Thursday, February 26, 2009

सुनो तो...


अरे सुनो तो...ये मेरा और तुम्हारा जो रिश्ता है एक रास्ता है। मैं तुमसे गुजरकर ही तुम तक पहुँचता हूँ। मेरा आगाज तुम, मेरा अंजाम तुम। तुम्हें देखकर मैं तुम्हें सोचता हूँ। तुम्हें पाकर मैं तुम्हें खोजता हूँ....

- जब नहीं आए थे तुम तब भी मेरे साथ थे तुम
दिल में धड़कन की तरह, तन में जीवन की तरह
मेरी धरती, मेरे मौसम मेरे दिन रात थे तुम
जब नहीं आए थे तुम तब भी मेरे साथ थे तुम
- फूल खिलते थे तो आती थी तुम्हारी खुशबु
और हसीं शाम jagaati थी तुम्हारा जादू
आईने में मेरे हर दिन की मुलाकात थे तुम
जब नही आए थे तुम तब भी मेरे साथ थे तुम।
- अधमुंदी aankhon में सजता हुआ एक ख्वाब थे तुम
पहली बारिश में भीगा हुआ महताब थे तुम
होंठ मेरे थे मगर इनकी हरेक बात थे तुम...
जब नहीं आए थे तुम तब भी मेरे साथ थे तुम...

फ़िल्म देव में इन खूबसूरत अल्फाजों का जिस तरह से इस्तेमाल किया
गया वह कमाल का है...

Tuesday, February 24, 2009

mulakat


मुलाकातें मुझे अच्छी नहीं लगतीं। माथे टकरा जाते हैं।
जैसे दो दीवारें। इस तरह किसे से मिला नहीं जाता।
यकीनन नहीं। मुलाकातें मेहराब होनी चाहिए।

Monday, February 23, 2009

बधाई




आज की सुबह जो नायब तोहफा लेकर आयी उसे हम युगों युगों तक याद करेंगे। ऑस्कर में हमने धूम मचा दी है। हमने यानी रहमान, गुलज़ार, कुट्टी, पिंकी....यूँ तो हर कोई खुशी से भरा है। खुशी छलक रही है। चैनल्स पर, अख़बारों में, चर्चाओं में, ब्लोग्स पर....एक बात मेरे साथ अलग है वो ये की सुबह से मेरे पास इतने फ़ोन आ रहे हैं की पूछिए मत। हर कोई कह रहा है आपके गुलज़ार साहब को अवार्ड मिला है, बधाई... यह सम्मान मेरे बहुत बड़ा है। गुलज़ार मेरे ही नही सबके फेवरेट है यह मैं जानती हूँ फ़िर भी अच्छा लग रहा है...पिछले दिनों उनसे हुई मुलाकात में उन्होंने रहमान पर बहुत भरोसा जताया था। उनका भरोसा, आज सबकी खुशी है।

सभी ऑस्कर विनेर्स को दिल से बधाई....

Saturday, February 21, 2009

ek mulakat gulzar sahab se


गुलज़ार साहब फिल्मों से गुजरना, उनकी शायरी से रु-ब-रु होना होना हमेशा एक बेजोड़ अनुभव होता है। रूहानी शायरी को रचने वाले इस शायर से रु-ब -रु होना, maano वक़्त का उन लम्हों में ठहर जाना था। सफ़ेद लिबास में बैठे उस शख्श ने जिंदगी के हर रंग को जिस खूबसूरती से रचा वो बेमिसाल है। कैसे कर लेते हैं वे shabdon की ऐसी बाजीगरी, कैसे वे अल्फाजों को धडकना सिखाते हैं, कौन सा वो जादू है जिससे वे अपने सुनने वालों को, पढने वालों को थाम लेते हैं? उनसे मिलकर जब जानने चाहे इन सवालों के जवाब तो पता चला की इस शायर के पास तो पहले से ही काफी सवाल हैं, जिन्हें वे कभी नज्मों में, कभी फिल्मों में उड़ेलते रहते हैं।

अवार्ड और आर्टिस्ट
आर्टिस्ट कोई भी हो, कैसा भी हो, कभी भी अवार्ड्स से बड़ा नहीं होता। कोई लाख कहे की वो अवार्ड का मुन्तजिर नहीं है लेकिन असल में हम कहीं न कहीं अवार्ड से जुड़े होते हैं। अवार्ड्स हमारे काम का रिकोग्निशन होते है। आज पूरा देश एक ऑस्कर की आस में है, मैं भी हूँ। हम कितना भी कहें की हमें हॉलीवुड के अवार्ड्स से कोई मतलब नहीं, उनके हमारे लिए कोई मायने नहीं हैं लेकिन असल में हम सब कहीं न कहीं ऑस्कर का इंतज़ार कर रहे हैं। इसमें ग़लत भी क्या है?

स्लाम्दोग मिलेनिओर, देनी बोयल और रहमान
क्या हिंदुस्तान स्लम्स का ही देश है? विदेशी आकर हमारे देश में वही सब क्यों देखते हैं? क्या यह फ़िल्म ऑस्कर में इसलिए गई क्योंकि इसे एक विदेशी ने बनाया ? इन सारे सवालों का जवाब फ़िल्म ख़ुद है। फ़िल्म देखने के बाद किसी सवाल की कोई गुंजाईश नहीं बचती। वैसे हम इन सवालों में घिरने के bajay अगर फ़िल्म की खूबियों पर बात करें तो बेहतर होगा। इस फ़िल्म मेंरहमान ने जो जादू किया है उस पर बात करना लाजिमी है। मुझे नई पीढी पर, उसके काम पर भरोसा है इसलिय मैं नोस्टेल्जिया n जीने के bajay विशाल भरद्वाज, रहमान, प्रसून जोशी, स्वानंद किरकिरे लोगों पर भरोसा करता हूँ।

मन से लिखता हूँ
फ़िल्म के गीतों का चेहरा अलग होता है कविताओं से। कवितायें, नज्में, मैं दिल से लिखता हूँ, सिर्फ़ दिल से जबकि फ़िल्म के गीत फ़िल्म का चेहरा होते हैं। गाने फ़िल्म की patkatha , उसके किरदार, धुन, निर्देशक की मांग इन saaree चीजों को ध्यान में रखकर लिखने होते हैं। एक प्रोफेसन है और दूसरा paisan, अभिव्यक्ति दोनों में है, फील दोनों में है। तो जिसे काम को इतने सारे दबावों से , आग्रहों से होकर gujrana होता है वह काम ज्यादा मुश्किल लगता है मुझे, लेकिन उसका अपना मजा भी है।

भाषा तो बदलेगी
वक़्त के साथ भाषा क्यों नहीं बदलेगी? आज के दौर में स्क्रिप्ट बदल गई है, किरदार बदल गए हैं, हीरो हर दूसरे वाक्य में अंग्रेजी बोलता हैअब युवराज का सलमान हो या सत्य का भीखू मात्र या फ़िर bnti और बबली इन किरदारों के साथ इनकी भाषा भी पकड़नी ही होती है। भीखू मात्र तो गोली मार भेजे में....भेजा शोर करता है...यही न बोलेगा। वो दिल ढूंढता है फ़िर वही फुर्सत के रात दिन...तो नहीं ही gayega न.

चाँद मेरा है
चाँद तो बस मेरा है।हाँ, चाँद पर मेरा कॉपी राइट है। वो मुझे फैसीनेट करता है। उसकी हरकतें ही कुछ ऐसी हैं। जब देखता हूँ कुछ अलग ही शरारत, अलग ही मूड में दिखता है। यही वजह है की मेरी कविताओं में वो कुछ ज्यादा ही नजर आता है।
रात के पेड़ पे कल ही देखा था
चाँद, बस पक के गिरने वाला था
सूरज आया था, जरा उसकी तलाशी लेना...
सवाल ख़ुद जवाब
मैं एक शायर हूँ। मेरे पास ख़ुद बहुत सारे सवाल है जिन्हें मैं अपनी शायरी में पिरोता हूँ। लोगों को वो सवाल अपने लगते हैं, वो दर्द, तकलीफ, रोमांस उन्हें अपना लगता है तो यह अच्छी बात है लेकिन कोई भी शायर किसी के लिए कुछ सोचकर नहीं लिखता। उस पर जो गुजरती है वही लिखता है। मैं भी वही लिखता हूँ। मेरी शायरी में भी कई सवाल हैं, जिनके जवाब मैं khoj रहा हूँ। कई बार सवाल ख़ुद जवाब बनकर सामने आते है और कई बार वे सवाल और बड़े होते जाते है...
मुझको भी तरकीब सिखा कोई यार जुलाहे
मैंने तो एक बार बुना था एक ही रिश्ता
लेकिन उसकी सारी गिरहें
saaf नजर आती हैं मेरे यार जुलाहे...
तो देखिये न सवाल ही तो है जिसके जवाब हम सब खोज रहे हैं।

