Thursday, October 27, 2016

सपनों सा सफ़र, सफर में सपने...ख्वाहिश की लंदन डायरी



जबसे पता चला था कि 2 जून 2016 को मैं अपने मामा मामी के पास मम्मी के साथ लंदन जाने वाली हूं वो भी पूरे 20 दिन के लिए मुझे यह सब एक सपने जैसा लग रहा था। मैंने यह सब बात अपनी सबसे प्रिय मित्र कोमल को बताई तो वह भी मेरे लिए बहुत खुश हुई। वह रोज मुझसे पूछती कि मेरी तैयारी कहां तक पहुंची। हर दिन मानो जैसे एक साल जितना लंबा लगता था। दिन ही नहीं कट रहे थे। दिन में कम से कम मेरी और मम्मी की लंदन जाने के बारे में  दस बार बात होती थी। सबसे ज्यादा उत्सुकता मुझे यह थी कि नया देश देखना कैसा अनुभव होता है. मेरे लिए यह सब किसी ख्वाब सा था। मम्मी को हल्की सी चिंता भी थी कि हम लोग ठीक से बिना किसी मुश्किल के मामा के पास पहुंच जायें। 

आखिर वो दिन आ ही गया जिसका इंतजार था। सफर कुछ इस तरह था कि हम पहले देहरादून से दिल्ली गये और फिर दिल्ली से लंदन। हम लोग सुबह से तैयारी करते-करते आखिरकार ट्रेन  में बैठ ही गये। रात का वक्त था। हम लोग खाना खाकर ख्वाबों के साथ सो गये। सुबह आंखें खुलीं तो मानो सूरज कह रहा हो कि बस अब उठो, दिल्ली आ चुका है। जल्दी से मैं और मम्मी ट्रेन से उतरे और जैसा कि तय हुआ था पापा हमें स्टेशन लेने आये। हम पापा के साथ मेट्रो पकड़कर सीधे एयरपोर्ट पहुंचे। पहली बार मैंने अंतरर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा देखा था। हम लोग अंदर गये और पता नहीं क्यों मुझे अजीब सा लगने लगा। जबकि यह तो पता ही था कि 20 दिन बाद वापस आना है। शायद यह पहली बार अपने देश से दूर जाने का एहसास के कारण हुआ हो। हर काउंटर पर जाकर पासपोर्ट दिखाना, जांच की औपचारिकताएं पूरी करने के बाद हम एक जगह बैठे और हमने सबको फोन करके बता दिया कि हम अब हवाई जहाज में बैठने जा रहे हैं। थोड़ी ही देर में हम हवाई जहाज के अंदर थे। 

इतना बड़ा हवाई जहाज देखकर तो मेरी आंखें खुली की खुली रह गयीं। जब मैंने यह देखा कि हमारी कुर्सियों के आगे छोटे-छोटे टीवी लगे हैं तो मैंने सोचा कि अब दस घंटे अच्छे से कटेंगे। पर मेरी तबियत कुछ खास ठीक नहीं रही। मैंने अपना सर धीरे से मम्मी की गोद में रखा और ऐसे ही सफर कट गया। मैंने रास्ते में कुछ भी नहीं खाया पिया। जब मैं उठी तो उद्घोषणा हुई कि हम लंदन में उतरने वाले हैं। मम्मी के मना करने के बाद भी कान में एयर प्रेशर कम  करने वाली एक्सरसाइज न करके कान में रूई लगाई ताकि हवा के दबाव से दर्द न हो। 

कुछ ही समय के बाद हम लंदन के हीथ्रो हवाई अड्डे पर थे। वहां पर इमिग्रेशन कराने के बाद सामान लेकर हम बाहर निकले। सामने ही मामा खड़े नजर आए जो कि हमें लेने आए थे। हम लोग जैसे ही उनसे मिले मामा ने मम्मी के पैर छुए और मुझे गले लगा लिया। हम बाते करते हुए टैक्सी तक पहुंचे। वहां की ठण्ड देखकर मानो ऐसा लग रहा था कि भारत की सारी ठण्ड यही लोग चुरा लाए हों। दांत भी किटकिटा रहे थे। हम लोग टैक्सी की खिड़की के बाहर आश्चर्य से देख रहे थे। भारतीय समय के हिसाब से रात के 1 बजे थे इसलिए आंखों से नींद झलक रही थी। सब कुछ एक सुंदर सपना लग रहा था और ऐसा महसूस हो रहा था कि अभी मम्मी जोर से आवाज देंगी और सपना टूट जायेगा। लेकिन इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। हां, मैं हकीकत में लंदन में थी। हम जैसे ही मामा के घर पहुंचे मेरी मामी और स्वाति दीदी ने हमारा स्वागत किया। इतने लंबे सफर के बाद मामी का बनाया हुआ स्वादिष्ट खाना खाकर मुझे बहुत मजा आया। क्योंकि मैंने रास्ते में कुछ नहीं खाया था इसलिए मेरी भूख भी खूब बढ़ी हुई थी। 

हमें नींद भी बहुत आ रही थी। हमने खाना खाने के बाद कुछ बातें की फिर सो गई। और फिर जेटलेग के हिसाब से हम सुबह पांच बजे उठ गये इसके बाद शुरू हुई हमारी घुम्मकड़ी...

(अगली कड़ी में बर्किनघम पैलेस, चर्चिल हाउस, ट्रेफ्लेगर स्क्वॉयर और, ग्रीनविच...)

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल शनिवार (29-10-2016) के चर्चा मंच "हर्ष का त्यौहार है दीपावली" {चर्चा अंक- 2510} पर भी होगी!
दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Livepathshala india said...

very very nice