक कोई मीडिया के पास नहीं जायेगा। कविता को साहित्यिकों और उनके संस्कारों से बचायेंगे।

हल्द्वानी की पहली बैठक में एक विचित्र अनुभव हुआ था. कार्यक्रम में थोड़ा विलंब से आये तारा चन्द्र त्रिपाठी और अनिल भोज ने अचानक अपनी कविताएं पढ़ना शुरू कर दीं। बीच में किसी ने आगाह किया कि यहाँ अपनी कविता पढ़ने का नियम नहीं हैं, तो दोनों वरिष्ठजन रुष्ठ हो गए। तब किसी ने कहा, अरे चलेगा, एक आध तो चल सकती हैं, सीनियर आदमी हैं। तब सुभाष ने कड़ा स्टैंड लेते हुए कहा कि बिल्कुल नहीं चलेगी। नहीं लाये हैं तो कोई बात नहीं। सुन भी तो सकते हैं। बाकी लोग लाये हैं, उन्हें सुनेंगे। उस दिन हल्द्वानी में सुभाष दा का यह स्टैंड कईयों को थोड़ा अखरा तो सही, लेकिन आगे इसने हमारी बड़ी मदद की। हल्द्वानी में ही नहीं और जगह भी। लोगों को खासकर साहित्यिकों को अपनी कविता सुनाने की आदत हो गयी है। यह आदत डी.एन.ए. में ही शामिल हो गयी है। इस आदत ने कविता का बड़ा नुकसान किया है। ‘क से कविता’ आंदोलन के इन नियमों की वजह से कई बार बड़े कवियों की प्रतिभागिता से वंचित रहना पड़ता है। लेकिन वह यदि दूसरे की कविता सुनने नहीं आ सकते, ऐसा कलेजा नहीं रख सकते तो हम उनसे वंचित रहना ही पसंद करते हैं। इसका बड़ा लाभ यह हुआ है कि कविता का संकुचित लगने वाला दायरा अब काफी चौड़ा गलियारा बन गया है। शुरुआत में लोग अपनी पाठ्य पुस्तक के ज़माने वाली कविता भी ले आते हैं। फिर कॉलेज के दिनों की रोमानी कविता और शायरियां। कुछ लोग जिनका साहित्य की दुनिया से कम एक्सपोजर रहा होता है, भजन—कीर्तन टाइप भी ले आते हैं। लेकिन धीरे—धीरे कविता की तलाश शुरू हो जाती है. घर में मौजूद सामग्री कम लगने लगती है. समूह में आई एक भी अच्छी कविता लोगों को अपनी रुचि का परिष्कार करने के लिए प्रेरित करती है। फिर अच्छी से अच्छी कविता लाने की होड़ मच जाती है। इस परिष्करण के लिए किसी आलोचना, समालोचना, सौन्दर्यबोध या प्रवचन की जरूरत नहीं पड़ी। लोग बिना कहे खुद के विवेक से समझते जाएँ, यही सबसे बढ़िया समझ है।

‘क से कविता’ का पहला साल पूरा हुआ तो प्रदेश भर के कविता प्रेमी मार्च 2017 में दून विश्वविद्यालय, देहरादून में एकत्र हुए थे। एक बड़ा जलसा हुआ था। जैसे अपने शहर में हम अपने आप से आते हैं, वैसे ही वहां भी पहुंचे। ‘​क से कविता’ आंदोलन को एक शक्ल देने में जुटी रही प्रतिभा कटियार और गीता गैरोला ने इस आयोजन को कविता के बड़े उत्सव के रूप में कल्पित किया, यहाँ से मिली ऊर्जा ने इसे नई—नई जगहों में फ़ैलने की प्रेरणा दी। देहरादून में अब तक लगातार 25 बैठकें, जबकि हल्द्वानी—रुद्रपुर में 18 बैठकें हो चुकी हैं।

