Sunday, February 27, 2011

नींद भी, फूल भी, तनहाई भी...


आधी रात को न जाने किसने दरवाजा खटकाया था. नींद से लड़की का कोई पुराना बैर था, सो पहली ही आहट में आवाज सुन ली थी. दरवाजा खोला तो हंसी ही आ गई उसे.
'मुझे पता था.' उसने हंसते हुए कहा.
वो हैरत से देख रहा था.
'क्या पता था तुम्हें?' उसने पूछा.
'यही कि तुम आओगे. लेकिन इस तरह आधी रात...इतना भी सब्र नहीं हुआ तुमसे कि सुबह तक रुक जाओ. अब आ गये हो तो बैठ भी जाओ.' हंसी रुक ही नहीं रही थी लड़की की. 'अच्छा....बाबा सॉरी.' लड़की ने कान पकड़ते हुए कहा लेकिन उसकी हंसी अब भी तारी थी. खिली-खिली सी हंसी. मानो आसमान के सारे तारे उसकी खिलखिलाहट में गुंथ गये थे.

'तुम्हें हैरत किस बात की है? मेरे आने की या इस तरह आधी रात को आने की?' उसने अचकचा कर पूछा.
'दोनों में से किसी बात की नहीं. क्योंकि ये दोनों बातें मुझे पहले से ही पता थीं.' लड़की मुस्कुराई. अब उसकी मुस्कुराहट में ठहराव आ गया था. जो उसकी सादा मुस्कुराहट को और भी मोहक बना रहा था.
'फिर...?' उसने पूछा.

'देखो, दिन...रात...का हिसाब तो मैंने कब का बिगाड़ रखा है. तो इससे कोई फर्क ही नहीं कि वक्त क्या है. यूं भी मौसमों के आने-जाने का कोई वक्त होता भी कहां है. कब गाढ़ी काली रात बरसने लगे और कब बरसती रात के आंचल में चांद खिल उठे कौन जाने. इसीलिए मैंने दिन रात समेटकर एक ही पोटली में बांधकर रख दिये हैं. सब आपस में उलझ गये हैं. मुझे पता था तुम आओगे. और जल्दी आओगे.
सारा दिन मैंने तुम्हें देखकर भी नहीं देखा. तुमसे नजरें चुराईं. तुम्हें बुरा लगा ना?'
उसने गर्दन झुका ली.
'मैं तुम्हारे ही लिये तो आता हूं. पूरे ग्यारह महीने के इंतजार के बाद बस कुछ दिनों का साथ.'
'जानती हूं. मैं भी तो पूरे ग्यारह महीने इंतजार करती हूं. लेकिन इस बार तुम मेरे पीछे से क्यों आये? इसीलिए नाराज हूं तुमसे. मैं शहर से बाहर थी कुछ दिन. तो मैंने जिंदगी की शतरंज समेटकर रख दी थी. हाथी घोड़ों को अलग-अलग बांध दिया था. शह को मात से टिकाकर रख दिया था कि लौटूंगी तब तक कहीं सब आपस में उलझ न पड़ें. लेकिन...' लड़की कहते-कहते अचानक उदास हो गई.
'क्या हुआ?'
'कुछ नहीं.'
'अरे, बोलो भी?'
'जब मैं थी ही नहीं तो तुम किसके लिए आये थे बोलो तो? लौटती हूं तो सारा शहर पलाशों से भरा हुआ है. दरख्त की हार डाल पर तुम मुस्कुरा रहे हो. तुमने मुझसे छल किया. तुम मेरे लिए नहीं आये हो.'
लड़की नाराज हो गई.
'अच्छा इसीलिए सारा दिन मुझसे बात नहीं की.'
'हां.'
'मैं तो तुम्हारे लिये ही आया हूं. यहां कौन है जिसे मेरी फिक्र है. कौन है जो मेरी एक झलक भर से खिल उठता है. कौन है जो ग्यारह महीने हसरत से मेरी शाखों पर कुछ टटोलता है.'

