Thursday, November 26, 2015

विवाह संस्था पर सवाल तो हैं



'शादी जब पुरानी हो जाती है तो वो सड़ने लगती है। उसमें से बदबू आने लगती है।' फिल्म इज़ाजत का यह संवाद अक्सर दूसरे अल्फाजों में दूसरे हालात में कानों से टकराते रहते हैं। जिस प्रेमी का हाथ थामकर दुनिया हसीन हो उठती है, जिसकी एक मुस्कुराहट पर जां निसार करने को जी चाहता है, जिसके एक आंसू पर विकल हो उठते हैं जिसके बिना एक पल भी जीना दुश्वार होता है उसी प्रेमी के साथ विवाह करने के बाद ऐसा क्या हो जाता है कि दुनिया का सबसे खूबसूरत रिश्ता रिसने लगता है। न भी हो प्रेम विवाह, अरेंज्ड मैरिज में भी तो लगभग ऐसा ही होता है न? शादी जैसे भी हुई हो शुरुआती दौर में जोर से लहलहाती है, खिलखिलाती है, चहचहाती है। दो मासूम लोग, विपरीत लिंग का आकर्षण, ढेर सारी आजादी। मानो पंख लग जाते हैं। फिर धीरे-धीरे कपूर सा उड़ने लगता है प्यार। दो जन खुशबू पकड़ने को बेताब हो उठते हैं। सारी ताकत लगा देते हैं। खुशबू उड़ती ही जाती है। बेचैनी बढ़ती जाती है। एक दूसरे पर आरोप, शिकायतें, नाराजगी, जो किया जो नहीे किया उसका हिसाब-किताब और अंत में एक सूखी टहनियों वाले पेड सा रिश्ता जिसकी टहनियों पर रस्मो-रिवाज, जिम्मेदारियां, चिड़चिड़ाहटें टंगे हुए उसे बदसूरत बनाते नज़र आते हैं।

जो जरा भी जिंदगी में, रिश्तों में डेमोक्रेटिक होने पर यकीन करता है, जो सोचता है कि रिश्तों की खुशबू कपूर सी उड़ जाने वाली नहीं ठहर जाने वाली होने चाहिए वो शादी के नाम पर घबराने लगता है। लड़कियां हों या लड़के दोनों ही। शायद ऐसे ही सवालों, घबराहटों के बीच से लिव इन रिलेशनशिप की राह निकालने की कोशिश की गई होगी। मतलब साफ है, साथ रहने में दिक्कत नहीं लेकिन शादी में है। क्यों है ऐसी शादी जो है भी जरूरी और जिसमें सुकून भी नहीं। 

क्यों शादी होते ही दो लोग एक दूसरे पर औंधे मुंह गिर पड़ते हैं। पूरी तरह अपने वजूद समेत ढह जाते हैं। दूसरे के वजूद को निगल जाने को आतुर हो उठते हैं। क्यों स्त्रियां चाहे वो कितनी ही पढ़ी-लिखी या नौकरीपेशा हों एक पारंपरिक सांचे में ढलते हुए देखी जाने लगती हैं और वे स्वयं ढलने भी लगती हैं। क्यों पुरुष भी एक मर्दवादी सोच से अनचाहे ही सिंचित होने लगते हैं और बच नहीं पाते और पत्नी को सुरक्षा देने और उन पर अपना अधिकार समझने के कन्फ्यूजन में।

आज जब विवाह संस्था पर सवाल उठने लगे हैं तो जरा यह समझने की भी जरूरत है कि वो क्या चीज है जो शादी जैसे रिश्ते को सवालिया कठघरे में खड़ी कर रही है। कितने बरसों का साथ से ज्यादा जरूरी है समझना कि वो साथ कितना सुंदर और मीठा था। शादी की 50वीं सालगिरह मनाना, सामाजिक उत्सवों में ग्रुप फोटों में मुस्कुराते हुए नजर आना, फेसबुक पर अपने प्रेम के इजहार वाली तस्वीरें चिपकाना अलग बात है और एक खुशनुमा, भरोसे से भरा, सम्मान से भरपूर, एक-दूसरे को समझने वाला रिश्ता जीना और ही बात है। क्यों शादी ऐसा रिश्ता अक्सर बनते-बनते रह जाती हैं जिसमें दो लोग एक साथ उग रहे हों, बढ़ रहे हों और एक साथ महक रहे हों। 

