Wednesday, January 29, 2014

वह भर पेट संगीत नहीं लिख पाता है...


क्या तुमने वह संगीत सुना है,
जिसे कोई भूख के लिए बजा रहा होता है?

बंधे-बंधाए सुर के बीच में कहीं उसकी उंग्लिया गलती से कांप जाती है।
कहते हैं, जब दूर देश से उसकी प्रेमिका का खत उसे मिलता था..
तो वह उस ख़त में प्रेम नहीं.... पैसे तलाशता था।

सुना तुमने.... सुनो...
भूख के लिए उसकी उंग्लिया फिर कांप गई।
लोग उससे कहते हैं कि वह बहुत अच्छा संगीत लिखता है।
तो वह कहता है कि... मैं नहीं लिखता, लिखता तो कोई ओर है...
मैं तो बस उसे सहता हूँ।

संगीत उसकी धमनियों में नहीं है...
वह उसके पेट निकलता है।
हर उंग्लियों की गलती पर उसके संगीत में आत्मा प्रवेश करती है।
कहते है... वह भर पेट संगीत नहीं लिख पाता है...
उसके लिए उसे भूखा रहना पड़ता है।

भूख...
भूख एक आदत है.... बुरी आदत।
जो उस व्यक्ति को लगी हुई है...
जिसे वह लगातार सहता है।

- मानव कौल 

6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (30-01-2014) को बसंत की छटा ( चर्चा - 1507 ) में "अद्यतन लिंक" पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Lalit Chahar said...

सुन्दर प्रस्तुति...
आपका मैं अपने ब्लॉग ललित वाणी पर हार्दिक स्वागत करता हूँ मैंने भी एक ब्लॉग बनाया है मैं चाहता हूँ आप मेरा ब्लॉग पर एक बार आकर सुझाव अवश्य दें...

मिश्रा राहुल said...

काफी उम्दा रचना....बधाई...
नयी रचना
"सफर"
आभार

पारुल "पुखराज" said...

बेहतरीन ..

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : दिशाशूल : अंधविश्वास बनाम तार्किकता

प्रवीण पाण्डेय said...

भूख तोड़ कर रख देती है, संगीत टूट से कहाँ सधा है।