Saturday, June 10, 2017

जन्मदिन मुबारक ज्योति !



भरी दोपहर में न अमिया चुराईं, न गुट्टे या सिकड़ी के खेल खेले, न रस्सी कूदे न साथ में पापड़ बड़ियाँ बनायीं... नोट्स जरूर लिए एक-दूसरे से, इम्तिहान में पास बैठने का फायदा उठाया एक दुसरे से पूछापाछी की, कैसेटों की अदला बदली की, सिनेमा हॉल के दौड़ लगायी, कभी घर में बताकर कभी बिन बताये, पॉकेटमनी के पैसों से हिसाब लगाकर सस्ते शो को तलाशते हुए देखीं तमाम फ़िल्में भी...हज़रतगंज की सड़कों पर अपने मन के कितने कोने खोले, कितने सवालों की गिरहें खोलीं।

बरसों में गिनने बैठूं तो उम्र कम पड़ जाएगी हमारी दोस्ती के साल कितने हुए यह गिनने में क्योंकि हमने लम्हों में बरसों को जिया है, कभी-कभी तो सदियों में भी जिया है. वक़्त का हर रंग हमने साथ देखा है, वक़्त की हर करवट के साक्षी बने हैं.

वो लैंडलाइन के ज़माने में घंटों फोन पर बात करने वाले दिन थे, जब फ़ोन का बिल आने पर हम घरवालों से मुंह चुराते फिराते थे...और कभी किसी को समझा ही नहीं पाये कि दिन भर कॉलेज में साथ रहने के बाद, घंटों फोन पर बात करने के बाद भी आखिर ऐसा क्या बचा रह जाता है कि हमारी टीवीएस चैम्प (मेरी नीली, तुम्हारी ग्रे) एक दूसरे के घर की तरफ भागती थीं...कभी-कभी हम एक दूसरे को क्रॉस भी कर जाते थे. तुम मेरे घर पहुँच जाती थीं और मैं तुम्हारे.

हम अपने भीतर के भटकावों में से निकलने के लिए शहर की सड़कों पर भटकने लगे...कितनी बारिशों ने हमें साथ में भिगोया, फिर धूप और हवा ने ब्लोअर बनकर सुखाया भी. सच कहूँ, मैंने हमेशा तुमसे सीखा ही. इस रिश्ते में मैंने ही हमेशा तुमसे लिया, बहुत कुछ.

सबसे बड़ा था वो भरोसा कि अगर तुमने कुछ कहा तो उस पर दोबारा सोचने की ज़रूरत लगी ही नहीं. हालाँकि पसंद के मामले से लेकर वैचारिक मामलों तक में हमारी दिशाएं हमेशा विपरीत रहीं। हाँ, पिछले कुछ बरसों में हमारे विचारों में कुछ साम्यता बनने सी लगी है फिर भी हमारे स्वभाव के कंट्रास्ट मुसलसल जारी हैं और हमारा उन कंट्रास्ट को जीने का ढंग अब भी वही है...

याद है अभी हाल ही में तुमने कहा था, 'हिसाब-किताब के मामले में तुम पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता...बेकूफ ही हो एकदम...' कितना हंसी थी उस रोज़.

हमें एक-दूसरे को कभी बताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि मन का मौसम कैसा है...हमें कभी एक दूसरे को जताने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि कितनी ज्यादा वैल्यू है एक-दूसरे की. कभी लम्बी खामोशी में भी पढ़ा तुमने मुझे और कभी खूब बक-बक में भी सुनी मेरी ख़ामोशी...

मुझे याद नहीं तुमने कभी मेरी तारीफ में या मेरे किसी काम (किसी लिखे पढ़े ) की तारीफ में कोई कसीदे कभी काढ़े हों, हमेशा कुछ जो कम था वो बताया....या तुम्हारा यह कहना कि 'कुछ मजा नहीं आया...' या बस 'उन्हू' कहना...कितना सार्थक है वो सब...

