Monday, October 17, 2011

एक रोज यूं ही...


आंखों में नींद का बादल अभी अटका ही हुआ था, हालांकि धूप आंगन से होते हुए ड्राइंगरूम तक आ पहुंची थी. चिडिय़ां अपने सुबह के कलरव के बाद डालियों से चिपककर ऊंघ रही थीं और हवाओं में थोड़ा भारीपन शामिल हो चुका था. उसने घड़ी की ओर देखा तो ग्यारह बज रहे थे. ओह...इतनी देर हो गई. आजकल जिंदगी की तरह नींद का हिसाब-किताब भी बिगड़ गया है. इसके पहले कि दिन शुरू होता फोन बज उठा. 
तुम आ रही हो ना? 
कौन? वो आवाज पहचान नहीं पाई.
तुम्हें क्या हर बार बताना पड़ेगा कि कौन. नंबर सेव कब करोगी.
अब तक लड़की को आवाज पहचान में आ चुकी थी. 
कभी नहीं सेव करूंगी. लड़की ने शरारत से कहा.
तुम मर क्यों नहीं जातीं? लड़के ने झुंझलाकर कहा.
यार, किसपे मरूं? कोई मिला ही नहीं. लड़की अब पूरे शरारत के मूड में आ चुकी थी.
अरे हम क्या मर गये हैं? 
शरारत का असर लड़के पर भी होने लगा था.
तुम? अब इतने बुरे दिन भी नहीं आये मेरे. लड़की खिलखिला पड़ी.
लड़का उसके इस तरह खुलकर हंसने से खुश हो गया.
जरा धीरे हंसो. न$जर लग जायेगी. उसने टोका.
यार रोका मत करो, कभी-कभी तो हंसती हूं.
अच्छा ठीक है. हंसो और हंसते-हंसते आ जाओ.
कहां आ जाऊं? लड़की ने पूछा.
तुम भूल गईं? आज तुम्हें मेरे घर आना था. तुमने वादा किया था. 
आज क्या है? लड़की ने याद करने की कोशिश की.
आज सनडे है. और तुमने कहा था कि तुम सनडे को घर आओगी.
ऐसा वादा मैंने क्यों किया होगा भला? जरूर मैंने पी रखी होगी उस रोज. लड़की फिर हंस पड़ी. 
अब जो भी हो, वादा किया है तो निभाना पड़ेगा. लड़का वादे का सिरा पकड़े हुए फोन पर लटका हुआ था.
देखो, मैं कोई हरिशचंद्र तो हूं नहीं कि वादा कर दिया तो पूरा ही करना है. अरे मैं मुकर गई वादे से. जाओ, नहीं आती...
लड़की की आवाज में अब भी शरारत थी.
यूं मैं भी किसी को बुलाता नहीं हूं पर अब सोच रहा हूं बहुत सा खाना बन गया है वेस्ट हो जायेगा तो गरीबों को दान कर दिया जाये...
अच्छा जी, ये बात. दोनों हंस दिए.
सुनो, मैं अभी सोकर उठी हूं. और मेरा सर भी दर्द कर रहा है. मैं कैसे आऊंगी. ड्राइव करने में दिक्कत होगी. लड़की ने टालना चाहा.
तुम अगर चाहोगी तो कुछ भी मुश्किल नहीं होगा ये मैं जानता हूं.
रहने देते हैं. फिर कभी. लड़की ने कहा.
ठीक है तुम्हारी मर्जी. लड़के ने अब हथियार डाल दिए.
फोन कट गया और सन्नाटे ने खिलखिलाहटों की जगह लेनी शुरू कर दिया. 
थोड़ी देर में लड़की ने न जाने क्या सोचकर नंबर रीडायल कर दिया. 
क्या हुआ? उधर से आवाज आई.
मैं आ रही हूं. दस मिनट में निकलती हूं.
ओके. उसने कोई सवाल नहीं किया.
खुद को रास्तों में छोड़ते हुए लड़की को हमेशा अच्छा लगता था. मौसम चाहे कोई भी हो. उसने तेज धूप की चूनर ओढ़ी. मुस्कुराहट की पाजेब को जीन्स से बिना मैच किये हुए भी पहना और हाथ में घड़ी. घड़ी को पहनना उसे हमेशा ऐसा लगता था कि उसने वक्त को अपनी कलाई पर बांध लिया हो. उसकी कलाई पर बंधकर वक्त उसका हो जाता हो जैसे. शहर की सड़कों से उसकी दोस्ती पुरानी थी. पलक झपकते ही वो लड़के के पास थी.
