Thursday, March 4, 2010

बेवजह का लिखना-2


अपनी मर्जी से कहां सफर में हम हैं...

अपनी मर्जी का अर्थ क्या होता है? यही ना कि जो खुद करने का जी चाहे. लेकिन यह चाहना कैसा हो...क्या हो...अगर यह विचार जन्म लेने से पहले ही हाईजैक कर लिया जाये तब? क्या होगा तब? कितनी अपनी रह जायेगी वो मर्जी जो अपनी है. कई बार अपनी ही मर्जी का सलीब ढोते-ढोते दुखने वाले कंधों को दर्द भी महसूस किया है. अपनी मर्जी कितनी बार चाबुक बनकर बरसती हुई भी मालूम पड़ी है. अपनी ही मर्जी से देश की न जाने कितनी औरतें सती होती रही थीं. अपनी मर्जी से न जाने कितनी बालिका वधुएं अपने से दोगुने उम्र के दूल्हे के संग ब्याह दी जाती हैं.

अपनी मर्जी से न जाने कितनी माएं अपने ही गर्भ में अपनी बच्चियों का कत्ल कर देती हैं खुशी-खुशी. अपनी ही मर्जी से आज भी कई घरों में पत्नियां आधे पेट खाकर ही सो जाती हैं और ज्यादातर महिलाएं एनीमिया की शिकार होकर मर जाती हैं. ये सब कुछ औरतें अपनी मर्जी से करती हैं. उन पर कभी कोई दबाव नहीं होता. किसी भी तरह का. पिता की भीगी निगाहों और जर्जर आर्थिक स्थिति को देखकर चुपचाप उनके द्वारा चुने गए रिश्तों को स्वीकार करने वाली इन अपनी मर्जियों की भरमार किसी से छुपी भी नहीं है. मैं सचमुच इस अपनी मर्जी के भेद को खोलना चाहती हूं. देखना चाहती हूं कि इन अपनी मर्जियों के उस पार भी क्या कोई मर्जी है? जब से होश संभालो सही और गलत को जिस तरह चीख-चीखकर कानों में उड़ेला जाता है कि कोई भी लड़की कानों में जबरन ठूंसे जा रहे सही को ही अपनी मर्जी मान बैठती है. गलत के हश्र, अंजाम इस कदर खौफनाक होते हैं कि अपनी मर्जी की तकदीर और तदबीर वहीं गढ़ दी जाती है. उस मर्जी की हद, मियाद, दिशा सब पहले से तय है. सिर्फ चेहरे और नाम बदलकर सिर हां में हिलने भर की देर है. तभी तो कितनी आसानी से हमेशा बड़े से बड़े स्त्री विरोधी अपराध स्त्रियों के मत्थे ही मढ़ दिए गए. दहेज हत्या, सास या ननद के मत्थे, बच्चियों का न पढऩा लिखना, मां के मत्थे, बच्चियों की भ्रूण हत्या मां और दादी के मत्थे. पुरुष शातिर निगाहों से देखता रहता है दूर खड़ा होकर कि कहीं औरतों की ये अपनी मर्जी उनकी सचमुच की अपनी मर्जी न बन जाए...जैसे ही ऐसा कुछ होता न$जर आया गर्दन कलम. किसी एक गांव की कहानी में न जाने कितनी ही ऐसी अपनी मर्जियों की भ्रूण हत्याएं हो रही हैं. हद तो यह है कि जिनके अस्तित्व की हत्या हो रही है, उन्हें खुद भी इसका अहसास नहीं. उन्हें पता ही नहीं कि उनके हिस्से के सुख कौन से हो सकते हैं. कि उनका जीवन जो वे जी रही हैं उसके आगे भी है, हो सकता है.