कुछ जगहों पर लोगों ने इसके अपने फॉर्मेट भी बनाए हैं। जैसे किसी कविता को मंचित करके प्रस्तुत करना या किसी बार एक ही कवि की अनेकों कविताएं पढ़ना। या सबके द्वारा किसी महाकाव्य के अंश पढ़ना। कविता वीडियो देखना और बनाना। कविताओं को पोस्टर में लाना निश्चित रूप से कविता के प्रसार के लिए ऑनलाइन माध्यमों का काफी इस्तेमाल होता है। यूनिट स्तर, प्रदेश स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर इसके अलग—अलग मंच हैं। जहाँ यह द्विगुणित—बहुगुणित होती रहती है। ‘क से कविता’ हैदराबाद, लखनऊ, दिल्ली, गुड़गाँव, पुणे, मस्कट, न्यूयॉर्क आदि तक भी पहुंची है। मगर, इसका जो रूप उत्तराखंड में देखने को मिला है वह नायाब है। यहाँ ये निरंतरता के साथ हो रही है और इसका फैलाव भी हो रहा है। कई बार साथी मजाक करते हैं, कुछ लोग हर प्रदेश में एक पार्टी की सरकार लाने में लगे हैं और कुछ लोग देश के कोने—कोने में कविता प्रदेश बनाने का काम कर रहे हैं। काश इस देश में एक दिन कविता का राज हो!

उत्तराखंड में हर जिले में कविता होने का यह मतलब कतई नहीं है; जिसे ‘​क से कविता’ आयोजित करने वाले भी भली—भांति जानते हैं कि वह अचानक नए लोगों को खड़ा कर रही है। दरअसलए उत्तराखंड की जमीन में मौजूद साहित्यानुराग की उर्वर शक्ति ही इसकी बुनियाद बनाती है। लोग हैं इसलिए वे कविता को आमंत्रित करते हैं. लोग खुद कुछ कर रहे हैं इसलिए वे इस आंदोलन से जुड़ना चाहते हैं। लक्ष्मी आश्रम की एक छात्रा ने हमसे कहा, अरे आप लोग तो हमारा ही काम कर रहे हैं। हम लोग भी आजकल गीतों की यात्रा पर निकले हैं, गाँव—गाँव जा रहे हैं लेकिन यह भी सच है कि लोग बिखरे हुए हैं। लोग साहित्य के कर्मकांडी रस्मो—रिवाज से इतने आजिज आ चुके हैं कि उन्हें उसमें ताजगी की उम्मीद ही नहीं लग रही. समाज का सांस्कृतिक विघटन कला और कलाबोध के विघटन को भी जन्म देता है। मगर यह शक्ति भी कला में ही है जो टूटे—बिखरे को जोड़ देता है। अभी-अभी तक गिर्दा इसका जीवंत उदाहरण थे, जो तरह—तरह की सूत को कातने वाली तकली थे। इस तकली का हमारे बीच से अनुपस्थित हो जाना एक खालीपन दे गया।

उत्तराखंड में और जगहों की भांति अल्मोड़ा के प्रश्नवाचक साथियों को भी ‘क से कविता’ का विचार बहुत भा गया। एक साथी तो इतने भावुक हो गए कि बोलने लगे, हमेशा ही दूसरों की कविताओं को सुनता आया हूँ। कभी सोचा भी नहीं था कि एक दिन खुद भी दूसरों को सुनाऊंगा। हम अपनी न सही, अपनी पसंद की कविता दूसरों को सुना सकते हैं, उनसे साझा कर सकते हैं, यह विचार खुद में अदभुत है।

यह भावना हमें कई जगह दिखी है। ऐसे साथी मिल जाते हैं जिनकी डायरियों में बेहतरीन कविताओं का सत्व है. ऐसी डायरियां आखिर कब बोलेंगी। वो चयन और परख किसके काम आएगी। कब तक लिखने वाले पढ़ने वालों पर हावी रहेंगे। और लिखे हुए का परीक्षण कैसे होगा ? यह काम ही ‘क से कविता’ कर रही है। यह साहित्य के जनतांत्रिकरण का आन्दोलन है। यह पढ़ने—लिखने की संस्कृति का एक ताजा आंदोलन है।

कर्बला के मोड़ से उतरते उतरते हम सब अचानक ही और एक साथ हँस दिये, तो हो गया। एक ने कहा। दूसरे ने कहा तो कुछ करने लगो तो कुछ हो ही जाता है. तीसरे ने कहा कविता ने शोकाकुल आत्माओं को मुक्ति दे दी। अगले ने इस बात का प्रतिकार किया नहीं जनाब इस आंदोलन ने कवियों और लेखकों की जकड़न से कविता को मुक्ति दी। हां कविता सही हाथों में आनी शुरू हुई है। तरह—तरह के विचार, विश्लेषण मगर कविता को वाकई नयी ऑक्सीजन तो मिल ही गयी, यह एक तथ्य है। हम अल्मोड़ियों की तरह बोलने लगे थे। ‘लैन करणक मन ज ह्वोलो तो कसिक नी होल, ह्व़े जाल, अल्मोड़िया चाल दरअसल वो चाल है जो किसी भी परिस्थिति में पिटना और पराजित होना पसंद नहीं करती. जुगतकि चक्रव्यूह को भेद लें.

