Sunday, May 15, 2011

अच्छी नहीं लगतीं अच्छी लगने वाली चीजें



इन दिनों
अच्छी नहीं लगतीं मुझे 
अच्छी लगने वाली चीजें
बिलकुल नहीं भातीं मीठी बातें
दोस्तियों में नहीं आती है 
अपनेपन की खुशबू 
सुंदर चेहरों पर सजी मुस्कुराहटों से
झांकती है ऊब
नज़र आ जाता है
कहकहों के भीतर का खोखलापन,
सहमतियों से हो चली है विरक्ति 
इन दिनों.
दाल पनीली लगती है बहुत
और सब्जियां बेस्वाद
मुलाकातें बहाना भर लगती हैं
सिर टकराने का,
महीने के अंत में आने वाली तनख्वाह भी 
अच्छी नहीं लगती
वो हमेशा लगती है बहुत कम
अख़बारों में छपी हीरोइनों की फोटुएं
अच्छी नहीं लगतीं,
न ख़बरें कि बढऩे वाले हैं 
रोजगार के अवसर
सुबह अब अच्छी नहीं लगती
कि धूप के पंखों पर सवार होकर 
आती हैं ओस की बूंदें
और रातें दिक करती हैं
कि उनके आंचल में 
सिवाय बीते दिनों के जख्मों की स्मृतियों के
कुछ भी नहीं
चांद बेमकसद सा 
घूमता रहता है रात भर 
नहीं भाती  है उसकी आवारगी 
अमलताश अच्छे नहीं लगते 
जाने किसके लिए 
बेसबब खिलखिलाते हैं हर बरस
और गुलमोहर अच्छे नहीं लगते 
दहकते रहते हैं बस यूं ही
जाने किसकी याद में
तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगता
कि आने में हमेशा होती है 
जाने की आहट
और जाना तो बिलकुल नहीं रुचता 
कि जाकर और करीब जो आ जाते हो तुम
अजब सा मौसम है
अच्छी लगने वाली चीजें
मुझे अच्छी नहीं लगतीं इन दिनों...

33 comments:

ALOK PURANIK said...

प्रतिभाजी, मोक्ष की तरफ बढ़ रही हैं, स्पीड से

Naveen said...

लेकिन कहन का अंदाज़ कह रहा है कि आजकल उतनी खराब भी नहीं लगती प्यारी लगने वाली चीज़ें...

मनोज पटेल said...

इस कविता में आपने बहुत अच्छे ढंग से अभिव्यक्त किया है एक ख़ास मनःस्थिति को. बधाई...

रश्मि प्रभा... said...

तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगता
कि आने में हमेशा होती है
जाने की आहट
और जाना तो बिलकुल नहीं रुचता
कि जाकर और करीब जो आ जाते हो तुम
bahut apnepan kee abhivyakti , anmana mann tabhi to kuch achha nahi lag raha

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

जाने किसकी याद में
तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगता
कि आने में हमेशा होती है
जाने की आहट
और जाना तो बिलकुल नहीं रुचता

बहुत खूबसूरती से मन के भावों को कहा है ..

बाबुषा said...

उदास हो ?

Pratibha Katiyar said...

@ Babusha-...जाने दो यार.

प्रवीण पाण्डेय said...

आँख बन्द करिये, गहरी साँस भरिये और घड़ी की सुई वर्तमान पर टिका दीजिये।

Pratibha Katiyar said...

@Praveen Pandey- :-) :-)

Amar said...

bahut hi badhiya..
bahut khub..

Dr.Nidhi Tandon said...

या तो आपको प्यार हो गया है............या अवसाद है..या..........निर्वाण की ओर जाने का प्रयास है....अरे खैर ये सब छोडिये..........रचना बहुत अच्छी है......हम में से हरेक शख्स के साथ कभी न कभी ऐसा ज़रूर हुआ होगा कि जब चीज़ें अच्छी नहीं लगती ........सुन्दरचित्रण'!!!!!!!!!!!

neel pardeep said...

प्रतिभा जी अवसाद के दौर से गुजर रही हैं? बहुत अच्छा .यह आत्म साक्षात्कार का सही वक्त है .लेकिन सही बताना बिस्तर में पड़े रह कर पुराने गीत/गज़ल सुनना भी नहीं अच्छा लगता?
तप कर कुंदन बनने ही वाली हैं बस
सादर
प्रदीप

daanish said...