इन अपनी मर्जियों की बाड़ इतनी सख्त है कि अगर कोई लड़की इसके पार जाने की, झांकने की कोशिश भी करे तो उसके नतीजे अखबारों में पढऩे को मिलते ही रहते हैं. वुमन रिजर्वेशन बिल के पास होने की खुशी मनाई जाए या दुख मनाया जाए कि एक और मौका दूसरों के हाथ का मोहरा बनने का. अपनी मर्जी का ये सफर राजनीति तक सेंध लगा चुका है. किसे इलेक्शन लडऩा है, किसकी बहू कितना वोट बटोरेगी...उसकी ना-नुकुर का परसेंटेज कितना हो सकता है आदि का कैलकुलेशन शुरू हो गया है. शहर की चमचमाती सड़कों पर फर्राटे से गाडिय़ां दौड़ाती, अंग्रेजी में बोलती और महत्वपूर्ण फैसले लेती महिलाएं सचमुच लुभाती हैं. उनके फैसले कई बार परिवार, समाज, नीति-नियम को पार भी कर जाते हैं लेकिन वो होती है उनकी अपनी मर्जी जिसकी जिम्मेदारी वो खुद उठाती हैं.

बदलती हुई तस्वीर को मुकम्मल होने में अभी बड़ा समय बाकी है. क्योंकि चमचमाती सड़कों पर दौडऩे वाली विश्वास से भरी इन लड़कियों की संख्या के आगे दूसरों की मर्जी को अपनी मर्जी मानकर जीने वालों की संख्या कई गुना ज्यादा है. इंत$जार है उस सुबह का जब सफर भी हमारा होगा, पंख भी हमारे, उड़ान भरने की दिशा भी हम ही तय करें और कितनी उड़ान भरनी है यह भी हमारा फैसला हो.
जारी....

10 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

बेवजह लिखना बहुत खूबसूरत लगा । वो अक्‌सर फूल परियोँ की तरह सजकर निकलती है। मगर आँखोँ इक दरिया का जल भरकर निकलती है।

Rajey Sha said...

सशक्‍त अभिव्‍यक्‍ति‍। सभी महि‍ला पुरूष पढ़ें।

संजय भास्कर said...

बेवजह लिखना बहुत खूबसूरत लगा

संजय भास्कर said...

बेवजह लिखना बहुत खूबसूरत लगा

पी के शर्मा said...

मैं आपकी इस रचना पर विषय को देखकर वाह भी नहीं कर पा रहा हूं। आह करने को मन हो रहा है। स्‍पष्‍ट करूं तो...
आपके लेखन के लिए तो वाह
और जो विषय आपने चुना है उसके लिए आह करने को जी चाहता है।

पीयूष पाण्डे said...

कहीं कुछ ज्यादा गहरा चुभ गया है, और शायद ये शब्द उस वेदना को अभिव्यक्ति करने के लिए ही कहे जा रहे हैं। हां, आपने अपने गांव के बहाने ही सही एक बार फिर जता दिया कि हालात को अभी बहुत बदलना है। आधुनिक नारी की कल्पना और उनके विचार शहर की सीमा खत्म होते ही खत्म हो जाते हैं शायद...। आपकी इस पोस्ट ने 15-16 साल पहले लिखीं कुछ लाइनें याद करा दीं, जिन्हें मैंने उस वक्त अपनी कविता कहा था-
'नारी उत्पीड़न'
नारी की बेबसी,लाचारी और मजबूरी की
कथा सुनाते ये दो शब्द
नारी का उत्पीड़न
चाहे
दहेज के लोभियों के कारण,
वासना के भेड़ियों के कारण
या
कन्या जन्म देने के कारण
उत्पीड़ित तो नारी ही होती है
इस दर्द,भय
और अपमान का
बदला वो कैसे लेती है?
स्वयं का अंत कर
स्वयं को यातनाएं देकर
या फिर
एकांत में सिसक सिसक कर.....

सुजाता said...

सही लिखा प्रतिभा !स्त्री की यह "मर्ज़ी"सचमुच ऐसी ही है ।

jyoti nishant said...

मर्ज़ी का हईजक हो जाना अच्छा और सटीक कहा.यह लेख सबको पड़ना चाहिए.जो समझते है वह अपनी मर्ज़ी से जी रहे है और उन्हें भी जो समझते ही नहीं की खुद से मुलाकात कितनी जरुरी होती है.

Nikhil Srivastava said...

बेहद उम्दा, छू गया ये बेवजह का लिखना..

प्रदीप कांत said...

बेवज़ह का लिखना कितना गम्भीर हो सकता है? ये शायद लोगों ने सोचा भी नहीं होगा।