मैं पढता हूँ इन्हें
मैं बहुत सारे लेखकों का फेन हूँ। जैसे स्पेनिश लेखक मर्रिन सोरोसकी, वाल्ट वित्मन, पाब्लो नेरुदा, फराज, फैज, कुसुम अग्र्ज्ज, वृंदा करिन्द्कर, शक्ति दा इन सबको पढता हूँ, इन्सेसीखता हूँ। ग़ालिब तो हैं ही मेरे फेवरेट। टैगोर पहले कवि है जिन्हें पढने के बाद मेरा जीवन ही बदल गया। देखा जाए तो वहीँ से कविता के बीज पड़े मेरे अन्दर। आठ बरस की उम्र में उन्हें पढ़ा और उनका दीवाना हो गया। यहाँ तक की लिब्रेरी से निकलवाई गई वह किताब उसका नाम गार्डनर था चुराकर मैंने जिंदगी की पहली चोरी की।

जो किया सो किया
मुझे अपने किसी काम को लेकर कोई संकोच कभी नहीं हुआ। कोई गिला नहीं हुआ। मैंने जब भी जो काम किया, उसे पूरे दिल से किया। अच्छा हुआ, बुरा हुआ लोगों ने पसंद किया, napasand kiya यह अलग बात है लेकिन मैंने अपने हर काम को दिल से किया, उसे पूरा जिया। जब भी मुझे लगा की मज़ा नहीं आ रहा है मैंने अपने आपको उस काम से अलग कर लिया। हाल ही में मैंने बिल्लू baarbar के दो गाने लिखने के बाद ख़ुद को फ़िल्म से अलग कर लिया शायद मुझे मजा नहीं आ रहा था। तो मैं जो करता हूँ उसे पूरे दिल से करता हूँ वरना नहीं करता हूँ।

प्यार जिंदगी है...
बस एक छोटा सा संदेश (sharaart se muskurate hue ) love thy neighbour as thyself including thy neighbor's girl....यानि प्यार लुटाते चलो...दुनिया mahkaate चलो...

शब्द सब कुछ नही कहते, काफ़ी कुछ छूट जाता है, कहने से, सुनने से। ऐसे में खामोशी के अर्थ और गहरे हो जाते हैं। गुलज़ार साहब की नज्में सुनते हुए हमेशा लगता है की कुछ और चाहिए अभी...वे एक प्यास जगाकर छोड़ देते हैं और हौले से मुस्कुराते हैं। जिसे तरह कागज पर फैला खाली स्पेस मुंह chidhata है, उसी तरह उनकी खामोशी unke बारे में और जानने की उत्सकुता पैदा करती है। यही फर्क है दूर से सुनने में और करीब जाकर महसूस करने में।वो जो शायर था चुप चुप सा रहता थाबहकी बहकी सी बातें करता था....वो जो न जाने कितनों के दिलों के करीब है वो आज सचमुच करीब था और ये कोई ख्वाब नहीं था.....
-pratibha



Labels: paratibha

Friday, February 20, 2009

पहचान



नाजुक वक़्त ही नाजुक नहीं होता। कभी-कभी कहीं से इतनी पहचान मिले, इतना प्यार मिले तो वह वक़्त भी उतना ही नाजुक होता है की आँखों की कोरें भिगो सकता है।

- मरीना

Thursday, February 19, 2009

खराशें के बहाने....


