Thursday, August 11, 2016

तुम चाहकर भी वो सब वापस नहीं ले सकते...

अदबी ख़ुतूत : ग्यारहवीं कड़ी 




सिमोन का ख़त नेल्सन के नाम
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मरिया पोपोवा को फ़्रेंच लेखिका सिमोन का ये ख़त जब मिला तो उन्हें जैसा महसूस हुआ वैसा ही कुछ मुझे भी हुआ। सिमोन की किताब ‘द सेकेण्ड सेक्स’ पढ़ते हुए चीज़ों को देखने और समझने का नज़रिया नहीं बल्कि नज़र मिलती है। सिमोन को जाना तो सार्त्र को भी जाना, दोनों के लिखे पढ़े को भी और उनके गरिमामय रिश्ते को भी। उनके बीच की ख़तो-किताबत से भी गुज़रना हुआ। लेकिन अदबी ख़ुतूत के लिए ख़त खंगालते हुए जो ख़त हाथ लगा वो सिमोन ने अपने प्रेमी नेल्सन एल्ग्रेन को लिखा। १९४७ में सिमोन जब शिकागो की यात्रा पर थीं, वहीं उनकी मुलाकात अमरीकी लेखक नेल्सन से हुई। उनके दरम्यान प्यार पनपा जिसे उन्होंने कई बरस तक दूरियों के बीच सहेजा। १९५० में नेल्सन ने इस रिश्ते से खुद को अलग कर लिया और उन्होंने अपनी पूर्व पत्नी से १९५३ में पुनः विवाह कर लिया। यह ख़त सिमोन ने १९५० में रिश्ते के टूटने की तकलीफ से गुज़रते हुए लिखा था।

मैं दुःख के सूखे और गुस्से के ठंडेपन में हूँ, मेरी आँखों में एक आँसू तक नहीं, इतनी सूखी आँखें...लेकिन मेरा दिल...उफ्फ्फ...जैसे सब कुछ बिखर गया है...

(.......)

मैं दुखी नहीं हूँ। हालाँकि आश्चर्यचकित हूँ। खुद से बहुत दूर हूँ और तुम्हारे बहुत बहुत बहुत करीब हूँ। मैं तुम्हें सिर्फ दो बातें बताना चाहती हूँ, इसके बाद मैं तुमसे कुछ भी नहीं कहूँगी, वादा करती हूँ। पहली बात कि मुझमें उम्मीद बहुत है, मैं तुमसे एक बार ज़रूर मिलना चाहती हूँ। कभी, किसी रोज़, कहीं...लेकिन याद रखना मैं तुमसे कभी खुद नहीं कहूँगी मिलने को। इसमें मेरा कोई गुरूर नहीं है, लेकिन मैं चाहती हूँ कि यह मुलाकात तब हो, जब तुम्हें इसकी ज़रूरत महसूस हो, तुम्हें इच्छा हो तो मैं उस पल का इंतज़ार करूंगी। जब तुम्हारी इच्छा हो मुझे बताना।

इसका यह अर्थ नहीं कि मैं यह मानने लगूँगी कि तुम फिर से मुझसे पहले की तरह प्यार करने लगो या मेरे साथ अन्तरंग हो। नहीं, ऐसा नहीं होगा लेकिन मैं यह भी मान नहीं पा रही हूँ कि मैं अब तुम्हें देख नहीं पाऊंगी, कि मैंने तुम्हारे प्यार को खो दिया है और अब तुम्हारा प्यार ‘है’ नहीं रहा बल्कि ‘था’ हो गया है।

जो भी हो नेल्सन, तुमने मुझे बहुत दिया है। और जो तुमने मुझे दिया उसका मेरी जिन्दगी में बहुत महत्व है। तुम चाहकर भी वो सब वापस नहीं ले सकते। तुम्हारा साथ, तुम्हारा एहसास मेरे लिए बहुत कीमती था प्रिय, मैं अब भी वो प्रेम की ऊष्मा, वो ख़ुशी महसूस कर रही हूँ जो तुम्हारी तरफ देखते हुए मेरे दिल में उतरती जाती थी। मुझे उम्मीद है कि हमारी दोस्ती, हमारे रिश्ते की वो नाज़ुकी, वो ऊष्मा कभी ख़त्म नहीं होगी। मुझे यह कहते हुए बहुत अजीब लग रहा है लेकिन सच तो यही है कि मैंने तुम्हें बेपनाह प्यार किया। जब मैं तुम्हारी बाँहों में होती थी तो किस कदर अपने आपको भुला दिया करती थी।

लेकिन मेरे प्यार की वजह से तुमको चिंता में पड़ने की ज़रूरत नहीं है। न ही मेरे प्रेम के बारे में सोचते हुए किसी ड्यूटी की तरह मुझे ख़त लिखने की। तुम लिखना तब, जब सच में तुम्हारा दिल करे लिखने को यह जानते हुए भी कि तुम्हारे ख़त मुझे किस कदर ख़ुशी से भर देंगे...

ओह, सारे शब्द किस कदर मूर्खतापूर्ण लग रहे हैं। तुम बहुत करीब महसूस हो रहे हो, मुझे भी अपने करीब आने दो प्रिये। बिलकुल वैसे ही जैसे हम पहले करीब हुआ करते थे, मुझे अपने दिल में छुप जाने दो...

तुम्हारी
सिमोन

(प्रस्तुति- प्रतिभा कटियार )

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (13-08-2016) को ""लोकतन्त्र की बात" (चर्चा अंक-2433) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "बस काम तमाम हो गया - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !