Thursday, August 25, 2016

मैं सुख में सिर्फ रो सकती हूँ- सिल्विया प्लाथ




सत्रहवाँ साल, सिल्विया प्लाथ का ख़त उसकी माँ के नाम

२७ अक्टूबर १९३२ को अमेरिका में जन्मी सिल्विया ज़िन्दगी से इस कदर भरपूर थी कि क़ायनात के ज़र्रे-ज़र्रे में धड़कती ज़िन्दगी को पी लेना चाहती थी, जी लेना चाहती थी...वो इस कदर जीना चाहती थी कि महज़ इकतीस बरस की उम्र में ही अपनी ज़िन्दगी गँवा बैठी। जो लोग सुसाईड करते हैं वो ज़िन्दगी से हारे हुए नहीं होते, असल में वो ज़िन्दगी से बहुत ज़्यादा भरे होते हैं...शायद किसी लम्हे में कोई तालमेल बिगड़ जाता है और वो ज़िन्दगी में रत्ती भर भी आयी कमी को सह नहीं पाते...क्या जाने ये सच हो भी, न भी हो...लेकिन सिल्विया प्लाथ का यह ख़त देखकर मालूम तो ऐसा ही होता है। ये ख़त सिल्विया ने अपनी माँ को सोलह साल पूरे होने पर लिखा था, तारीख ठीक ठीक नहीं मिलती इसकी- प्रतिभा 


माँ,
मुझे सत्रहवें साल की इस खुशबू को, उमंग को सहेजकर रखना है। हर दिन बेशकीमती है। मुझे यह सोचकर ही अजीब लगता है कि जैसे जैसे मैं बड़ी होती जाऊँगी, धीरे-धीरे ये लम्हे बीत जायेंगे...यह मेरी ज़िन्दगी का सबसे सुंदर समय है...
अगर मैं अपने पिछले बीते हुए सोलह बरसों की बात करूँ तो मैंने सुख और दुःख दोनों को ही देखा है। लेकिन अब दोनों की ही कोई कीमत नहीं। मैं अब तक अपने बारे में अनजान ही हूँ। शायद हमेशा ही रहूँगी। लेकिन मैं आज़ाद महसूस करती हूँ...बिना किसी भी ज़िम्मेदारी के बंधन के...


मैं चाहती हूँ कि ज़िन्दगी मुझे बहुत प्यार करे। मैं इन लम्हों में बहुत खुश हूँ। अपनी डेस्क पर बैठी हूँ। खिड़की से बाहर घर के चारों ओर लगे पेड़ों को देख रही हूँ, गली के दोनों ओर लगे पेड़ों को भी। मैं हमेशा चीज़ों को देखना और महसूस करना चाहती हूँ, ज़िन्दगी को छूना चाहती हूँ, उसमें रच बस जाना चाहती हूँ। लेकिन इस तरह भी नहीं कि खुद को महसूस न कर सकूँ....
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माँ, मुझे बड़ा होने से डर लगता है। मुझे शादी करने से डर लगता है। मुझे तीनों वक़्त खाना बनाने से दूर ही रखना, मुझे रोज़मर्रा के जो काम होते हैं उनसे उकताहट होती है।
मैं आज़ाद रहना चाहती हूँ। मैं पूरी दुनियाँ के बारे में जानना चाहती हूँ...मुझे लगता है कि मैं चाहती हूँ कि मुझे ख़ुदा की लाडली लड़की के तौर पे जाना जाये। सोचती हूँ कि अगर मैं इस देह में न होती तो? लेकिन मैं तो अपनी देह को, अपने चेहरे को, अपनी साँसों को भी बहुत प्यार करती हूँ।

मुझे मालूम है कि मैं बहुत लम्बी हूँ और मेरी नाक मोटी है, फिर भी मैं आईने के सामने इतराती हूँ, बार-बार देखती हूँ कि मैं कितनी सुंदर दिखती हूँ। मैंने अपने दिमाग में अपनी एक छवि बनाई है कि मैं खूबसूरत हूँ। क्या यह गलत है कि मैं अपने बारे में इस तरह सोचती हूँ? ओह, कभी-कभी लगता है कि क्या बेवकूफ़ी की बातें मैंने लिखीं, कितनी नाटकीय।

वैसे परफ़ेक्शन क्या है...क्या कभी भी मैं वहाँ पहुँच सकूँगी? शायद कभी नहीं। मेरी कवितायें, मेरी पेंटिंग्स, मेरी कहानियाँ...सब अधूरी अभिव्यक्तियाँ....

एक वक़्त आएगा जब मुझे खुद का सामना करना होगा...करना ही होगा। अभी भी सोचती हूँ...कैसी होगी मेरी आने वाली ज़िन्दगी, कैसा होगा मेरा कॉलेज...मेरा करियर? एक अनिश्चितता है...जिससे डर भी लगता है, जाने मेरे लिए क्या बेहतर होगा, मुझे पता नहीं। मुझे तो आज़ादी पसंद है। मैं बंदिशों की निंदा करती हूँ। हाँ, मुझे मालूम है कि मैं उतनी भी समझदार नहीं हूँ। मेरे सामने रास्ते खुले हुए हैं लेकिन वो किधर जा रहे हैं, किन मंज़िलों की तरफ, मैं नहीं देख पा रही हूँ...

लेकिन मैं सब भूलकर खुद को बहुत प्यार करती हूँ। जानती हूँ, अभी तो मेरी ज़िन्दगी की शुरुआत ही है, लेकिन मैं मजबूत हूँ...

माँ, तुम मुझसे पूछती हो न कि मैं क्यों अपना जीवन लिखने में जाया कर रही हूँ,
क्या मुझे इसमें आनंद आता है
क्या इसका कोई फ़ायदा भी है
इन सबसे ऊपर क्या इससे कुछ कमाई भी होगी
अगर नहीं, तो इस सबका क्या फ़ायदा?

माँ, मैं लिखती हूँ सिर्फ इसलिये
कि मेरे भीतर एक आवाज़ है
और वो आवाज़ हमेशा नहीं रहेगी...

सच कहूँ माँ, मैं सुख में सिर्फ रो सकती हूँ।

तुम्हारी प्यारी और खुश बेटी
सिवी

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-08-2016) को "माता का आराधन" (चर्चा अंक-2448) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Onkar said...

बहुत सुन्दर पत्र