मैं कोई समीछ्क नही, न ही थियेटर एक्सपर्ट हूँ फ़िर भी जीवन की दूसरी कलात्मक विधाओं की तरह नाटकों में भी मेरी थोडी बहुत रूचि है। पिचले दिनों एक नाटक देखा खराशें। गुलज़ार साहब की पोएट्री और कहानियो को आपस में जोड़कर इस नाटक को सलीम आरिफ ने निर्देशित किया। नाटक में अगर सच कहें तो मज़ा नहीं आया। मंच पर अतुल कुलकर्णी और यशपाल शर्मा की उपस्थिति और लुबना सलीम की बढ़िया acting के बावजूद पूरा नाटक टूटा-टूटा, बिखरा-बिखरा सा लगा। मुझे ऐसा तब लगा, जब मंच पर बोले जा रहे samwad और कवितायें मुझे pahle से shabd dar shab yaad थे। यानी जिनके लिए इस दुनिया में जाने का पहला मौका था, उनकी मुश्किलसमझी जा सकती है। कविताओं पर natak नई बात नहीं है। दिअरी, कविता, लेटर्स, कहानिया ये सब नाटकों का हिस्सा होते हैं। ऐसे नाटकों में itani शिद्दत होती है की वे दर्शकों को दोनों हाथों से पकड़ लेते है। उनका दिल, दिमाग स्टेज से जुड़ जाता है। नाटक में एक रिदम का होना बेहद जरूरी है। वो रिदम जो पल भर को भी खंडित न हो। अगर वो एक पल भी दर्शकों को मिल गया तो नाटक और दर्शक के बीच गैप बनाना शुरू हो जाता है लाय टूट जाती है। फ़िर दर्शकों को खुजली होने लगती है। जाहिर है यह खुजली नाटक को डिस्टर्ब करती है।यह बात सही है की पूरा दोष नाटक पर नहीं थोपा जा सकता न ही दर्शकों पर। लेकिन एक बड़ा सवाल यह है की नाटक की औडिएंस को भी थोड़ा अपडेट होने की जरूरत है। आमतौर पर बड़े natak एक खास किस्म के एलिट क्लास की औडिएंस के सामने जा खड़े होते हैं( कम से कम लखनऊ में ).नाटक की असल में समझने वाले और उसे एन्जॉय करने वाले अक्सर auditoriaym के bahar खड़ा नजर आता है। एक खिसियाहट दोनों तरफ़ है। नाटक करने वालोंमें भी और देखने वालों में भी। बहरहाल, अच्छी बल्कि बहुत बात यह है की भले ही गडबडियां हुईं, नाटक ने अपना इम्पेक्ट उतना नहीं chhoda. इन दिनों नाटकों को लेकर अजीब सा फैशन उभरने लगा है की natakon ke बारे में बात बौधिक जुगाली करने के काफी काम आता है। फैशन हो या kuch aur लेकिन अच्छी बात यह है की नाटकों का युग लौट रहा है। फिलहाल, इस नाटक में सबसे बढ़िया लगी मंच सज्जा जो बेहद saada होते हुए भी अपना पूरा प्रभाव छोड़ रही थी। मंच पर लगी पेंटिंग्स उस दौर को बयाँ कर रही thi जिस दौर की थीम नाटक की थी। यह नाटक बटवारे के बाद दिलों पर पड़ी ख़राशों को बयां करता है। समय भले ही बदल गया लेकिन हालत अब तक वैसे ही है, वही भय, खौफ, जखम...सब kuch॥


एक अच्छा नाटक बनते बनते रह सा गया...


Sunday, February 15, 2009

गुलज़ार के संग एक शाम


कल की रात गिरी थी शबनम
कल की रात बड़ी उजली थी
कल की रात तेरे संग गुजरी...

