Friday, October 28, 2016

ख्वाहिश की लंदन डायरी- 2

बर्किंघम पैलेस, चर्चिल हाउस, टेफल्गेर स्कॉवयर-

पहले दिन नाश्ता करने के बाद मामी ऑफिस चली गईं और हम सबका घूमने जाने का प्लान बना। हम सबकी टोली निकली लंदन की सैर करने। पहली दफा वहां की सड़कों पर चलना किसी ख्वाब जैसा था। मुझे काफी समय लगा खुद को यह समझाने में कि हां सचमुच मैं लंदन में ही हूं। यह कोई सपना नहीं है। हम सबने ट्यूब पकड़ी और पहुँच गये ग्रीन पार्क। वहां से गुजरते समय ऐसा लगा कि इतनी हरियाली है यहाँ. यही पेड़ भारत में भी तो हैं लेकिन मैंने उन्हें इस नजरिये से कभी क्यों नहीं देखा। चाहे जितनी भी तारीफ कर ली जाए लंदन की लेकिन अपने भारत की सुंदरता भी कुछ कम नहीं। 

ग्रीन पार्क से गुजरने के बाद मेरे सामने अकल्पनीय, आलीशान हवेली थी। बातचीत के दौरान मामा ने बताया कि यह रानी एलिजाबेथ-2 का महल है। हां, ये वही रानी है जिसके मुकुट में कोहिनूर हीरा जड़ा है। बहुत सुंदर थी वह हवेली। हर तरफ लंबी टोपी और वर्दी वाले सिपाही सुरक्षा में खड़े थे। अंदर जाने की किसी को अनुमति नहीं थी। भीड़भाड़ और चर्चाएं यह चल रही थीं कि रानी अभी किसी दूसरे देश में गई हैं।
लंदन की सड़कों पर चलने का भी एक अलग अनुभव था। लगभग जितना भी लंदन हमने घूमा या तो पैदल या ट्यूब में। महल से कुछ ही दूर पर यूके के पूर्व प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल की आलीशान मूर्ति थी। उस मूर्ति के साथ फोटो खिंचवाने के लिए लंबी लाइन थी। इसके बाद हमने टेफल्गेर स्कावयर का रुख किया। वहां आर्ट गैलरी भी थी जहां महान कलाकारों द्वारा बनाई हुई अद्भुत पेंटिग्स बनी हुई थीं। पेंटिंग्स में मुझे कुछ खास समझ तो नहीं आईं पर हां उनमें रंगों का खेल बहुत अच्छा था। देखते ही देखते समय कैसे बीत गया कुछ पता नहीं चला। शाम होने लगी और हम लोग घर की तरफ बढ़ गये। मुझे और मम्मी को भारतीय समय के हिसाब से जल्दी नींद आने लगती थी। घर आते ही हम दोनों सो गये। उस अद्भुत दिन के ख्वाबों में डूबने के लिए।

ग्रीनविच- एक बात इस देश की बड़ी ही अजीब थी कि गर्मियों में यहां रात के आठ बजे सूरज ढलता था। दस बजे तक तो उजाला ही रहता था। सुबह चार बजे ही फिर से सूरज दादा प्रेजेंट लगा देते थे। वहां धूप कितनी भी रहे हल्की सी हवा ठिठुरा ही देती थी। अगले दिन हमारे साथ मामी भी गईं। हम सब लोग जा रहे थे ग्रीनविच। माना जाता है कि ग्रीनविच से एक काल्पनिक रेखा गुजरती है जिसे समय का घर भी कहा जाता है। 
अंदर जाकर एक संग्रहालय था जिसमें छोटे-छोटे पुर्जों से बनी हुई कई छोटी सी मशीने थीं। एक लकड़ी से बनी दूरबीन भी थी जो कि पहले के समय में बहुत दूर तक का रास्ता दिखाती थी। सबसे सुंदर चीज वहां मुझे लगी खुले हरे-भरे मैदान। वहां कई बड़े व हरे मैदान थे जो कि सारा ध्यान अपनी ओर खींचते थे। उस दिन हमने वहां का सबसे चर्चित ब्रिज, 'टॉवर ब्रिज' देखा और एक अच्छा संयोग यह बना कि जब हम लोग वहां से गुजर रहे थे तब ही वहां उस टॉवर ब्रिज के नीचे से एक बड़ा जहाज गुजरा और अब समय था उस ब्रिज के खुलने का। ब्रिज धीरे-धीरे खुला। यह एकदम अकल्पनीय दृश्य था। मामा ने कहा की वो इतने सालों से लंदन में हैं लेकिन ऐसा नज़ारा तो उन्होंने भी कभी नहीं देखा था. उसके बाद हम लोग मामी के एक दोस्त के घर डिनर के लिए गए। वहां जाकर हमने ढेर सारी मस्ती की. 

(अगली कड़ी में शेक्सपियर का घर, मैडम तुषाद म्यूजियम और थेम्स में मस्ती...जारी...)

6 comments:

शिवम् मिश्रा said...

ब्लॉग बुलेटिन टीम और मेरी ओर से आप सभी को धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएं|


ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "कुम्हार की चाक, धनतेरस और शहीदों का दीया “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि- आपकी इस प्रविष्टि के लिंक की चर्चा कल रविवार (30-10-2016) के चर्चा मंच "आ गयी दीपावली" {चर्चा अंक- 2511} पर भी होगी!
दीपावली से जुड़े पंच पर्वों की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बढ़िया वर्णन

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत सुंदर , दीप पर्व मुबारक !

इच्छा नदी के पुल पर said...

ख्वाहिश की लेखनी में बहुत सहज रवानगी है। इतनी सरलता के साथ इन विवरणों को दर्ज करने के लिए उसे बधाई और खूब सारी प्यार

Nutan Gairola said...

ख़्वाहिश की जितनी तारीफ़ की जाय कम ही है। बच्चे ने डायरी के माध्यम से हमें भी लन्दन यात्रा करवा दी। खूब अच्छा लिखा है वह आगे भी लिखती रहे, शुभकामनाओं के साथ