Friday, January 27, 2012

ये रौशनी की खुशबू....


यह उस देश की कहानी है, जहाँ कभी दिन उगता ही नहीं था. धरती के किसी भी कोने में रौशनी का एक कतरा तक न पहुँचता था. उस देश के लोगों को ऐसे ही बिना रौशनी के रहने की आदत हो चली थी. उन्हें अँधेरे में ही साफ़ नजर आता था. सारे काम एकदम ठीक से चलते थे. जब जिसका जी चाहता, वो सो जाता और जब नींद पूरी हो जाती तो उठकर काम पर चल देता. लड़की उसी देश की रहने वाली थी. चूंकि रात और दिन जैसा कुछ था ही नहीं तो लड़की की आँखें हमेशा कुछ न कुछ तलाशती रहती थीं. वो घर के कामकाज निपटाती, फिर खुद को सजाती सवांरती, बरामदे में बैठकर कुछ कढाई करने लगती. अँधेरे में भी उसके सारे धागे चुस्ती से गढ़े गए लगते थे. फिर वो ऊब जाती और जंगल की और चल देती. उसे रस्ते में कई लोग सोते हुए मिलते, कुछ काम की और जाते हुए कुछ लौटते हुए. वो जंगल के हर पेड़, हर बूटे से वाकिफ थी.

उसकी सखियाँ कोई नहीं थीं. जंगल ही उसका सखा था. वो अपने मन की सारी बातें जंगल को बताती थी. उसने हर पेड़ का कुछ नाम रख दिया था. वो जंगल में पहुंचकर पेड़ों के आवाज देकर पुकारती और वो पेड़ अपनी जगह पर खड़े-खड़े ही मुस्कुराने लगता. लहराने लगता. उसकी शाखाएं लड़की की ओर बढ़तीं लेकिन लड़की शरारत से पीछे हट जाती. फिर वो दुसरे पेड़ को आवाज देती और वो पेड़ उसकी आवाज सुनकर बेसब्र हो उठता. फिर वो एक-एक कर जंगल के सारे पेड़ों और लताओं के नाम लेती और पूरा जंगल झूमने लगता. जंगल में रहने वाले पशु पछी भी जंगल के संग झूमने लगते. अपनी काली जिन्दगी का यही हिस्सा लड़की को सबसे ज्यादा पसंद था.

कई दिन हुए लड़की को जंगल आये हुए तो जंगल में हलचल हो उठी. अब जंगल उठकर जा तो सकता नहीं था तो उसने वहीँ से लड़की को आवाजें देना शुरू किया. जंगल के लगातार तेजी से झूमने से तूफ़ान सा आ गया. कुछ पेड़ों ने खुद को ही नुकसान पहुंचा लिया. पूरे शहर में हलचल होने लगी कि किसी बुरी आत्मा का साया है जिसकी वजह से यह तूफ़ान आया है. वैसे तो लोगों को अँधेरे में जीने कि आदत थी लेकिन इस तूफ़ान में जो अफरा-तफरी मची उसकी वजह से अँधेरे में दिखना थोडा कम हो गया और लोग आपस में टकराने लगे.

उधर लड़की तेज़ ज्वर से ग्रस्त थी और एकटक छत को देखे जा रही थी. सोना उसे आता ही नहीं था, तो उसका पलकों को बंद करना या खोलना दोनों का अर्थ एक ही होता था. शहर में उठी हलचल की  आवाजें उसके कानों तक भी पहुंची. लड़की के अशक्त की देह ने उसकी उठने की इच्छा पर लगाम लगा रखी थी. उसने करवट बदली और निगाह अब छत की बजाय दरवाजे पर टिका दीं. कुछ आवाजें उसने अपने कानों के आस पास गूंजती महसूस हुईं. उन आवाजों को हाथ बढाकर पकड़ लिया. उस आवाज का चेहरा उसने झट से पहचान लिया. ये तो जंगल के अन्दर घुसते ही जो मोटा सा सागौन का पेड़ मिलता है,  उसकी आवाज थी. जिसका नाम उसने कनिक रखा था. उसने उस आवाज को अपने पास बिठाया. अँधेरे में उसे कनिक की आवाज का चेहरा साफ़ नजर आ रहा था. उस पर परेशानी का भाव था. लड़की ने अपने तपते हाथ उसके माथे पर रखकर पुछा कि क्या हुआ कनिक, आज बड़े परेशान हो...कनिक रोने लगा. लड़की भी रोने लगी. उन दोनों के रोने के साथ ही बरसात शुरू हो गयी. एक तो तूफ़ान ऊपर से बरसात...शहरवासी व्यथित हो उठे. अँधेरे से उलझते भिड़ते लोग अपने लिए कोई सुरछित कोना तलाशने लगे. लड़की न जाने कबसे रोना चाहती थी...उसका रोना रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था. जैसे जैसे वो रोती जा रही थी, बरसात गाढ़ी होती जा रही थी. लोगों को यकीन हो गया कि प्रलय जिसका नाम है यह वही है. लोग ईश्वर को याद करने लगे. 