वो यहां क्यों आई अभी तक इसका कोई जवाब नहीं था. 
लड़का उससे क्यों मिलना चाहता था, इसका उसके पास कोई जवाब नहीं था. 
उन दोनों ने सवालों से मुंह चुराया और मुस्कुराहटों से एक-दूसरे का अभिवादन किया. लड़के ने उसे गले लगाया और लड़की ने पलकें झपकायीं. 
दिन के सारे पहर उनकी बातचीत, शरारत, खिंचाई, उलाहनों में उलझे रहे. दुनिया भर के साहित्य के पन्नों से होते हुए वे एक-दूसरे से उलझे रहे. काफ्का कभी चाय की चुस्कियां लेते तो दोस्तोवस्की तकिये पर सर टिकाये होते. नेरूदा कमरे में टहल रहे होते तो रिल्के चुपचाप आकर लड़की के पास बैठ जाते.
तुम्हें पता है मेरा एक सपना था, लड़की ने कहा. उसकी आवाज कुछ नम थी. लड़का उसके चेहरे की ओर देखने लगा.
मैं हमेशा सोचती थी कि कोई होगा जिसे मुझसे बेहद प्रेम होगा, मुझे जिससे बेहद प्रेम होगा. उसे मैं अपनी पसंद की सारी कविताएं सुनाऊंगी. सारा संगीत उसके आसपास बिखेर दूंगी, उसके जीवन को रंगों से भर दूंगी और सारी रंगोलियां निखर उठेंगी. 
उसकी आवाज ही नहीं आंखें भी भीगने लगीं.
और ऐसा हो न सका...बेचारा बच गया. लड़के ने चुटकी ली.
लड़की ने उसे गुस्से से देखा. उसके गुस्से में अपनापन था.
बेचारा क्यों? लड़की ने पूछा
अरे यार, जिसको तुम इतना पकाती वो बेचारा ही होता ना...
हूं...लड़की ने मुस्कुराहट में झूठमूठ की नाराजगी का रंग घोला.
लड़की बातें करते-करते थक गई थी. लड़का उसके चेहरे पर उतरते आलस को गौर से देख रहा था. आलस उसकी आंखों में उतर रहा था और वो लगभग उनींदी हो चली थी. तुम सो लो थोड़ी देर मैं खाना बनाता हूं. लड़के ने कहा.
ठीक है...लड़की ने आंखें बंद कीं.
लड़का किचन तक जाकर लौट आया. उसे देखता रहा. लड़की ने अधखुली आंखों से पूछा क्या हुआ?
कुछ नहीं एक बात याद आ गई.
क्या..लड़की ने लापरवाही से पूछा.
कहीं पढ़ा था मैंने सौंदर्य देह में नहीं भंगिमा में होता है. 
अच्छा? लड़की अब भी आलस में रही.
तुम इस समय बहुत सुंदर लग रही हो. अगर कोई पेंटर तुम्हारी तस्वीर बनाये तो वो दुनिया की सबसे सुंदर स्त्री की तस्वीर होगी. 
लड़के के स्वर में गांभीर्य था. लड़की गंभीरता को घर छोड़कर आई थी.
चलो-चलो खाना बनाओ. फ्लर्ट किसी और को करना. 
वो चला गया. लड़की की आंख से कुछ बह निकला. वो आलस नहीं था. दु:ख भी नहीं था. प्यार भी नहीं था. लड़की ने खामोशी में खुद को समेटा और अपने इर्द-गिर्द ढेर सारे पीले फूलों को खिलते देखा. खुद को उनकी खुशबू में पैबस्त होते महसूस किया. उसे लगा वो पीले फूलों की चादर में लिपटी है. लड़की ने अचानक आंखें खोल दीं. लड़का किचन में काम कर रहा था. लड़की ने किचन में जाकर नई फरमाइश की. 
मुझे चाय पीनी है.
