Wednesday, March 25, 2020

बसंत त्रिपाठी की कवितायें संध्या राग

बसन्त त्रिपाठी की कवितायें 1998 में पहली बार पढ़ी थीं. तब उनकी कविताओं की सादगी और गहनता ने आकर्षित किया था आज इतने बरस बाद उनकी कविताओं की सादगी में इजाफा हुआ है. गहनता ने और गोते लगाये हैं. उनकी भाषा की तरलता में अलग किस्म का सम्मोहन है. यह उनकी कहानियों को भी विशेष बनाती है और कविताओं को भी. वो सक्रियता के उफान में कविता के फलक पर आने और छाने वाले कवि नहीं हैं. उनकी उपस्थिति गरिमामय और संजीदा है जो निरंतर अपना स्पेस बढ़ाती जा रही है. बसंत को पढ़ना बसंत के मौसम को महसूस करने सरीखा लगता है. आज मेरे इस प्रिय कवि मित्र का  जन्मदिन है. उनकी कुछ कवितायें जो शाम के अलग-अलग रंग बिखेर रही हैं, यहाँ सहेज रही हूँ. जन्मदिन मुबारक दोस्त! - प्रतिभा 

संध्या राग 
1.
शामें कितनी भी अच्छी क्यों न हों
रात की दराज़ में
प्रेम-पत्र की तरह पड़ी होती हैं
प्रेम, जो अपनी सघन भावनाओं की
अनुभूत उपस्थिति के साथ
बीत चुका है
कालातीत
रात खुद
सुबह की चमक से चौंधियाकर
ससुराल आई नई बहू की तरह
कोठरी में दुबकी होती
दोपहर की थाली में
सुबह को
भोजन की तरह परोसा जाता है
और साँझ उसे
निवाले की तरह निगल जाती है

2.

यह गर्म लू के थपेड़ों से
भुनी हुई एक साँझ है
मूंगफली की तरह नहीं
कि छिलके उतारे और दाना मुँह में
कुरकुरा और मज़ेदार
भुट्टे की तरह भी सिंकी हुई नहीं
कि नींबू और नमक से मिलकर
जायकेदार
यह दोपहर की भट्टी से
अभी-अभी उतरी साँझ है
बड़भूँजे सूरज ने इसे
देर तक भूना है
इसी दोपहर की कड़ाह में कभी
महाकवि ने देखा था
पत्थर तोड़ती मजूरन को
गर्म साँझ धीरे-धीरे काली हो गई है
लेकिन बैसाख की रात
अब भी धमका रही है
3.
धूल का बवंडर
उठा है अभी-अभी
सूखी पत्तियों ने भी साथ दिया
बंद दरवाज़ों की दरार से 
भीतर घुस आई है धूल
सारी चीज़ों को अपने घेरे में लेती हुई
सड़कें तो जैसे
धूल की चादर
फर फर उड़ रही हैं
मुँह के भीतर किचकिचा रही है धूल 
परिन्दों ने ढूँढ़ लिया है
तत्काल कोई सुरक्षित जगह
खुशगवार शामों को
बेस्वाद बना रही है
सड़कों पर बिछी अलक्षित धूल.

4.

पल को
पलकों ने उठाया
तह कर रख दिया
करीने से
मेरी नींद के स्याह जल में
नींद के जल में
उजले कपड़ों की तरह
धीरे-धीरे घुल रहा है
बीत हुआ सघन पल
स्वप्न इशारे से बुलाता है अपने पास
मैं उस ओर जाता हूं
शब्दहीन शब्दातीत
जैसे शाम
चुप पड़े खेतों के बहुत पीछे
रात की गोद में
धीरे-धीरे दुबककर सो जाती है.
5.
यह एक संभ्रांत की शाम है
लगभग घटनातीत
घटनाओं के नाम पर
आसमान में बादलों के कुछ थिर टुकड़े हैं
और उनके भीतर से झाँकता
पका हुआ संतरा
पंछियों की लौटती हुई उड़ाने हैं
आसमान की दीखती हलचल है
और उसके पीछे ठहरा हुआ नील
जो बरस रहा है
धीरे-धीरे धीरे-धीरे
यह पक्के मकान की छत की शाम है
घनी आबादी वाले रिहाईशी से लगभग बाहर
भौतिक आशंकाओं के घेरे से बाहर खड़े
सौंदर्यवादी के लिए
शाम
दरअसल कब्रगाह है
जिसमें वह पहले ज़िन्दा गिरता है
मौत फिर धीरे-धीरे आती है
आती चली जाती है
6.

मामूली से मामूली दोपहरें भी
दिहाड़ी मजदूर की भूरी-नीली बनियान में
नमक की टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें छोड़ जाती है
बस शाम ही है
जो उसे थपकी देती है
तनी हुई नसों में
राहत बनकर दौड़ती है
हाथठेला खींचता हुआ मजदूर
छत्तीसगढ़ी लोकगीत की धुन पर
लगभग थिरकता हुआ
देशी ठेके तक पहुँचता है
शाम उसकी नसों में
नशा बनकर उतरती है.
7 . 

शाम चाहे समुद्री हो, पहाड़ी हो,
मरुस्थली, ऊसर या पथरीली
घने जंगल या नदी किनारे की नम शाम
या टूटे छप्परों वाली छत के भीतर
धीरे धीरे उतरती हुई
ये सारी शामें मेरे लिए
सैलानी की शामें हैं
मैं हर बार
बस देखता हूँ
अपने शहर की भागती धूल उड़ाती
गर्म और ठंडी शामें
मेरी हर शाम
मेरे शहर की ही शाम
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हिंदी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय, प्रयागराज – 211001

मो. 09850313062

5 comments:

लीलाधर मंडलोई said...

मन,मनःलोक के आत्मीय पलों पर थिर शाम के रंग ।
सुखद।

Vinod mishra said...

बहुत ही खूबसूरत कविता है, खासकर दूसरा बंध। प्रिय कवि कविताओं का बहुत अच्छा पाठ करते हैं। एक अच्छी कविता उपलब्ध कराने के लिए शुक्रिया।

dilbag virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 26.3.2020 को चर्चा मंच पर चर्चा - 3652 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी

धन्यवाद

दिलबागसिंह विर्क

Onkar said...

बहुत सुंदर

मन की वीणा said...

बहुत सुंदर प्रस्तुति।