कनिक लड़की को इस कदर रोते देख और भी बेचैन हो गया. उसने अपनी आँखें पोंछी और लड़की के कंधे पर हाथ रख दिया. 'क्या हुआ...तुम क्यों रो रही हो?'
लड़की ने रोते हुए ही जवाब दिया, 'मुझे नहीं पता कि मैं क्यों रो रही हूँ लेकिन रोने में मुझे सुख मिल रहा है...जैसे सदियों से रुकी नदी को रास्ता मिल गया हो.'
'तुम जंगल क्यों नहीं आई इत्ते दिनों से?'  कनिक ने पुछा...यह सवाल सुनकर लडकी का रोना रुका. उसने कनिक कि ओर देखते हुए कहा, 'मुझे ज्वर है..मै हिल भी नहीं सकती. पर मुझे तुम लोगों कि याद आती थी...सच्ची...'  जवाब देकर लड़की फिर से रोने लगी.
'तुम रोना बंद करो,' कनिक ने कहा. 'तुम्हें पता है शहर का क्या हाल है...'
'नहीं,' लड़की ने आंसू पोंछते हुआ  पूछा.
'तुम्हारे न आने से हम सब के सब परेशान हो गए. जंगल के सारे पेड़ जब परेशान हों तो तूफ़ान तो आना ही था. और अब तो बरसात भी शुरू हो गयी है. बेचारे शहर वाले...' कनिक उठने को हुआ...तो लड़की ने उसका हाथ पकड़ लिया. 'कनिक ये आंधी तूफ़ान रोकना होगा. मुझे ले चलो अपने साथ. मैं तुम्हारे साथ चलूंगी तो तूफ़ान रुकेगा.' लड़की ने आंसू पोंछे और बरसात जरा थम सी गयी.

लड़की कनिक का हाथ पकड़कर जंगल कि ओर भागी...घुप्प अँधेरे वाले उस शहर में चाँद कि भी रौशनी नहीं थी उस रोज. लड़की जंगल के ठीक बीच में पहुंचकर घुटनों के बल बैठ गयी. कनिक से हाथ छुड़ाकर उसने ऊपर हाथ उठा दिए...वो फिर से रोने को हुई कि जंगल के सारे पेड़ों ने एक साथ उसे अपने घेरे में ले लिया. वो सब लड़की को ठीक देखना चाहते थे. जंगल की जड़ी बूटियों ने उसका ज्वर तो उतर दिया लेकिन उसका उदास मन अब भी वैसा ही था. उसने जंगल के सबसे बूढ़े पेड़ से पुछा, 'दादा ये जिन्दगी अच्छी क्यों नहीं लगती? इस शहर में इतना अँधेरा क्यों है...मेरा मन हंसने को क्यों नहीं होता?'  बूढ़े पेड़ के माथे पर सलवटें आयीं. उसने थोडा रूककर कहा, 'बेटा पहले इस धरती पर खूब रौशनी हुआ करती थी. इस शहर के लोग खूब खुश रहा करते थे. तीज त्यौहार मनाया करते थे. ढोल, ताशे बजते थे. नाच गाना होता था....' कहते- कहते बूढा पेड़ अचानक रुक गया...'
'फिर क्या हुआ?'  लड़की ने  पूछा .
 'जानती हो इस धरती पर अँधेरा क्यों हुआ. इस धरती पर. शहर के हुक्काम को एक लड़की से प्यार हो गया. लेकिन लड़की तो किसी और को चाहती थी. उसने हुक्काम के प्यार को ठुकराकर अपने प्रेमी का हाथ थाम लिया. वो इस धरती पर रौशनी का आखिरी रोज था. हुक्काम ने इस शहर के सारे प्रेमियों के क़त्ल का फरमान  सुनाया. उसके बाद इस धरती पर कभी सूरज नहीं उगा, धरती पर कभी कोई फूल नहीं खिला, लोग हँसना भूल गए और....और इस धरती पर हमेशा के लिए अँधेरा छा गया...'
लड़की बूढ़े बरगद से यह सब सुनकर उदास हो गयी....उसने रोना बंद कर दिया.
'इस धरती पर ये जो अँधेरा है न दादा, ये मेरे मन का अँधेरा है...लेकिन अब ये नहीं रहेगा. अब इस धरती पर रौशनी का उदय होगा. किसी हुक्मरान के डर से यह धरती रौशनी से विहीन नहीं होगी, प्यार के फूलों से महरूम नहीं होगी..'
'तो क्या होगा? जंगल ने एक सुर में  पूछा. बस, थोडा सा इंतजार करो...' ऐसा कहकर लड़की वापस लौट गयी.
जंगल अपने ही भीतर उजाले उगने की उम्मीद से थोडा रोमांचित हुआ.