गुलज़ार साहब की लिखी ये नज़्म सचमुच जी उठी
बीती रात। आसमान से हलकी झरती उस की बूंदों
के बीच जेनेसिस क्लब ख़ुद गुलज़ार साहब की आवाज
में महक उठा जब उहोंने एक एक कर अपनी नज्मों को
पढ़ना शुरू किया। उस रात वो आसमान सचमुच जरीवाला
नीला आसमान हो गया था। और ये कोई कल्पना नहीं थी।
वहां मौजूद हर शख्श अपने भीतर एक गुलजार को उगता
हुआ महसूस कर रहा था।
रात भर सर्द हवा चलती रही
रात बहर बुझाते हुए रिश्ते को तप हमने
मुझको इतने से काम पर रख लो
जब भी सीने पर झूलता लौकेट
उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा
करता रहूँ उसको....
इस नज्म को पढ़ते हुए उनके चेहरे पर
जोप शरारत के भावः थे वे उनकी उम्र को बहुत पीछे
छोड़ रहे थे...
उनकी पेर्सोनाल्तिटी के तमाम शेड्स यहाँ मौजूद थे।
पाकिस्तान के बटवारे के दर्द को बयां करने वाली नज़्म
भमीरी का जादू था तो जुलाहे से रिश्तों को बुनने के
तरकीब सीखने की ख्वाहिश भी थी...
उन्होंने अपने चाहने वालों के सवालों के जवाब भी दिए
और एक जवाब में शरारत से कहा की मुझे इन दिनों
फुर्सत तो मिल जाती है पर जाना नहीं मिलती।
सफ़ेद लिबास में सजे उस शायर की बहकी बहकी सी
बातें सबको अपनी गिरफ्त में रही थी। मौका वैलेंटाइन डे
का और इस कदर रोमेंटिक रात भला कौन भूल पायेगा।
गुलज़ार साहब पिछले दो दिनों से लखनऊ में हैं। मेरी उनसे
अलग से हुई मुलाकात का जिक्र और बहुत कुछ अभी बाकी
है। फिलहाल आज उनके प्ले खराशें देखने जाने का वक़्त है।
इस बारे में भी कल बात होगी...फिलहाल इतना ही...

Thursday, February 12, 2009

दूरियां

मैं सोचता
रहाऔर दूर चला आया
मैं दूर चला आया
और सोचता रहा
तुम सोचती रहीं

और दूर चली गईं
तुम दूर चली गईं
और सोचती रहीं
इस तरह हमने तय की दूरियां।

- मंगलेश डबराल

Tuesday, February 10, 2009

एकांत की खातिर

अस्तित्व सिर्फ़ साथ भर के लिए नहीं अपनी
तन्हाई के लिए भी जरूर चाहिए। दूर कमरे
में बैठा जो मेरी तन्हाई की हिफाज़त कर सके।
साथ के लिए तो बहुतों ने किसी न किसी को
चाह होगा पर किसी ने एकांत खातिर भी किसी
को चाहा हो नहीं जानती।
मैंने जरूर चाहा है........
अमृता की डायरी से.....

Sunday, February 8, 2009

pyar

मुझे प्यार नहीं चाहिए, मुझे पारस्परिक समझ चाहिए।
मेरे लिए यही प्यार है, और जिसे आप प्रेम की संज्ञा देते
हैं- बलिदान, वफादारी, इर्ष्या, उसे दूसरों के लिए
बचाकर रखिये, किसी दूसरे के लिए।
मुझे यह नहीं चाहिए। सचमुच नहीं।
मरीना

Sunday, February 1, 2009

is vasant men


इस वसंत के किनारे रुको
इसके फूलों में
इसके पानी में
इसकी हवा में
डूब जाओ थोडी देर को
सुनो इसके पदों की आवाज़
छुओ इसकी पत्तियां
सौंप दो अपने को
एक नाद सुने देगा
दिखाई देंगे देवदूतों के चेहरे
तुम्हारे भीतर प्रेम
बस धीमे से एक बार
नाम लेगा किसी का
तुम अमर होगी इस ऋतू में
फूल, पानी, हवा, वृक्ष और पत्तियां
तुम्हें धन्यवाद देंगी
नदियों में तुम्हारे लिए
आशीष होगा!
अलोक श्रीवास्तव की कविता