हमने ‘क से कविता की माँ ; मनीष गुप्ता ने प्रतिभा कटियार को यही नाम दिया था. को अल्मोड़ा की बैठक के कुछ फोटो ‘व्हाट्सएप’ की. फिर और कुछ जिलों के साथियों को लोग पूछते ही हैं कहाँ से आया कविता का यह मंच ? कुछ लोग पूछते हैं कौन है मुखिया ? साहित्य की गलियों में फिरने वाले कुछ जासूस खुलासा करते हैं कि मनीष गुप्ता का है, कि नए ‘क से कविता’ एक स्वतंत्र विचार है। सही मायनों में यह पाठकों का मंच है. मनीष का एक मंच है जो कि एक निजी यू ट्यूब चैनल है. ‘हिन्दी कविता’ नाम से वे अपनी तरह से हिंदी कविता की सेवा करते हैं. और कहना चाहिए उन्होंने वीडियो माध्यम से और नामी लोगों से कविताएं पढ़ा कर नई ऊर्जा का संचार किया है। मनीष, प्रतिभा, लोकेश और सुभाष दा की बातचीत में पल रहे विचार के शुरुआती साक्ष्य भी रहे. फिर इसमें गीता गैरोला, नूतन गैरोला, प्रभात उप्रेती आदि अनेक जनों के सुझाव जुड़े और आज यह इस शक्ल में है।

Saturday, April 21, 2018

पढ़ती हूँ उनकी चुप

पढ़ती हूँ उनकी चुप जो रहते हैं आस पास
दीखते हैं अक्सर हँसते हुए सहज से
कभी-कभार चुप हो जाते हैं
फिर लौट आते हैं सहजता ओढ़कर

पढ़ती हूँ उनके भीतर की उथल-पुथल
जिसे भीतर दबाये वो जुटे हैं
इस देश, इस समाज को बेहतर बनाने में

वो देश जो अब उन्हें अपना मानने से इंकार करने लगा है
वो देश जिससे उन्हें भी है उतना ही प्यार
जितना है हम सबको
लेकिन उनका देश प्रेम संदिग्ध हो गया है अचानक
उन्हें प्रमाण देना होता है पल-पल
अपनी देशभक्ति का
उन्हें पाकिस्तान के खिलाफ नारे लगाने को मजबूर किया जाता है
जबकि वो असल में नहीं लगाना चाहते
किसी भी देश या व्यक्ति के खिलाफ नारे
कि नफरत से नफरत को कैसे जीत सकता है कोई

गलती से भी पाकिस्तानी गायक, खिलाड़ी या साहित्य
की तारीफ़ से उन्हें सायास बचना होता है
उन्हें किराये के मकान आसानी से नहीं मिलते
यात्राओं में उनकी जांच ज्यादा मुस्तैदी से की जाती है

वो फेसबुक, ट्विटर पर कुछ लिखने से बचते हैं
बच्चों को जल्दी से सुला देते हैं
बीवी की आँख में छाए डर का सामना नहीं कर पाते
किसी किताब में गड़ा देते हैं आँखें

गुझिया और सिंवई का स्वाद साथ में लेते हुए
बड़े हुए थे जिन दोस्तों के साथ
उनके हाथ अब कंधे पर महसूस नहीं होते

पढ़ती हूँ उनके भीतर का संसार
जिसे वो लिख नहीं पायेंगे कभी
जिसे छुपाने के लिए वो मुस्कुराते रहेंगे आसपास ही.

Saturday, April 14, 2018

हरसिंगार सी झरती है फिल्म 'अक्टूबर'


सामने स्क्रीन पर क्या चल रहा था, क्या नहीं, पता नहीं लेकिन देह पर हरसिंगार झरते से महसूस हो रहे थे. बेहद कड़वे मन, कसैले समय में किसी फिल्म का रुख करना असल में खुद को निजात देने की कोशिश करने जैसा था. कुछ भी नहीं पता था फिल्म अक्टूबर के बारे में सिवाय शुजीत सरकार के. जैसा मेरा मन उलझा हुआ था वैसी ही उलझी हुई सी फिल्म शुरू हुई. फिल्म का मुख्य किरदार ('नायक' कहने का मन नहीं कर रहा कि शुजित ने उसे नायक की तरह गढ़ा भी नहीं है) भी उलझा हुआ ही दिखा. यूँ लगा परदे पर अपने भीतर की बेचैनी को देख रही हूँ. कौन सी बेचैनी, कैसी उलझन? पता नहीं.