आखिर शादियों में स्पेस क्यों नहीं होता। क्यों दो लोग एक-दूसरे पर शुरुआत में प्यार के नाम पर टूट पड़ते हैं और बाद में एक-दूसरे से असहनीय तरह से चिढ़ने लगते हैं। पति और पत्नी अनजाने ही किस तरह एक-दूसरे के प्रति प्यार में आकंठ डूबे होते हुए ही आक्रामक होने लगते हैं उन्हें पता नहीं चलता। उन्हें यह पक्का यकीन हो चुका होता है कि उनके साथी की खुशी की सारी वजहें सिर्फ और सिर्फ उससे ही होनी चाहिए। अगर उसके पास दुखी होने या खुशी होने की कुछ अपनी निजी वजह हैं तो यह बात बेहद बेचैन करती है उन्हें। ”तुम खुश हो लेकिन तुम्हारी खुशी की वजह मैं तो नहीं हूं ना। यह बात मुझे चैन से रहने नहीं देती।” ऐसी पीड़ाएं उभरती हैं। 
यह रिश्ता अगर समाज, परंपराओं और रीति रिवाजों की भेंट न चढ़ा होता, अगर दो व्यक्तित्व सामाजिक परवरिश के चलते एक समर्पण और दूसरा अधिकार की चाह लिए न बढ़े होते, अगर दो लोगों के रिश्तों में, उनके जीने के ढंग में हर वक्त कोई अपनी नाक न घुसा रहा होता तो शायद विवाह संस्था का रूप कुछ और ही होता। समानता और सम्मान की भावभूमि पर खड़ा रिश्ता तां उम्र महकता रहता। समाज ने विवाह संस्था की नकेल अपने हाथ में ले रखी है वो दो लोगों के बेहद निजी पलों को निजी भावनाओं को भी नियंत्रित करता रहता है। वो नकेल विवाह संस्था को तो बचा लेती है लेकिन उसमें होने वाले प्रेम को खा जाती है। 

निकोलाई चेर्नीस्कोवेस्की के उपन्यास की वेरा याद आती है जो विवाह को एक खुले स्पेस और पूरी आजादी सम्मान और प्रेम के साथ जीना जानती है। जबरन एक साथ होने या सोने की जिद, जुनून या दबाव से बहुत दूर...हंसता मुस्कुराता रिश्ता जिसका आधार सिर्फ एक-दूसरे का सम्मान और प्यार है। एक-दूसरे पर अटूट भरोसा है। 

प्रकाशित 

6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (28-11-2015) को "ये धरा राम का धाम है" (चर्चा-अंक 2174) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

dr.mahendrag said...

बिना स्पेस तो फिर रिश्ते को ढोना ही पड़ता है और कई मर्तबा रिश्ते दरक जाते हैं , आज के होने वाले व बढ़ते तलाक इस का माकूल उदहारण हैं , आज की ज्वलंत सामाजिक समस्या पर आपकी बेवाक अभिव्यक्ति हेतु आभार

yashoda Agrawal said...

आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 30 नवम्बबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

Onkar said...

विचारोत्तेजक लेख

Kailash Sharma said...

सार्थक प्रश्न उठाता बहुत सटीक और सारगर्भित आलेख...

Manju Mishra said...

”तुम खुश हो लेकिन तुम्हारी खुशी की वजह मैं तो नहीं हूं ना। यह बात मुझे चैन से रहने नहीं देती।” ऐसी पीड़ाएं उभरती हैं ..

ekdam sahi vishleshan kiya hai, shayad vajah bhi ekdam sahi pakdi hai, kyonki baki sari uljhane iske as-pas hi janamti aur ghoomti hain .