Wednesday, August 29, 2018

खेल


यह एक खेल है इन दिनों
काफी लोकप्रिय होता खेल
हालाँकि नहीं हुई है अभी इस खेल की इंट्री
ओलम्पिक, एशियाड में

जाति, धर्म, वर्ग, समुदाय का भेदभाव मिटाकर
सब इस खेल में शामिल हैं
न न, कैंडी क्रश या फॉर्म हाउस नहीं
इस खेल में इंटरनेट की दुनिया में
न शामिल लोग भी शामिल हैं
गरीब से गरीब भी
अमीर से अमीर भी

रोजगार नहीं?
कोई गम नहीं
घर में रोटी नहीं?
कोई बात नहीं
बच्चियों का बलात्कार?
ओह, दुःख हुआ
गाँव बह गये?
बुरा हुआ, कुदरत का कहर
केरल की बाढ़?
उफ्फ्फ...हम कर भी क्या सकते हैं
किसानों की आत्महत्या?
भई, इतना भी तूल मत दो इन घटनाओं को
कवियों और लेखकों की गिरफ्तारी?
उन्हह, वो इसी लायक हैं.

यही है वो खेल
एक हाथ का दर्द कम करने को
दूसरे हाथ में ज्यादा चोट देना
बुखार की शिकायत करने पर
कैंसर की बात छेड़ देना
एकता की बात करते करते
अलगाव के बीज बोना
धर्म और जातीय विभेद से लड़ने की तक़रीर पढ़ते-पढ़ते
और गहरी करते जाना खाई
संवेदना का जाप करते हुए
नफरत के हथियार पैने करते जाना
हिंसा और नफरत के इस खेल में
स्त्री, पुरुष, गरीब, अमीर, हिन्दू, मुसलमान, ब्राह्मण, शूद्र
शामिल करना सबको

यह सबको एक-दूसरे के प्रति नफरत से भर देने का खेल है

खिलाडियों की भीड़ है, भीड़ का उफान है
भीड़ का उत्साह देखिये इस खेल को खेलते वक्त
एक भी मौका चूक न जाए इसलिए वीडियो रिकॉर्डिंग मुस्तैदी से
फारवर्ड का अचूक अस्त्र और उत्साह बढ़ाता है खेल के प्रति

कुछ सड़क पर उतरकर खेल रहे हैं
कुछ न्यूज़ रूम में बैठकर
कुछ चौराहों पर,
कुछ चाय की गुमटियों पर
कुछ कौन बनेगा करोड़पति देखते हुए खेल रहे हैं
कुछ दांत भींचते हुए खेल रहे हैं स्मार्ट फोन के स्क्रीन पर
फेसबुक पर भी हैं बहुत से खिलाड़ी

जो इस खेल में शामिल नहीं हैं
उनकी चुप्पी शामिल है इसमें

जो मुखर होकर इस खेल के विरोध में हैं
वो या तो गायब हो जाते हैं अचानक जादू से
या 'अपनी मौत का जिम्मेदार खूद हूँ'
की चिट्ठी लिखकर झूल जाते हैं फंदे पर
या घर के भीतर कोई अदृश्य जादूगर आकर
कर जाता है उनकी हत्या
बिना कोई सुराग छोड़े

इस खेल के नियम ऐसे हैं कि हत्यारों के खिलाफ
नहीं मिलते कोई सुबूत
और लेखकों, कवियों, छात्रों,
और इस खेल में न शामिल हुए लोगों के खिलाफ
सुबूतों का ढेर मिल जाता है

कुछ भी हो हिंसा और नफरत के इस खेल ने
समूचे देश को एक सूत्र में बाँध रखा है.

6 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शुक्रवार (31-08-2018) को "अंग्रेजी के निवाले" (चर्चा अंक-3080) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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sweta sinha said...

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना शुक्रवार ३१ अगस्त २०१८ के लिए साझा की गयी है
पांच लिंकों का आनंद पर...
आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

गगन शर्मा, कुछ अलग सा said...

बढ़िया !

सुशील कुमार जोशी said...

और खेल जारी रहेगा। सुन्दर।

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन गाँव से शहर को फैलते नक्सली - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

Kusum Kothari said...

व्यंग के रुप में आपने जो यथार्थ बयां किया है वो सचमुच आज का विसंगतियों से भरा डरावना घिनौना खेल है, देश में बडे विस्तृत पैमाने पर खेला जा रहा है और परिणाम भी सटीक है आपकी रचना में ।
अप्रतिम प्रस्तुति