लड़का चौंका. नींद पूरी हो गई तुम्हारी?
हां, हो गई. चाय बनाओ पहले. खाना बाद में. 
जो आज्ञा. उसने हंसकर कहा और चाय का पानी चढ़ा दिया. 
दिन ने पलकें झपकायीं तो शाम को मौका मिल गया आने का. एक पूरा दिन लड़की ने लड़के से बेवजह बात करने और झगडऩे में बिता दिया.
तुम मेरे प्रेमी नहीं हो. लड़की ने कहा.
हां, जानता हूं. 
दोस्त भी नहीं. लड़की ने फिर कहा.
हां, शायद हम दोस्त भी नहीं हैं. हम बरसों बाद मिल रहे हैं और एक-दूसरे के बारे में कुछ भी नहीं जानते. जानना चाहते भी नहीं. लड़के ने लड़की की बात पर स्वीकृति की मुहर लगाई.
फिर हम एक-दूसरे के साथ क्यों हैं? 
लड़की ने पूछा.
होने और न होने के बीच एक खाली जगह होती है. हमारे जीवन में शामिल अधिकांश लोग उसी खाली जगह में रहते हैं. लेकिन वो समझ नहीं पाते और खुद को किसी न किसी दायरे में कैद करते हैं. 
पर मुझे तुमसे मिलकर अच्छा लगा. लड़की ने कहा.
इतना काफी है. ज्यादा दिमाग मत लगाओ. लड़के ने कहा.
लड़की ने कलाई पर बंधे वक्त को घूरा और गाड़ी की चाभी उठा ली.
लड़के ने उसे रोका नहीं. 
तुम्हारे लॉन में कितने सुंदर फूल खिले हैं. लड़की फूलों को देखकर मुस्कुराई.
हां. लेकिन इनमें से कोई भी फूल तुम्हारे लिए नहीं है. लड़के ने स्पष्ट किया.
क्यों? लड़की नाराज हुई. 
क्योंकि तुम न तो मेरी दोस्त हो न प्रेमिका. तो मैं तुम पर एक फूल क्यों जाया करूं. लड़का शरारत से मुस्कुराया.
अच्छा, ये बात...वो दौड़ते हुए गुलाब की क्यारी तक जा पहुंची और इसके पहले कि लड़का उस तक पहुंचकर उसे रोकता लड़की ने एक फूल तोड़ लिया...
ओह...ये तुमने क्या किया?
लड़के ने कहा.
फूल तोड़ लिया और अब बालों में लगा भी लिया. ऐ...ये देखो. उसने लड़के को चिढ़ाया.
ये तुमने अच्छा नहीं किया. लड़का गंभीर हो चला था.
क्यों? लड़की ने भी गंभीर होकर पूछा.
यार, अब तुम्हें मेरी प्रेमिका बनना होगा. वर्ना ये लाल गुलाब क्या कहेगा. इस फूल को उसकी सफलता महसूस कराने के लिए हमें प्रेम करना पड़ेगा. लड़का मुस्कुराया.
लेकिन तुम तो पहले से ही किसी के प्रेम में हो? 
तो क्या हुआ, मैं कई प्रेम एक साथ कर सकता हूं. लड़के ने घर का दरवाजा बंद करते हुए चुहल की. 
आखिर ये एक फूल की अस्मिता का सवाल है.
लड़की ने अपना पर्स उसकी पीठ पे दे मारा. बदमाश...
लड़का हंस दिया. रहने दो. तुम वहीं होने और न होने के बीच ही रहो. वर्ना कौन अपनी हड्डियां तुड़वायेगा.
सही कहा. लड़की हंस दी.
चांद ने आसमान के रजिस्टर पर अभी-अभी साइन किये थे. वो इन दोनों को देख रहा था.
दोनों ने विदा ली. न अगली मुलाकात का वादा, न बेचैनी, न कोई असहजता. बस एक खिलखिलाता हुआ दिन आसानी से गु$जर गया. 
उन दोनों ने एक-दूसरे की ओर पीठ करते हुए खुद से कहा, हां ये प्रेम नहीं है. दोस्ती भी नहीं. पर जो भी है अच्छा है. बालों में टंके फूल की खुशबू में खुद को जज्ब करते हुए लड़की लौट रही थी अपने ही पास.