जिन्दगी के सबसे काले दिनों में तुम्हारा साथ रौशनी सा रहा, और जिन्दगी के उजले दिनों में काला टीका बनकर रहीं तुम. ‘अच्छा ज्यादा बनो मत’ तुम्हारा कहना हो या मेरा पूछना कि ‘कहीं मुझमें भी अहंकार तो नहीं आ गया, क्योंकि अहंकार न होने का भी अहंकार कितने धीमे से उतरता है नसों में पता नहीं चलता है’ और तब तुम कहती कि ‘जब आएगा तो सबसे पहले मैं ही बताऊंगी...चिंता मत करो...’ कितनी बड़ी आश्वस्ति है इसमें.

तुम 'हाँ 'कह देती हो तो लगता है कुछ ठीक हो ही जायेगा...तुम नहीं जानती कि तुम्हारा होना कितना मायने रखता है मेरी जिन्दगी में...मेरी शादी के वक़्त हर पल तुम्हें ही तलाशती मेरी नज़रें हों या तुम्हारी विदाई के वक़्त निशांत को गुस्से से घूरती नज़रें...सबमें तुम ही तो थीं...

शहर बदले, जिन्दगी बदली, जिन्दगी में नए रिश्ते शामिल हुए...नए हालात बने...कितने उतार, कितने चढ़ाव...लेकिन तुम्हारा साथ...हमेशा ताकत बनकर खड़ा रहा...
आज अपनी बेटियों की दोस्ती को देखती हूँ तो आँखें ख़ुशी से छलक पड़ती हैं...हमारे प्यार को, हमारी दोस्ती को हमारी बेटियों ने सुभीते से संभाला है...दीत्या का मुझे 'मौसी' कहना...पहली बार ‘मौसी’ शब्द को महसूस करना था...तुम कहती थीं वो तुम्हारे बिना किसी के साथ कहीं नहीं जाती और वो बिना झिझक मेरे साथ चल पड़ी थी...याद है बैंगलोर की वो शाम? और मैं कहती थी कि शिवी मेरे बिना किसी पास रुकती नहीं और फिर उसका तुम्हारे घर दो दिन मजे से रुकना, एक दिन और रुक जाने का इसरार करना।

शिवी जब यह कहती है कि अगर ज्योति मौसी का फोन है तो कोई बात नहीं वरना किसी से बात करना अलाउड नहीं है तो कितना सुख होता है. जानती हो, घर आने के बाद जो बेटू का वक़्त होता है न, उसमें सिर्फ नानी और ज्योति मौसी से ही बात करने की परमीशन है मुझे...

जब ज़माने के तमाम रिश्तों की कलई उतर रही हो, तमाम लोग हालात के चलते बदल गए हों एक हमारा रिश्ता ही है जिसकी चमक लगातार बढती जा रही है...

सच जिन्दगी में एक ऐसा दोस्त कितना कीमती होता है जिसके आगे कुछ भी कभी भी कैसे भी कहा जा सके जिसकी सहमती ज़रूरी न हो जिसे कैसा लगेगा यह सुनकर का डर न हो...आज तुम्हारे जन्मदिन पर इससे बेहतर तोहफा मुझे नज़र ही नहीं आता...इन बच्चियों में अपने दोस्ती को रूपांतरित होते देखना....इससे बेहतर क्या होगा...

जानती हूँ तुमको इस तरह कहा जाना पसंद नहीं है फिर भी मैंने कब तुम्हारी हर बात मानी है....नाराज़ न होना, हो भी गयी तो क्या जरा डांट ही लोगी न, एक बार और सही...

जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...हमें साथ साथ बूढा होना है...बच्चों से बहुत सारी डांट खानी है और बहुत सारा साथ में जीना है...लड़ना है...बढ़ना है....जन्मदिन मुबारक हो दोस्त...बहुत से बहुत ज्यादा प्यार....

3 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (11-06-2017) को
"रेत में मूरत गढ़ेगी कब तलक" (चर्चा अंक-2643)
पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Kavita Rawat said...

दोस्ती हो तो ऐसी
बहुत अच्छी लगी दोस्ती की कहानी ..... कुछ पुरानी यादें कुछ आज की ..बाकी बाद में बनेगी
ज्योति जी को जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएं!

Jyoti Dehliwal said...

ऐसे दोस्त नशीब वालों को ही मिलते है। आप दोनों को दोस्ती सलामत रहे।