Thursday, June 12, 2014

मुरझाई नींदों का सबब ....


मेरा भी अजीब हिसाब है। पहले खुद हर रोज नींदों की तह बनाकर सिरहाने रख लेती हूं, फिर खाली आंखों से नींद तलाशती हूं। छत, दीवार, दीवार पर लगी घड़ी, पेंटिंग, पर्दे, रैक में लगी किताबें, उलझे पड़े अखबार...दीवार पर पड़े सीलन के निशान, वो छोटा सा निशान जहां पहले शायद कील रही होगी और कील के न रहने से वो खाली पड़ा है जैसी और न जाने कितनी चीजों से गुजरती हैं आंखें। लेकिन नींद नहीं मिलती। ज्यों-ज्यों रात गहराती है कमरे की चीजें और जीवन के बीते लम्हे और भी ज्यादा साफ नजर आने लगते हैं। आंखें इन चीजों में स्मृतियों के पन्नों में ऐसे उलझती हैं कि नींद का ख्याल भी गुम हो जाता है।

सुबह को सूरज जब आंखों की तलाशी लेता है तो नींद उसे वहां मिलती नहीं। वो कमरे की तलाशी लेता है और सिरहाने से नींद बरामद करके मुस्कुराता है।' पगली ...तेरी आंखों के ठीक नीचे थी नींद और तू...? तूने रात का नियम तोड़ा है....रात में सोने का नियम...सजा तो मिलेगी?' सूरज कहता है। सजा वाली बात पर मेरा ध्यान नहीं जाता, बस नियम तोड़ने वाली बात पर जाता है। यह बात मुझे अच्छी लगती है। सूरज तलाशी लेकर जा चुका था। उसने मेरे लिए किस सजा का ऐलान किया मैंने सुना ही नहीं लेकिन अब मेरे पास मेरी रात की खोई हुई समूची नींद थी और एक प्याला चाय भी। मैंने नींद से माफी मांगी और सामने वाले आम के पेड़ पर चल रहा चिड़ियों का खेल देखने लगी।

आज चिड़ियों के खेल में रवानगी नहीं थी। उनमें वो चंचलता नहीं, शोखी नहीं, एक उदासी थी। आज उन्होंने ठीक से दाना भी नहीं खाया। एक उदास चिड़िया अपनी सहेली से कह रही थी, 'जिन पेड़ों पर हमारा आशियाना होता है, जिस पर हम चहकते हैं, उछलते हैं, खेलते हैं जिस पर हम मौसमों के गीत गाते हैं उन्हें भी इंसानों ने शमशान घाट बना डाला। किससे पूछकर वो हमारे आशियाने पर अपनी वहशियत की निशानियां टांग जाते हैं।'' पेड़ों की हर शाख उदास है इन दिनों,' उसकी सहेली ने कहा। 'सबको छाया, फल देने वाले पेड़ों की शाखों को हैवानियत का बोझ उठाना पड़ रहा है। '

'क्या हम कुछ कर नहीं सकते,' छोटी चिड़िया ने बड़ी चिड़िया से पूछा। बड़ी चिड़िया चुप रही। ' बता न  माई, सुना है संसद में सुनवाई होने पर सब ठीक हो सकता है...क्या हम सारी चिड़िया मिलकर संसद में नहीं जा सकतीं? क्या हम उनसे कह नहीं सकती कि बाद में बनाना बड़े-बड़े पुल, बाद में बनाना बड़े मॉल, बाद में लाना बड़ी कंपनियां, सबसे पहले इस धरती पर बहने वाली रक्त की धार को तो रोको, इंसानियत की चीखों को तो रोको...और अगर नहीं रोक सकते तो आओ हमारे साथ, हम मिलकर उन शिकारियों की आंखें नोच लेंगे...'

बड़ी चिड़िया दाना चुगने में लग गई लेकिन उसका दाना खाने का मन नहीं किया, फिर उसने पानी में चोंच डाली लेकिन शायद उसकी प्यास भी मर गई थी.....

मैंने वापस कमरे में जाकर देखा कि मैं नींद की जिस डाल को सहेजकर आई थी, वो अब मुरझाने लगी थी....

5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल शनिवार (14-06-2014) को "इंतज़ार का ज़ायका" (चर्चा मंच-1643) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

धीरेन्द्र अस्थाना said...

और अगर नहीं रोक सकते तो आओ हमारे साथ, हम मिलकर उन शिकारियों की आंखें नोच लेंगे...'


कुछ तो करना होगा।


Onkar said...

विचारणीय प्रस्तुति

Point said...

जबरदस्त आपके हर शब्द मोती से है | बहुत समलकर और सहेज कर पिरोया है,आपने |

Vaanbhatt said...

खूबसूरत...सुन्दर...