('द पायनियर' में 23 अक्टूबर को प्रकाशित)

37 comments:

बाबुषा said...

देवी , चरण कहाँ हैं आपके ?
आशीर्वाद दीजिये भंगिमाओं की राजकुमारी !!

बाबुषा said...

Jokes apart.... really loved this piece ! :-)
सुन्दर है :-)
पर सुन यार ..बेचैनी तो होती ही है ! :-) हर केस में ..चाहे वो होने वाला हो, चाहे न होने वाला..और चाहे दोनों के बीच वाला ! :-)

नीरज गोस्वामी said...

उसने तेज धूप की चूनर ओढ़ी. मुस्कुराहट की पाजेब को जीन्स से बिना मैच किये हुए भी पहना और हाथ में घड़ी.

काफ्का कभी चाय की चुस्कियां लेते तो दोस्तोवस्की तकिये पर सर टिकाये होते. नेरूदा कमरे में टहल रहे होते तो रिल्के चुपचाप आकर लड़की के पास बैठ जाते.

होने और न होने के बीच एक खाली जगह होती है. हमारे जीवन में शामिल अधिकांश लोग उसी खाली जगह में रहते हैं. लेकिन वो समझ नहीं पाते और खुद को किसी न किसी दायरे में कैद करते हैं.

चांद ने आसमान के रजिस्टर पर अभी-अभी साइन किये थे

ऐसे अनूठे और दिलकश जुमलों से सजी आपकी कथा में इतनी रवानी थी के उसे बिना रुके एक सांस में पढ़ गया...और अंत तक पहुँच कर मुंह से वाह अपने आप निकल गया. इस अद्भुत लेखन के लिए मेरी बधाई स्वीकारें...

नीरज

jyoti nishant said...

जैसे जाते हुए पल को शब्दों में बाँध कर रोक दिया...........सुंदर.

राजेश उत्‍साही said...

यूं ही सुंदर है।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच की जी रही है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

Pratibha Katiyar said...

@Baabusha- सुनो मेरी जान, बेचैनी सिर्फ प्रेम में होती है. या प्रेम की अस्पष्टता में...होने या न होने के बीच के सफ़र में...

बाबुषा said...

चरण आगे कीजिये ख़ाला ! कहाँ थीं आप ? :-)

Pratibha Katiyar said...

@Baabusha- tumhare dil men.:-)

kase kahun?by kavita verma said...

behad khoobsurat hamesha ki tarah.

Pratibha Katiyar said...

कविता जी, राजेश जी, शास्त्री जी आप सब लोग हमेशा उत्साह बढ़ाते हैं. सभी का बहुत आभार!

दीपक की बातें said...

उसका होना भी ना होना है और उसका ना होना भी होना है। दोस्‍ती, प्‍यार, मुहब्‍बत, शररात मगर कोई शर्त नहीं, शायद 'अनकंडीशन लव' इसी को कहते हैं।

मेरी पसंदीदा लाइनें---
'‍होने और न होने के बीच एक खाली जगह होती है. हमारे जीवन में शामिल अधिकांश लोग उसी खाली जगह में रहते हैं. लेकिन वो समझ नहीं पाते और खुद को किसी न किसी दायरे में कैद करते हैं.'

Anuja said...

Subah Subah padhi tumrai Fitrat....

Aisa hi kuchh sapna to mera bhi hai....! Ye tumhare paas kabse pada tha....? Tumne bataya kyon nahin ab tak.....?

Hone ya na hone ke beech....sabse khoobsoorat aur sarthak jagah hoti hai wo....! Mai shayad kafi dino baad padh rahi huin...!

Darasal yahi sach hai...

'‍होने और न होने के बीच एक खाली जगह होती है. हमारे जीवन में शामिल अधिकांश लोग उसी खाली जगह में रहते हैं. लेकिन वो समझ नहीं पाते और खुद को किसी न किसी दायरे में कैद करते हैं.'

वन्दना said...

काश ऐसा एक रोज़ हर किसी की ज़िन्दगी मे आये……………और वो उसमे अपनी पूरी ज़िन्दगी जी जाये……………कुछ होने और ना होने के बीच की खाली जगह मे कितना सुकून होता है…………शायद वो ही अपने लिये जीना होता है।

Pratibha Katiyar said...

@Anuja- अनुजा जी, गौर से देखिये अपने आस पास मेरे तमाम सपने वहीँ कहीं पड़े होंगे. असल में सारी स्त्रियाँ एक से सपने देखती हैं बस उनके रंग रूप अलग होते हैं. इसलिए हर स्त्री दूसरी स्त्री के भाव में खुद को देखती है, अगर उसके पास देखने की नजर है...
@ Vandna- वंदना जी, शुक्रिया! वाकई जिंदगी एक पल में होती है...और सारी उम्र उस एक पल की तलाश....

Pratibha Katiyar said...
This comment has been removed by the author.
varsha said...

behad khoobsoorat

महेन्द्र श्रीवास्तव said...

क्या कहने,
बहुत सुंदर

मन के - मनके said...

सुंदर.

मन के - मनके said...

सुंदर.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

और मैं सोच रहा हूँ कि प्रेम क्या होता है? प्रेमी/प्रेमिका होना क्या होता है? काश कि देह न होती या देह से जुड़ी तमाम चीजें न होतीं तो क्या प्रेम को लेकर इतनी सावधानियां होतीं? काश कि इतनी सावधानियां न होतीं...कुछ प्रेम कुछ घंटों के होते...कुछ दिनों..कुछ महीनों...और इन सबसे मिलकर जो जीवन बनता क्या वह आज के 'आदर्श जीवन' से बेहतर न होता?

विकास said...