वो उलझनें बहुत आसान होती हैं जिनके बारे में हम स्पष्ट होते हैं, जो सामने से दिखती हैं लेकिन उनका क्या जो खुद को ही समझ में नहीं आतीं. लेकिन हर वक्त परेशान करती रहती हैं, चैन से रहने नहीं देतीं. न दोस्त समझ पाते हैं, न घरवाले. कहाँ से समझेगा कोई जब खुद को ही कुछ समझ नहीं आता बस कि जो जैसा है, वैसा मंजूर नहीं होता. दीवार पर जोर से मुक्का मारने का जी चाहता है, बीच सड़क पर जोर से चिल्लाने का या तौलियों को जूतों से कुचलने का.

डैन (वरुण धवन) ऐसी ही उलझनों से गुजर रहा है. रोज डांट खाता है, हर काम में गलती करता है जिसका उसे कोई अफ़सोस नहीं. दोस्त उसका साथ तो देते हैं, समझ नहीं पाते. इन्हीं उलझनों के दरमियाँ जिन्दगी एक नया पन्ना खोलती है, बिलकुल अनपेक्षित. उसके साथ काम करने वाली उसकी सहयोगी (ठीक से दोस्त भी नहीं) एक भयानक एक्सीडेंट का शिकार हो जाती है और कोमा में चली जाती है.

अस्पताल, नर्स, डाक्टर, महंगे बिल, उम्मीद और नाउम्मीदी के बीच की जंग और डैन. फिल्म बहुत धीरे-धीरे आगे बढती है बिलकुल उसी तरह जैसे सरकता है बुरा वक़्त धीरे-धीरे. व्यवहारिक होने न होने की तंग गलियों से गुजरते हुए, हर बात को लॉजिक के लेंस से देखने और न देखने के फासले को साफ़ करते हुए फिल्म जिन्दगी के बेहद करीब जाती नज़र आती है.

दुःख तब दुःख नहीं लगता जब आप उसे स्वीकार कर लेते हैं कि हाँ यह तो है फिर उससे लड़ते हैं प्यार से, दुश्मनी से नहीं. मुश्किल वक्त में भीतर की ताकत को समेटा कैसे जाता है, कैसे उसमें रंग भरे जाते हैं यह निर्देशक शुजीत सरकार और फिल्म की लेखिका जूही चतुर्वेदी ने सलीके से परदे पर रचा.

वरुण धवन के दीवानों को शायद इसमें उनका वरुण धवन न मिले लेकिन जो मिलेगा वो उन्हें हैरत में डाल देगा. वनिता संधू पहली फिल्म में ही दिल जीत लेती हैं और गीतांजली राव की अदाकारी भी आपका हाथ थाम लेती है. यह फिल्म दिल में उतरने वाली फिल्म है, बहुत धीरे-धीरे, जैसे उतरते हैं हरसिंगार के फूल शाखों से और जैसे घेरती है उनकी खुशबू. देर तक असर रहने वाला है फिल्म का. इसे देखते हुए रिल्के याद आते रहे, 'अगर तुम्हारे जीवन में अब तक जाने हुए दुःख से (वो अवसाद कहते हैं) बड़ा दुःख गुजर रहा है, तो तुम्हें परेशान नहीं होना चाहिए बल्कि जीवन का शुक्रिया अदा करना चाहिए कि जीवन ने तुम्हें बिसारा नहीं है.'

कैमरे का  काम यानी सिनेमेटोग्राफी, बैक ग्राउंड म्यूजिक, कम, छोटे और प्रभावी संवादों ने फिल्म को खास बनाया है. फिल्म सिनेमा हॉल में छूट नहीं जाती, साथ चली आती है न जाने कब तक साथ रहने को जैसे साथ चलती रहती है कोई कविता, किसी नदी की नमी, किसी पेंटिंग की लकीरें, उसके रंग.

यह अक्टूबर हर महीने में घुल जाएगा.