'पर अब मुझे तुम्हारे आने से क्या? मैं अब मौसमों से पार निकल आई हूं. दिन-रात, सुख-दुख, अवसाद, शह-मात इन सबको पार कर रही हूं.'
'कहां जाओगी सबको पार करके?' उसने पलकें झपकाकर पूछा.
'अपने केंद्र में. कितने दिन हुए खुद से पीछा छुड़ाये. कितने दिन हुए दिये की ढिबरी की तरह अपनी ही लौ को बढ़ाये. कितने दिन हुए अपनी ही आंख में खुद को देखे. कितनी सदियों से खुद से भागती फिरती हूं. अब लौटना चाहती हूं. अपने केंद्र पर. अपना राग खुद बनना चाहती हूं. आरोह अवरोह की सीढिय़ों से मुक्त राग.'
लड़की की आंखों में शांति थी. अथाह शांति.

'तो मैं अब कहां जाऊं...' वो बोला. उसका स्वर उदास था.
लड़की उसकी मासूम सी ख्वाहिश पर फिदा थी.
'तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं.' उसने पलाश की उस शाख से एक फूल उतारा. दहकता हुआ सुर्ख फूल. उसे अपनी लंबी सी चोटी में अटका लिया. उसका चेहरा पलाश के फूलों की तरह खिल उठा.
'अब खुश?' वो चिहुंकी.
'हां...' पलाश मुस्कुराया.
'तो मैं सो जाऊं अब?' लड़की ने पूछा.
'हां, लेकिन मैं यहीं तुम्हारे सिरहाने बैठा रहूंगा. इजाजत दो.'
'चलो दी इजाजत.' लड़की खिलखिलाई.

उसने तनहाई की चादर को खींचकर खुद को उसमें छुपा लिया...

14 comments:

Rangnath Singh said...

कई बार लगता है कि कुछ कोमल और काम्य संवेदनाएं लेखन में ही बची हैं। पोस्ट अच्छी लगी और उससे भी अच्छा लगा उसका शीर्षक। पिछले कुछ पोस्ट भी आज पढ़ा। मरीना के पत्र लाजवाब हैं।

richa said...

थोड़ी अल्हड़... थोड़ी दार्शनिक... ज़िन्दगी सी... बेहद ख़ूबसूरत पोस्ट !!

प्रवीण पाण्डेय said...

तनहाई की चादर, पूरा ही ढक लेती है।

प्रिया said...

हमको भी हमारे बसंत से मिलना है .....आप तो माहिर हैं बोलिए उसको ... हमसे मिलके जाए ....बहुत ही प्यारी और अपनी सी लगी कहानी ....मन बसंत हो गया :-)

pratibha said...

@ priya- जाओ बसंत, अपनी प्रिया से मिलकर आओ. और प्रिया अगर वो मेरी बात भी न माने, न आये मिलने तो तुम ही चली जाओ....

Patali-The-Village said...

बेहद ख़ूबसूरत पोस्ट|

jyoti said...

sare mausamo ko paar kar chuki aap .is kahani main aapka spiritual personality ki jhalak nazar aati hai.

pratibha said...

सुरभि...आपका कमेन्ट पब्लिश नहीं हो पा रहा है इसलिए मै खुद इसे दे रही हूँ. शुक्रिया!

Bahot khoob likha है. padh kar dil khush ho gaya. Mana kuch sawalao ke jawaab hamein maloom hote hain par phir bhi hum unka jawaab doosro se chahte hain, par kuch sawaal bina jawaab ke hi rehjaate hain jinka jawaab hum jante to hain par zaahir nahi kar paate.
- surabhi

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

बहुत खूबसूरती से समेटे हैं सारे एहसास ...

अनिल कान्त said...

Behad Khoobsurat aur Rumani....Basant ki tarah

Madhavi Sharma Guleri said...

ख़ूबसूरत मौसमों में से एक !!

ZEAL said...

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कितनी हसीन होगी वो नींद , जिसमे प्यार सिरहाने बैठा हो ।
कितनी कष्टकर होगी वो तन्हाई , जिसके सामने उसका प्यार सो रहा होगा ।

A beautiful contradiction !

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krati bajpai said...

namaste mam,
apke blog ke bare main pata chala aur padha to follow karne se khud ko rok nahi payi. halanki abhi bahut hi choti hoon apake blog parivaar main, fir bhi kahane ki himmat kar rahi hoon ki vakai main aap shandaar rachanakaar hain.

bemisaal nayab.

pratibha said...

@ krati- कृति आपके कोमल भावों के लिए शुक्रगुज़ार हूँ. आप छोटी नहीं बहुत कीमती हैं हमारे लिए. आपकी भावनाएं भी और प्रतिक्रियाएं भी...