Sunday, August 20, 2017

चलो न जी लेते हैं....


घर की दहलीज़ लांघना आसान नहीं होता, जाने कितनी पुकारें रोकती हैं, जाने कितने दर्द, कितनी जिम्मेदारियां. कैसा कच्चा पक्का सा होता है मन. लेकिन शो मस्ट गो ऑन की तर्ज़ पर निकलना ज़रूरी होता है और निकलने का उपाय निकलना ही होता है सो चल पड़े थे सफर को फिर एक बार...छतीसगढ़, रायपुर.

ऐसा हड़बड़ी का दिन था कि दवाइयां रखना तो याद रहा लेकिन बहुत कुछ छूट भी गया, एयरपोर्ट जाकर याद आया कि मोबाइल भी छूटा है...एक ही मिनट की बेचैनी थी बस....उसके बाद से असीम शांति है...पहली बार इतने दिन बिना मोबाईल के हूँ.

सुबह बिटिया को स्कूल छोड़ने जाते वक़्त एक्सीडेंट होते-होते बचने से शुरू हुआ वो दिन मोबाईल घर पर छूटने भर पर नहीं रुका. रायपुर पहुँच कर पता चला कि मेरा सामान भी जाता रहा. एक जैसे ट्रैवेल बैग थे तो एयरपोर्ट पर बेल्ट से कोई और सज्जन मेरा बैग अपना समझ के ले गए. (हालाँकि तमाम लिखत पढ़त और पड़ताल के बाद सामान अगले दिन वापस मिल गया)

दोस्तों के होते जिन्दगी में कभी कुछ कमी रही ही नहीं, देवयानी का सामान उसके कपडे सब उससे पहले मेरे हो गए एक पल भी न लगा.

सुबह की हथेलियों में सारी परेशानियों का ईनाम था.आँख खुली और खुद को किसी गहरे हरे समंदर के बीचोबीच पाया.....इतना हरा, इतना हरा...उफ्फ्फ.

धमतरी में हमारा ऑफिस किसी ख़्वाब सा मालूम होता है, ऑफिस होते हुए भी ऑफिस लगता नहीं. कोना-कोना जिस लाड़ से जिस स्नेह से सजाया गया है, जिस तरह हर कोना अपने पास रोक लेता है वह एहसास कमाल है. नवनीत बेदार और उनकी टीम ने इसे काम की तरह नहीं इश्क की तरह अंजाम दिया है...दे रहे हैं...हम उनके इश्क को महसूस कर रहे हैं.

देवयानी लम्हों को सहेजना जानती है, मेरे पागलपन के सुर में सुर लगाना जानती है. धान के खेतों में हवा से बनती लहर को देखना किसी जादू को देखने सा मालूम होता है..घंटों ताकते रहने को जी चाहता है, बहुत सारा चुप रहने को जी चाहता है, बोलने से हवा की लय न टूट जाए कहीं...हम उसे छेड़ना नहीं चाहते...बस जीना चाहते हैं...अभी इस हरे समंदर में डुबकियां ले रही हूँ...आवाज कोई नहीं है आसपास...एक ख़ामोशी तारी है...भीतर कुछ खाली हो रहा है, कुछ भर रहा है...

छुटपुट बतकहियाँ भी हैं, किस्से हैं, जेएनयू के किस्से ऐसे कि आँखें भीग जाएँ...और प्यार हो जाए जेएनयू से, उन सब दोस्तों से जो हैं आसपास और जो हैं जिक्र में...

जिन्दगी कितनी खूबसूरत तो है...चलो न इसे जी लेते हैं....इन खूबसूरत लम्हों में तनिक मर ही लेते हैं....

(धमतरी डायरी, 19 अगस्त 2017 )

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (21-08-2017) को "बच्चे होते स्वयं खिलौने" (चर्चा अंक 2703) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

iBlogger said...

नाम वही, काम वही लेकिन हमारा पता बदल गया है। आदरणीय ब्लॉगर आपने अपने ब्लॉग पर iBlogger का सूची प्रदर्शक लगाया हुआ है कृपया उसे यहां दिए गये लिंक पर जाकर नया कोड लगा लें ताकि आप हमारे साथ जुड़ें रहे।
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ANHAD NAAD said...

कैसे आयी हुई परेशानी को नियति मान लेना, और सामने हरे को, दोस्तों को ज़्यादा महसूस कर लेना उस खोए हुए को नवीन अनुभवों का कारक मान लेना, कि खो जाने के बाद कुछ नया प्राप्त होना, जो उसके होने के दौरान महसूस न किया जा सका हो, वाह जो भी मिला प्यार से हम उसी के हो लिए, जीना कोई आपसे सीखे। जीने का हुनर विरासत नही है, मर के ही जिया जा सकता है।

Tejkumar Suman said...

मरकर ही जिया जा सकता है।