Friday, May 13, 2011

हल्का सा कोसा, सुबह का बोसा


सुरों के समंदर में डुबकी लगाई तो ये मोती हाथ लगे. सुरेश वाडकर की आवाज और विशाल भारद्वाज के संगीत में गुलज़ार के साहब के ये शब्द डूबते-उतराते किसी झील के कमल से मालूम हुए. इन्हें अलग से छुआ तो लगा मानो कमल को झील से तोड़कर हाथ में ले लिया हो. कोई इतने प्यार से जगाये तो उम्र भर सोये रहने को जी क्यों न चाहे...

जग जा री गुडिय़ा
मिसरी की पुडिय़ा
मीठे लगे दो नैना
नैनों में तेरे, हम ही बसे थे
हम ही बसे हैं, है ना...
ओ री रानी, गुडिय़ा
जग जा, अरी जग जा...मरी जग जा...

जग जा री गुडिय़ा
मिसरी की पुडिय़ा
मीठे लगे दो नैना...

हल्का सा कोसा
सुबह का बोसा
मान जा री, अब जाग जा
नाक पे तेरे काटेगा बिच्छू
जाग जा, तू मान जा
जो चाहे ले लो, दशरथ का वादा
नैनों से खोलो जी रैना
ओ री रानी, गुडिय़ा
जाग जा, अरी जग जा, मुई जग जा..

किरनों का सोना
ओस के मोती
मोतियों सा मोगरा
तेरा बिछौना, भर-भर के डारूं
गुलमोहर का टोकरा
और जो भी चाहो
मांगो जी मांगो
बोलो जी, मेरी मैना
ओ री रानी, गुडिय़ा
जग जा, अरी जग जा, ओए जग जा...

(http://www.youtube.com/watch?v=RozrGjt9p_w&feature=related)

5 comments:

रश्मि प्रभा... said...

किरनों का सोना
ओस के मोती
मोतियों सा मोगरा
तेरा बिछौना, भर-भर के डारूं
गुलमोहर का टोकरा
और जो भी चाहो
मांगो जी मांगो
बोलो जी, मेरी मैना
ओ री रानी, गुडिय़ा...बहुत प्यारी मीठी मीठी रचना

priya said...

मैं तो न जागूं

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति| धन्यवाद|

बाबुषा said...

:-)

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा सुन्दर गीत।