Friday, April 13, 2018

मुझे तेज़ धार वाली कवितायें चाहिए


मुझे तेज़ धार वाली कवितायें चाहिए
जिनके किनारे से गुजरते ही लहूलुहान हो जाए जिस्म
जिन्हें हाथ लगाते ही रिसकर बहने लगे
सब कुछ सह लेने वाला सब्र

मुझे ढर्रे पर चलती जिन्दगी के गाल पर
थप्पड़ की तरह लगने वाली कवितायें चाहिए
कि देर तक सनसनाता रहे ढर्रे पर चलने वाला जीवन
और आखिर बदलनी ही पड़े उसे अपनी चाल

मुझे बारूद सरीखी कवितायें चाहिए
जो संसद में किसी बम की तरह फूटें
और चीरकर रख दें बहरी सरकारों के
कानों के परदे

मुझे बहुत तेज़ कवितायें चाहिए
साँसों की रफ़्तार से भी तेज़
समय की गति से आगे की कवितायें
हत्यारों के मंसूबों को बेधती कवितायें
और हो चुकी हत्याओं के खिलाफ
गवाह बनती कवितायें

मुझे चाहिए कवितायें जिनसे
ऑक्सीजन का काम लिया जा सके
जिन्हें घर से निकलते वक़्त
सुरक्षा कवच की तरह पहना जा सके
जिनसे लोकतन्त्र को
भीड़तंत्र होने से बचाया जा सके

मुझे चाहिए इतनी पवित्र कवितायें कि
उनके आगे सजदा किया जा सके
रोया जा सके जी भर के
और सजदे से उठते हुए हल्का महसूस किया जा सके

मुझे चूल्हे की आग सी धधकती कवितायें चाहिए
खेतों में बालियों सी लहलहाती कवितायें चाहिए
मुझे मोहब्बत के नशे में डूबी कवितायें चाहिए
भोली गिलहरी सी फुदकती कवितायें चाहिए


मुझे इस धरती पर मनुष्यता की फसल उगाने वाली कवितायें चाहिए.

अपना हक छीन लेने वाली कवितायें चाहिए

मुझे स्थिर तालाब में
एक शरारती बच्चे द्वारा फेंकें गए कंकड़
सरीखी कवितायें चाहिये
जो स्थिरता को भंग कर दें

हाथ से छू जाए तो लहू रिसने लगे
ऐसे सीसे से सने मांझे सी कवितायेँ चाहिए.
अपने हक के लिए सदियों तक धरने पर बैठने वाली नहीं
उठकर अपना हक छीन लेने वाली कवितायें चाहिये

रोजमर्रा की ऊब भरी जिन्दगी से टकराने वाली
रोज नए रास्तों की तलाश करने वाली कवितायें चाहिए
सरहदों पर खिंची सीमाओं को मिटा देने वाली
सत्ताओं को औंधे मुंह गिरा देने वाली कवितायें चाहिये

मुझे बच्चों के बस्तों में छुपाकर रखी गयी कॉमिक्स सी कवितायें चाहिए
बिना पुकारे तुम तक पुकार बनकर पहुँच जाने वाली कवितायें चाहिये

मुझे शरद के कंधे से टिककर
दूर कहीं गुम हो जाने वाले रास्तों को
ताकती कवितायें चाहिए
तुम्हारी याद की तरह
अदरक वाली चाय में घुल जाने वाली कवितायें चाहिए.

Thursday, April 12, 2018

पुलिस, पुजारी और देश


जब कुछ भी नहीं पता था देश और समाज के बारे में. कानून और अपराध के बारे में. नहीं पता था धर्म का काम क्या है, कैसा होता है आस्थाओं का चेहरा, कि पुलिस किसे बचाती है, किससे बचाती है. (और वक़्त आने पर पुजारी और पुलिस से कौन बचाता है ) बहुत कम उम्र की एक छोटी सी बच्ची को तब से डर लगता था पुलिस और पुजारी दोनों से.