प्रतिभा जी,
कहानी जो अधुरी रह जाए उसका मजा ही कुछ और है. बहुत सुन्दर.

सिद्धान्त said...

प्रेम के नये रूप को आपने सामने रखा है. जहां दोस्ती और दूसरे अंतरिम संबंधों की दुहाई मुमकिन होती है. बहुत खूबसूरत. शुभकामनाएं.

Arpita said...

मन डूबा है प्रेम के इस होने..न होने के बीच में...पर फिर भी प्रेम में ही है...
सुंदर....दिल को छू लिया....

Arpita said...

सुंदर ....दिल को छू लिया ....

समीर यादव said...

न अगली मुलाकात का वादा, न बेचैनी, न कोई असहजता. बस एक खिलखिलाता हुआ दिन आसानी से गुजर गया.
बात जो छू कर गुजरती है,,,खुद को इस कहानी के पात्रों से अलग करते डूब ही जाते हैं और पाठक मन बेचैनी से बच नहीं पाता.निश्छलता के साथ असहज करने वाली....शानदार.

sidheshwer said...

सहज , सुन्दर

Pratibha Katiyar said...

वर्षा जी, महेंद्र जी, मन के मनके, सिधांत, समीर, अर्पिता, सिध्धेश्वर जी, विकास आप सभी का बहुत आभार. अशोक जी आपके कमेन्ट में कई कहानियां सांस ले रही हैं, कई कवितायेँ भी...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

manmohak post.

Incognito Thoughtless said...

नहीं, ऐसा नहीं होता प्रतिभा ।
सारी औरतें एक से सपने नहीं देखतीं.....


कुछ औरतों के सपने अलग भी होते हैं....।

monali said...

Haan sach hi to h.. prem ki umar nahi hoti.. kuchh dino...ya kuchh palo k bhi prem hote hain.. jo chalte firte logo se ya cheezo se ho jaya karte gaub,, very very very beautiful post... m forced to follow ur blog :)

Pratibha Katiyar said...

Thanks Monali ji! It's a plsr of mine. keep visiting...

pallavi trivedi said...

कुछ होने और न होने के बीच की खाली जगह सचमुच बहुत सुकून दाई होती है... न न होने का दुःख न जो है उसे खोने कि घबराहट! बस उस खाली जगह में भी मन भरा रहता है... अपने अनुभव से कह रही हूँ!

Ravi Rajbhar said...

Sadar Pradam,
kin shabdo se tarif karu apke lekhani ki ant tak apne me hi bandhe rahi ...aur jate jate ek khubsurat ahsas dila diya.

apko follow kar raha hun ki aje bhi esa hi padhne ko milega.

apko s-pariwar diwali ki hardik subhkamnaye.

neera said...

इर्षा हो रही है..प्रेम को संभव -असंभव जगह और परिस्थिति में तुम्हारी रूह पहचान लेती है अंगुलियाँ उसे गूंथ कर पाठको की कलाइयों में गजरे पहना देती हैं...

Anand Dwivedi said...

तुम मेरे प्रेमी नहीं हो. लड़की ने कहा.
हां, जानता हूं.
दोस्त भी नहीं. लड़की ने फिर कहा.
हां, शायद हम दोस्त भी नहीं हैं. हम बरसों बाद मिल रहे हैं और एक-दूसरे के बारे में कुछ भी नहीं जानते. जानना चाहते भी नहीं. लड़के ने लड़की की बात पर स्वीकृति की मुहर लगाई.
फिर हम एक-दूसरे के साथ क्यों हैं?
लड़की ने पूछा.
होने और न होने के बीच एक खाली जगह होती है. हमारे जीवन में शामिल अधिकांश लोग उसी खाली जगह में रहते हैं. लेकिन वो समझ नहीं पाते और खुद को किसी न किसी दायरे में कैद करते हैं. ..
..
प्रतिभा जी कोई कमेन्ट नहीं है मेरे पास .....
खुद को उसी खाली जगह में पाता हूँ मैं !

sag said...

अद्भुत मनोवैज्ञानिक व्याख्या ...इस तरह की सोंच दावे के साथ कह सकती हूँ एक स्त्री की कलम से ही सृजित हो सकती है ....रिश्तों के समीकरण कब और कैसे बनते हैं और बिगड़ते हैं अपरोक्ष रूप से बहुत सी बातें कह रही है आपकी रचना ...पर प्रतिभा जी ये एक ऐसी कल्पना है जो सिर्फ आँख बंद करने पर ही साकार होती दिखती है आँख खुलते ही गायब हो जाती है ...बहुत-बहुत बधाई एक सशक्त प्रस्तुति के लिए .....शुभकामनाएं