Tuesday, March 16, 2010

वो कौन था मोड़ पर ....



वो याद ही तो थी जो एक रोज मोड़ पर मिली थी. घर के मोड़ पर. वो याद ही तो थी जो गुलमोहर के पेड़ के नीचे से गुजरते हुए छूकर गयी थी. एक कच्ची सी याद उठी साइकिल की पहली सवारी वाली भी. वो भी तो याद ही थी जो हर शाम के साथ झरती थी छत पर. छत, जिसके बनने में भी हाथ लगाया था भरपूर. वो याद ही थी उन दीवारों में बसी हुई, जो आगोश में लेने को व्याकुल थी. वो दीवारें जिन्हें इंच-इंच बढ़ते देखा. कभी कंधे से नापा तो कभी सर से. और एक दिन सर से ऊपर निकल गईं सर्रर्रर्रर्र से सारी दीवारें. फिर उन दीवारों में हम खिलखिलाने लगे. इन्हीं दीवारों में सपने देखना सीखा. इसी घर की फर्श पर पहला पांव रखा. डंाट भी खाई कि कच्ची फर्श पर पांव रखकर पांव की छाप छोड़ दी हमेशा के लिए. डांट खाकर भी कितना खुश था मन कि मेरे पांव छप गये हैं यहां हमेशा के लिए. उसी फर्श पर न जाने कितना अकेलापन साझा किया था आंसुओं से. मानो वो फर्श नहीं सखी हो. दरवाजे, तो बेचारे ही रहे हमेशा क्योंकि हर गुस्से में इन्हें ही जोर से झटका था हर बार. इन दीवारों में वो रिश्ते रहते थे, जो बने-बनाये मिले थे. जन्म के रिश्ते. वो रिश्ते, जिनमें खुशबू बसती है. वो रिश्ते, जहां अधिकार काबिज रहता है. वो रिश्ते जिनमें भरोसा होता है कि गलत या सही से पार सबको साथ होना ही है. वो घर जहां कोने-कोने में अधिकार है. वो घर जहां बचपन के मीठे झगड़ों की याद है. जहां क्या होना है, क्या नहीं होना है के फैसलों के बीच की यात्रायें भी मुस्कुरा रही थीं. वो घर जो अचानक यूं ही छूट गया था एक रोज. अनजाने...अनचाहे...एक रोज बड़े से शोर-शराबे के बीच घर से नाता टूट गया. छन्नन्नन्न....से न जाने क्या-क्या टूट गया. न जाने क्या-क्या छूट गया. छूट गया बचपन, सखियां, सहेलियां, मां, पापा, प्यार, दुलार, अधिकार. छूट गया सब. लेकिन पूरे वजूद में बस भी गया सब कुछ. छूटे हुए घर को दिल में बसाये एक और घर बसाने लगी. दूसरा घर सजाने लगी. अरमान नये, सपने नये, रिश्ते नये. कितने बरस बीत गये नये रिश्तों में उलझे हुए. नये घर के पर्दों के रंग से लेकर दीवारों की ऊंचाई तक तय करने में लगभग बिसरा ही बैठी, उस कच्ची मिट्टी की खुशबू को जिससे घरौंदे बनाये थे कभी. कोई एलडीए के चक्कर नहीं, कोई एनओसी नहीं, कोई नक्शा पास नहीं कराना. अपनी गुडिय़ा के लिए शानदार घरौंदा इन्हीं हाथों से तो बन जाता था झट से.
फिर एक रोज कहीं से कोई खुशबू आई. कोई याद जी उठी भीतर. घुंघरू की तरह बज उठी छन...छनानन..छन्न..छन्नन्न...झूम ही उठा मन. वो मोड़, लगा अब भी ढेर सारे इंतजार लिए खड़ा है. वो दीवारें मेरे बचपन की खुशबुओं को अपने भीतर बसाये हैं. वो गुलमोहर खिले न खिले उस पर हर पल बारहों महीने खिलती हैं यादें. जीवन की आपाधापी ने कभी वक्त ही नहीं दिया कि इन सौगातों की ओर, इनके इंतजार की ओर ध्यान दिया जा सका.
लंबे....बहुत लंबे समय बाद जब अपनी उलझनों को ताक पर रखा. समझदारी को उतार कर अलगनी पर टांगा और खुलकर सांस ली... बेवजह ही ढेर सारी मुस्कुराहटों ने आगे बढ़कर थाम लिया दामन और कहा, कबसे था तुम्हारा इंतजार. तब ध्यान आया कि वो जो उस मोड़ पर रोज कोई मुस्कुराता सा मिलता है, वह मेरा ही बचपन है. ये भी कि घर जाने के लिए वहां का गेट खोलकर भीतर जाना भर नहीं होता, उसकी आत्मा में प्रवेश भी करना पड़ता है. क्योंकि जब छूटा था घर तो आत्मा का एक टुकड़ा भी तो वहीं छूट गया था ना. बगीचे में फूलों के बीज बोते हुए खुद को भी तो बोया था ना हमने? क्यारियां कब से लहलहा रही हैं इंतजार में. नन्हे हाथों से जिन पौधों को दिया था पानी, वो अब पेड़ बन चुके हैं.
वो धान अब तक बिखरे पड़े हैं वहीं, जो घर छोड़ते समय उछाले थे. वो सिसकियां भी...वैसी की वैसी. बेपनाह सिसकियां...कैसे भूल गई पीछे मुड़कर देखना. कैसे भूल गई कि छूटकर भी नहीं छूटता कुछ भी. कभी भी.

13 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत बढ़िया आलेख!
भारतीय नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

Suman said...

nice

अनिल कान्त : said...

आपकी पोस्ट शब्द-दर-शब्द दिल में घर करती चली गयी....बहुत गहरे तक छुआ कहीं शब्दों ने

Amitraghat said...

यादें बेहद खतरनाक होती हैं जो कि अक्सर बेचैनी भरी छटपटाहट पैदा कर देती हैं चाहे हम खुश हो या फिर उदास...."
amitraghat.blogspot.com

sangeeta swarup said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति....सच है कि बचपन दीखता है मोड पर खड़ा हुआ....

संजय भास्कर said...

कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई

चंदन कुमार झा said...

भावनाओं का प्रवाह फूटकर निकला, और मन को भाप कर गया ।

गुलमोहर का फूल

Udan Tashtari said...

ओह! बहुत उम्दा...दिल में उतर गया पूरा आलेख!


आप को नव विक्रम सम्वत्सर-२०६७ और चैत्र नवरात्रि के शुभ अवसर पर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ ..

कुश said...

कमाल का शिल्प है.. शब्द संयोजन पाठक को इधर उधर होने ही नहीं देते.. एक ही सांस में पूरा पढ़ गया..

anubhuti said...

कविता के प्रवाह से बचपन को याद दिला गया आपका लेख , वो मोड़ जो हर बार अपनी ओर बुलाता है और चाहकर भी हम वहां वापस नहीं जा सकते है..................

सुशीला पुरी said...

सुंदर ........

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (30-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ...!

Reena Maurya said...

बहुत सुन्दर
:-)