मंदिर में जाती तो प्रसाद देने वाला पुजारी को कभी प्रेम से, भक्तों को सम्मान से देखते हुए, कभी उनसे इंसानों की तरह पेश आते नहीं देखा. प्रसाद लेने के लिए जो लाइन लगा करती थी उसमें अपना नम्बर आते-आते वो लड़की डर से कांपने लगती थी बावजूद इसके कि साथ होते थे तमाम घरवाले, फिर भी. मोटे तोंद वाले पहलवान नुमा पुजारी ने उसके ठीक पहले वाली औरत को डांट दिया था. किसी तरह अपना नम्बर आते ही बेहद सावधानी से अपनी नन्ही हथेलियाँ प्रसाद लेने के लिए बढ़ा दिया करती थी. इतनी सावधानी से कि पुजारी की उँगलियाँ छू न जाएँ कहीं. टीका लगाते वक़्त कहीं पीठ पर हाथ न फेर दे पुजारी. एक बार आशीर्वाद देते हुए सर पर रखा हाथ उसकी पूरी पीठ पर फिसलता गया था, कई महीनों तक अंगारों सी दहकती रही थी उसकी पीठ. हालाँकि उसे नहीं बताया गया था 'बैड टच' के बारे में.

वो अख़बार नहीं पढ़ती थी, टीवी उन दिनों हुआ नहीं करते थे फिर कैसे उसके मन में पुलिस के प्रति इतना भय भर गया. पुलिस को देखते ही भीतर तक सहम जाया करती थी. माँ के पीछे छुप जाया करती थी लेकिन माँ से इस बारे में कुछ कह नहीं पाती थी. एक बार रेलवे स्टेशन पर एक पुलिसवाले को देखकर वो इतना डर गयी थी कि कई दिन तक उसे बुखार रहा. कोई नहीं समझ पाया था कि वो डर उस पुलिसवाले की उन नज़रों से उपजा था जो दूर से उसे देख रही थीं, और अश्लील तरह से मुस्कुरा रहा था वो. हालांकि किसी ने नहीं बताया था उसे सच्ची और झूठी मुस्कुराहटों के बारे में, अच्छी और बुरी निगाहों के बारे में.

आज समूचा देश पुलिस और पुजारियों की गिरफ्त में है. इतना अँधेरा है चारों ओर, इतना खौफ़. रास्ता कोई नहीं. और यह कोई दुर्घटना नहीं है, इस अँधेरे को बाकायदा उगाया गया है, बोया गया है. हम समझ क्यों नहीं पाते कि हमारे खिलाफ हमें ही इस्तेमाल किया जा रहा है सदियों से.


Thursday, April 5, 2018

मारीना मेरा पहला प्यार

जिसे आप प्यार करते हैं उस पर लिखना मुश्किल होता है. इसी मुश्किल के कुछ हिस्से 'समास 16' में प्रकाशित हुए हैं. यह शीघ्र प्रकाश्य पुस्तक के अंश हैं. मुझ तक इन अंशों को पढने के बाद प्रतिक्रियाएं तो पहुँचती रहीं लेकिन पत्रिका जाने कैसे रास्ते भटकती रही, मुझ तक पहुंची नहीं. आखिर एक सैलानी काम आया, संजय सैलानी ने पत्रिका भेजी जो मुझे आज ही मिली है. यह मेरे और मारीना के प्यार की दास्ताँ है. समझने वाले समझते ही हैं कि प्यार की दास्ताँ जैसी भी हो हर बार पलकें नम कर जाती है. 


मरीना त्स्वेतायेवा (8 अक्तूबर १८९२- 31 अगस्त १९४१)

मरीना त्स्वेतायेवा रूस की एक महान कवियत्री हैं. ‘थे’ शब्द का इस्तेमाल मैं जानबूझकर नहीं कर रही हूँ कि मैंने जिस मारीना को जाना था वो अपने समय और काल को पार करके मुझसे मिली थी. पहली ही मुलाकात में उससे दोस्ती हो गयी थी और उसके बाद यह दोस्ती अब तक बनी हुई है. मेरी मारीना तस्व्तायेवा से दोस्ती करवाई थी डा वरयाम सिंह ने. उनकी पुस्तक कुछ ख़त कुछ कवितायेँ मैंने करीब १४ बरस की उम्र में पढ़ी थी. उस छोटी सी उम्र में मुझे क्या समझ में आया क्या नहीं लेकिन कुछ तो था जिसने जिन्दगी को देखने का, रिश्तों को समझने का, भावनाओं को महसूस करने का ढब ही बदल दिया. ‘जीवन में मुझे मुलाकातें अच्छी नहीं लगतीं, माथे टकरा जाते हैं, जैसे दो दीवारें. इस तरह भीतर जाया नहीं जाता. मुलाकातें मेहराब होनी चाहिए.’ या किसी के विचार तो पसंद हो सकते हैं पर उसके नाखूनों के आकार सहन नहीं भी हो सकता है. उसके स्पर्श का प्रतिउत्तर तो दिया जा सकता है पर उसके मूल्यवान भावों का नहीं. ये अलग लग क्षेत्र हैं. आत्मा आत्मा से प्रेम करती है, होंठ, होंठो से लेकिन अगर आप इन्हें मिलाने लगेंगे या मिलाने का प्रयास करेंगे ईश्वर न करे आप सुखी नहीं होंगे.