लड़की लौटी तो उसके चेहरे पर मुस्कान थी. उसका आँचल हवा में लहरा रहा था. सारा जंगल उसे विस्मय से देख रहा था. लड़की ने मुस्कुराकर लड़के की कलाई थाम ली. उसने जंगल की उपस्थिति में अपने प्रेम को आलिंगन में लिया और धरती पर रौशनी का आह्वान किया. लड़के ने लड़की के माथे पर लाल टीका लगाया और ठीक उसी वक़्त जंगल के  घुप्प अँधेरे को चीरते हुए एक रौशनी की किरण दाखिल हुई. सूरज ने इस धरती पर पांव रखा...जंगल, नदी, पहाड़, सड़कें सब के सब रौशनी से नहा उठे...लड़की के अवसाद का अँधेरा छटा और प्रेम की रौशनी उसके चेहरे पर खेलने लगी....

पूरी धरती पीले फूलों से लहलहा उठी...

10 comments:

महफूज़ अली (Mahfooz Ali) said...

बहुत अच्छी लगी यह कहानी....

बाबुषा said...

ग्लोबस की पीली कमीज़ के साथ ब्लू डेनिम्स निकाल ली गयी थी आज के लिए पर लास्ट मोमेंट में लखनऊ से भेजे गए काले कुर्ते पर दिल और नज़र जा ठहरे. तुम्हारे भेजे हर रंग मुझ तक वसंत के रंग जैसे पहुंचे हैं. एंड आय मीन इट ! ( सुन्दर बात कही है..अब न कहना की डायलॉग राइटर बदल ! :P

:P ) यहाँ तक कि वो सफ़ेद कुर्ता भी रंगीन लगता है.

पीले फूलों के पर्व की शुभकामनाएं .

सुन, उन दिनों ऐसा ही मौसम था..ऐसी ही हवा चलती थी.. जब मुझे टायफायड हुआ था.... :-)

varsha said...

vaah vaah pratibhaji kya khoob swagat kiya hai vasant ka.mubarak ho.

Pratibha Katiyar said...

@ Varsha ji, Shukriya!

Rajesh Kumari said...

bahut sundar pyaar ki kaliyan khilati hui kahani.vasant ki shubhkamnayen.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर।
आज सरस्वती पूजा निराला जयन्ती
और नज़ीर अकबारबादी का भी जन्मदिवस है।
बसन्त पञ्चमी की हार्दिक शुभकामनाएँ!

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

सुंदर कहानी
बात कहने का अंदाज कुछ हटकर है।बहुत बढिया

***Punam*** said...

nai kahani....naya andaaz....!!

Anand Dwivedi said...

बड़ा नामुकिन सा लग रहा है ...इस जंगल में अब सूरज का आ पाना ...तूफान और बरसातें
एक अंतहीन सिलसिला ...
हाँ एक शख्सियत है जो सूरज ला सकती है ... मगर ... :)

Pratibha Katiyar said...

@ Aanand- वो रौशनी ज़रूर आएगी आनंद जी, इस 'मगर' को पानी में छोड़ आइये...