इंसान के मन की स्थिति
कभी कभार ऐसी हो ही उठती है
बस ,, सब कुछ अनजाना-सा ...

अभिव्यक्ति प्रभावशाली है .

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

neera said...

ऐसा अच्छा ना लगना कितना खूबसूरत है जो कविता को जन्म दे :-)

Sadhana Vaid said...

मन की विरक्ति को बहुत शिद्दत के साथ अभिव्यक्त किया है आपने ! यह अनमनापन, यह ज़मीन से उखडने का अहसास और अस्वीकार का भाव जितनी जल्दी खत्म हो जाये अच्छा है ! अमलतास और गुलमोहर के सौंदर्य को आँखों में भर कर उनका आनद लीजिए ! शनै शनै सब कुछ अच्छा लगाने लगेगा ! सुन्दर शब्दों में गुंथी एक मर्मस्पर्शी रचना !

M VERMA said...

शायद इसी का नाम तिलिस्म है

ashish said...

अनमनेपन के बाद आनेवाली मृगतृष्णा का आवेग तीव्र हो सकता है . जरा सम्हल के .:)

कुश्वंश said...

जाने किसकी याद में
तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगता
कि आने में हमेशा होती है
जाने की आहट
और जाना तो बिलकुल नहीं रुचता

बहुत खूबसूरत

रेखा श्रीवास्तव said...

कभी कभी होता है, ये क्षणिक स्थिति होती है, वैसे इसमें भी अनुभव ले लेना बुरा नहीं है.

रेखा श्रीवास्तव said...

कभी कभी होता है, ये क्षणिक स्थिति होती है, वैसे इसमें भी अनुभव ले लेना बुरा नहीं है.

Rajesh Kumari said...

जाने किसकी याद में
तुम्हारा आना अच्छा नहीं लगता
कि आने में हमेशा होती है
जाने की आहट
और जाना तो बिलकुल नहीं रुचता

bahut sateek panktiya.aapki rachna achchi lagi.first time aapke blog per charcha manch ke madhyam se aai hoon.achcha likhti hain aap.god bless you.

निवेदिता said...

अनमनापन भी प्रभावी बन गया .....

Anita said...

यह अच्छा न् लगना ही तो वैराग्य है, तब तो आप सही जा रही हैं !

mahendra srivastava said...

इन दिनों
अच्छी नहीं लगतीं मुझे
अच्छी लगने वाली चीजें

बहुत अच्छा प्रतिभा जी

Maheshwari kaneri said...

मन के भा्वों की सुन्दर अभिव्यक्ति है

jyoti nishant said...

kabh kabhi correct baat kah deti ho jaaneman.ab tak ki sabse hatkar kavita.naveen sir se sahmat hu.

mridula pradhan said...

और जाना तो बिलकुल नहीं रुचता
कि जाकर और करीब जो आ जाते हो तुम
very good.

विवेक भटनागर said...

यदि मन से यह खूबसूरत कविता लिखी है, तो मन की इस अवस्था से पार पाना होगा। यह अवस्था हर किसी के जीवन में आती है, जब सबकुछ रसहीन नजर आता है। थोड़ी सी परिपक्वता भी है इसमें। किंतु मन की और परिपक्वता इस स्थिति से बाहर ले आएगी...।

Pratibha Katiyar said...

@Vivek Bhatnagar-आप भी विवेक जी, आप तो ऐसे न थे...

rohitkaushikmzm@gmail.com said...

अवसाद की स्थिति नहीं है यह । ऐसा हम सभी के साथ होता है । यह जीवन की वास्तविकता है । जीवन की इस वास्वविकता को बडी खूबसूरती के साथ आपने कविता में पिरोया है । दरअसल हमारे जीवन में अनेक फेज चलते हैं । कभी हमें जीवन अर्थहीन लगने लगता है तो कभी उत्साह से पूर्ण । जीवन के ये विभिन्न चरण एक तरह से जीवन को समझने में मदद भी करते है ।

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " said...

vyakul man ke aakul bhav.....
prabhavshali rachna.

Pratibha Katiyar said...

हौसला बढ़ाने का शुक्रिया सभी का!