जिन्दगी के प्रति प्रेम से भरी एक बच्ची किस तरह बड़े होते हुए चीज़ों को देखती है, महसूस करती है, रूस की क्रांति के दिन, पहले और दूसरे विश्व युध्ध का समय, पिता ईवान व्लादिरिमोविच इतिहासकार और रूस के संग्रहालय के संस्थापक. पिता की दूसरी पत्नी से जन्मी मारिना और अनास्तासिया दो बहनें. पिता की पहली पत्नी से जन्मे आंद्रेई और वलेरिया के साथ उनके रिश्ते. माँ की उदासियाँ, बीमारियाँ, माँ की असमय मौत और इन सबके बीच मारीना का भटकता कवि मन. कमसिन उम्र का प्यार और विवाह. पति का व्हाइट आर्मी से जुड़ा होना, देश के बिगड़ते राजनैतिक हालात और जूझना आर्थिक हालात से भटकना दर ब दर. भूख से बचाने के लिए बेटी को अनाथालय में छोड़ने का निर्णय और उसकी मृत्यु, बेटी के अंतिम संस्कार में शामिल न हो पाना कि दूसरी बेटी को तेज़ ज्वर. फिर देश से बाहर जाना. निर्वासन के अनुभव, पीड़ा, संघर्ष. आखिरी सांस तक जिन्दगी के लिए/प्रेम के लिए शिद्दत से महसूस करना और अंत में छूट ही जाना सब कुछ.

मारीना जिन्दगी के प्रति आकंठ प्रेम से भरी थी. प्रेम ही उसके लिए जिन्दगी का दूसरा नाम था. उसे अपने लिखे में ही मुक्ति मिलती थी. जिन्दगी की कठोरतम परिस्थितियों में भी उसने लिखना नहीं छोड़ा. लिखना उसके लिए सांस लेने जैसा था. अपनी आखिरी साँस लेने से पहले भी वह लिख रही थी. वो लिखती थी डायरी, खत, कवितायेँ, संस्मरण. उसे बहुत जल्दी किसी से भी प्रेम हो जाता था...लेकिन प्रेम के मायने उसके लिए दुनियावी मायनों से बहुत अलग थे.

डा वरयाम सिंह ने मारीना से मुलाकात कराकर उससे और मिलने की उसे और जानने की प्यास को बढा दिया था. कई बरस तक ‘कुछ ख़त कुछ कवितायेँ’ ‘आयेंगे दिन कविताओं के’ और बाद में ‘बेसहारा समय में’ पढ़ती रही. (ये तीनों किताबें डा वरयाम जी के ही अनुवाद हैं) इस बीच कुछ संस्मरण लिखे मारीना पर जिसमें मैं उससे बातें करती थी, सवाल करती थी. इन्हीं सबके दौरान एक बार एक दोस्त ने कहा कि इतना ही प्यार है मारीना से तो मिल आओ न वरयाम जी से. वरयाम जी से मिलने की बात सुनते ही मेरी आँखें भर आई थीं. आखिर वही तो थे जिन्होंने हाथ पकडकर दोस्ती करायी थी मारीना से. 2009 में मैं जे एन यू गई वरयाम जी से मिलने. वो बहुत प्रेम से मिले, उन्होंने मेरे द्वारा मारीना पर लिखे छुटपुट संस्मरण पढ़े, मेरे और मारीना के प्रेम के किस्से सुने और कहा, ‘तुम करोगी मारीना पर काम.’ ये उनका प्यार था कि उन्होंने मारीना पर रूसी भाषा वाली काफी किताबें मुझे दीं. मेरे लिए रूसी भाषा की वो किताबें सिर्फ कुछ काले अक्षर भर थीं फिर भी उन अक्षरों को छूते हुए महसूस करना था मारीना को उसकी भाषा में.

