Sunday, March 9, 2014

आईना आंख चुराता क्यों है...


जबसे पहनी है अपने होने की महक
आईना आंख चुराता क्यों है...

अभी-अभी वो लड़की मेरे पहलू से उठकर गयी है। उसकी खुशबू, उसकी सांसों में रची-बसी हिम्मत और उसकी आरजुओं की खनक सब बिखरा पड़ा है यहीं। वो लड़की जिसने अभी-अभी जीना सीखा है। अपनी सांसों की लय को अपनी हथेलियों में थामा है। वो लड़की जिसकी आंखों में ख्वाबों का कारवां है। ख्वाब जो उसके खुद के हैं। हिम्मत जो उसके चेहरे को संवारती है वो हिम्मत उसकी खुद की है, उसे किस राह पर चलना है और किस पर नहीं यह चुनाव उसकी खुद की समझ है। यह लड़की कौन है आखिर...? यह आज के दौर की लड़की है। सोच से, समझ से, हिम्मत से भरी हुई लड़की। जूझने का माद्दा लिये मुस्कुराहटों से भरपूर यह लड़की आपको कहीं भी नज़र आ जायेगी। इसका यह अर्थ नहीं कि पहले की लड़कियों में हिम्मत नहीं थी, सपने नहीं थे बस कि अब उसने पहरेदारी में सपने देखने से इनकार कर दिया है, एक मुट्ठी आसमान से अब उसका काम नहीं चलता। उसे भरपूर उड़ान के लिए पूरा आसमान चाहिए। इस पूरे आसमान को हासिल करने के लिए वो संघर्ष की आंच में खुशी से तपने को तैयार है। इसके लिए उसे लंबी चैड़ी डिग्रियों की, मोटी तनख्वाह वाली नौकरी की, मोटी-मोटी किताबों की दरकार नहीं, उसने बस खुद को पहचाना है।

सचमुच अभी जो लड़की कुछ देर पहले मेरे साथ बैठकर चाय पी रही थी और बता रही थी कि किस तरह उसने वो करने के लिए जो वो खुद करना चाहती थी घर छोड़ दिया। श्रद्धा यही नाम बताया था उसने। वैसे नाम कुछ भी होता क्या फर्क पड़ता उसकी कहानी में। कहानी कहो या जिंदगी एक ही बात है, एक समय के बाद जिंदगी कहानी सी ही तो लगने लगती है। घर छोड़ना जरूरी था क्या? यह सवाल उसके कानों में झूल रहा था। जाहिर है बहुतों ने पूछा होगा, उसने उन्हें क्या जवाब दिया क्या नहीं मुझे नहीं पता लेकिन जो जवाब उसने खुद को दिया था वो दिलचस्प था, कि लड़कियों की आजादी सिर्फ उनके ब्वाॅयफ्रेंड या उनकी पसंद की शादी भर से जुड़ी बात नहीं है। जैसा कि आमतौर पर समझ लिया जाता है। बल्कि यह उससे काफी आगे की बात है। नहीं है मेरा कोई ब्वाॅयफ्रेंड, नहीं करनी मुझे किसी से शादी बावजूद इसके जीना है अपनी मर्जी का। तलाशने हैं अपने रास्ते। कि बने बनाये रास्तों पर चलना ऊब देता है। वो जिंदगी ही क्या जिसके होने न होने का किसी को फर्क ही न पड़े।

श्रद्धा फिलहाल उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव के स्कूल में बच्चों को पढ़ा रही है। मां-बाप से छुपती फिर रही है कि अगर उन्होंने उसे ढूंढ लिया तो जबरन कहीं ब्याह देंगे। और उसके बाद श्रद्धा की जिंदगी भी किसी रोबोट सी हो जायेगी जिसके लिए वो कतई तैयार नहीं थी। उसने बच्चों की हथेलियों को थामा और अपनी जिंदगी की नई राह पर कदम रख दिया। हां, यह श्रद्धा की आंख का ही सपना है कि हर बच्चे का बचपन खिलखिलाता हुआ हो। वो स्कूल में पढ़ाने की बात नहीं करती, जीने की बात करती है। अभी श्रृद्धा ने छवि राजावत जैसी सफलता नहीं हासिल की है। उसकी मुट्ठी में यूएन में जाकर अपनी शख्सियत का झंडा गाड़ आने जैसी खबरें नहीं हैं, अभी उसके पीछे लोगों के विश्वास का काफिला नहीं है लेकिन उसकी आंखों में चमक है उस रास्ते पर चल पाने की जो उसने खुद तलाशा है। आसमान के सूरज ने जरूर अपनी गठरी बांध ली थी लेकिन श्रद्धा के इरादे पूरी बालकनी में बिखरे पड़े थे।

श्रृद्धा के जाते ही उसके जैसी तमाम मुस्कुराहटें मेरी आंखों में तैर गईं। ये कैसी बयार है फिजाओं में....बड़ी-बड़ी डिग्रियों वाले खेतों में बड़ी-बड़ी नौकरियों के सपने नहीं पलते। जीवन की सार्थकता की तलाश उगती है। तयशुदा राहों का सफर रास नहीं आता कि आजादी का स्वाद भाता है। आजादी जो सृष्टि को नया रूप रंग दे, जो जिंदगी को असल मायने दे, जो मुस्कुराहटों की वाजिब वजह बने।

चलते-चलते श्रद्धा मेरे दरवाजे पर आत्मविश्वास का एक गुच्छा टांग गई थी। डरती नहीं हूं किसी से, खुश हूं कि मर्जी का जी रही हूं। कितना लंबा सफर तय किया है इन मर्जियों ने। मर्जियां जो किसी ने गढ़ी नहीं हमारे जेहन में, जो किसी सोशल कंडीशनिंग से नहीं आती, परिपक्व समझ से आती हैं। मर्जियां जो काॅर्पोरेट के आलीशान एयरकंडीशंड आॅफिसों से इतर मुट्ठी भर सपने जीने की राह पर चलना चाहती हैं।

श्रद्धा अकेली नहीं है, कम ही सही लेकिन और भी स्त्रियां हैं जिन्होंने जिंदगी की लग्जरी को नहीं जिंदगी को अपना ध्येय बनाया। जो अपने व्यक्तित्व को विस्तार देने में खुश हैं। जो नहीं मानती किसी ऐसे नियम को जो उनकी हदें तय करते हों। कि अब वो अपने नियम खुद बनाने में यकीन जो करती हैं। नहीं करती परवाह कि उनके जीने से किसके और कितने नियम टूटते हैं...अपने आंचल को उसने कमर में कस लिया है...उसके आत्मविश्वास की खुशबू से ये जहां महक रहा है...सुना तुमने ये जो चारों ओर फिजाओं में खुशबू बिखरी हुई है ना ये नये दौर की स्त्रियों के आत्मविश्वास की महक है..

(डेली न्यूज़ में ५ मार्च २०१४ को प्रकाशित )


1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।