वरयाम जी ने जे एन यू मारीना पर सामग्री तलाशने में मदद की. मारीना को जितना जाना और जानने की इच्छा होती गयी. उसके और मेरे दरम्यान न सिर्फ सौ साल से अधिक का फासला था बल्कि बल्कि भाषाएँ भी दीवार थीं. जानकारियां आधी अधूरी ही मिलती रहीं. एक जगह से मिली जानकारी दूसरी जगह से मिली जानकारी से अलग होती तो मुश्किल और बढ़ जाती. ऐसे में मेरी सारी दुविधा को दूर किया मारीना ने ही कि मैंने उस पर किताब नहीं उसके बारे में इकठ्ठी की गयी जानकारियों पर आधारित कुछ संस्मरण लिखे. प्यार से. वो लगातार एक दोस्त की तरह इस पूरी यात्रा में मेरे पास रही, मेरे साथ रही.भाषा हमारे दरम्यान एक ही थी प्रेम की. तथ्य हो सकता है कुछ ऊपर नीचे हो गए हों लेकिन उसके भाव बचाए रखने का पूरा प्रयास किया है. उसे भाषा से पार जाकर, देश की सीमाओं से पार जाकर सुनने का, उसके लिखे को महसूस करने का प्रयास किया है. इसीलिए इसे नाम दिया है.’मारीना मेरा पहला प्यार’. उसके जीवन का जो टुकड़ा यहाँ दिया है उसका संदर्भ इतना है कि रूस से निर्वासित होकर जब मारीना पराये देशों में भटक रही थी, जिन्दगी के टुकड़े समेट रही थी तो बीच में कुछ हिस्सा प्राग में भी बीता. ये प्राग में बीते उसके दिनों की झलक है. ये अंश संवाद प्रकाशन से प्रकाशित होकर जल्द आने वाली पुस्तक ‘मारीना त्स्वेतायेवा मेरा पहला प्यार’ से हैं.



Tuesday, April 3, 2018

जब वह खुद से खुश नहीं रहती


वो जब अपने पास लौटना चाहती हैं
तो लौटती हैं रसोई में
बटोरना चाहती हैं सबकी मुस्कुराहटें
तो इंटरनेट पर खोजती हैं नयी-नयी  रेसिपी

भीतर के बिखराव सिमटते नहीं
तो समेटने लगती हैं बिखरा घर
पड़ोसन से बन सकें अच्छे रिश्ते
शामिल होती है मोहल्ले की चर्चाओं में

घरवालों को फ़ालतू सा लगता है उनका पढ़ना- लिखना
इसलिए किताबों को स्टोर में रख
किताबों वाली जगह पर सजाती हैं शो पीस

कोई कुहासा झांकता है पलकों से जब भी बाहर
उसे दिखाती हैं गुलदान में सजाये ताजा फूल
मन की चिड़िया उड़ने को होती है बेताब
तो देखती हैं चिड़ियों से भरा आसमान

उनसे सब खुश रहते हैं तब
जब वह खुद से खुश नहीं रहतीं,


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Sunday, April 1, 2018

सुकून नहीं संभलता


विरह संभल जाता है, दुःख संभल जाता है, मुश्किलें पार हो जाती हैं लेकिन वो एक लम्हा जो दिल से दिल की राह लेता हुआ आँखों में जा बैठता है वो संभाले नहीं संभलता. वो एक हाथ जो ठीक उस वक़्त काँधे पर महसूस होता है जब आप तन्हाइयों के रसातल में डूबते जा रहे हों उस हाथ की छुअन का जादू नहीं संभलता. इंतजार संभल जाता है, बाट जोहना संभल जाता है, महबूब की एक नज़र नहीं संभलती,आंसू संभल जाते हैं, पीड़ा की तो जैसे आदत सी हो चली हो, लेकिन राहत भरा एक पल का साथ नहीं संभलता. दूर देश बैठे किसी की याद में होने वाली आवाजाही नहीं संभलती, उस देश की हवाओं में घुलकर आने वाली सांसों की जुम्बिश नहीं संभलती, चौदस का चाँद संभल जाता है, रातरानी की खुशबू संभल जाती है, दोस्त की हथेलियों में हथेलियाँ छुपा देना और चुपचाप साथ चलते जाने का सुख नहीं संभलता...

मौसम अंगड़ाई ले रहा, जागती हुई रात का जादू सांसें ले रहा है, इश्क़ शहर में नन्हे से ख़्वाब को सर्द हवाओं ने आ घेरा है, जिसे गर्म साँसों की चादर में सुकून है...ये सुकून नहीं संभलता. सच्ची.

(इश्क़ शहर, मुद्दत बाद मिला इतवार)