Thursday, August 25, 2016

चलने से पहले....



जब चलना चाहती हूँ तो ठहर जाती हूँ
देर तक ठहरी रहती हूँ
टटोलती हूँ
अपने कदमों को

अपने चलने की इच्छा को
क़दमों के चलने की इच्छा से मिलाती हूँ
बैठ जाती हूँ

जब मैं चलना चाहती हूँ
तब आहिस्ता-आहिस्ता बटोरती हूँ आहटें
उस सबकी जो चल रहा होता है
सिर्फ स्कूटर या गाडियों की नहीं
चल रहे दिशाभ्रम की
उन बातों की जिनमें चलना शामिल है
उस हवा के चलने को महसूसती हूँ
जो छूकर गुजरी नहीं ज़माने से
उन ख्वाबों की
जिनमें हम दो कदम ही सही
साथ चले थे
उन उम्मीदों की जिनसे झरता रहता है
तुम्हारा उम्र भर साथ चलने का वादा
टप्प टप्प टप्प...

जब मैं चलना चाहती हूँ
तो देखती हूँ
किस कदर ठहर गया है सब कुछ
घडी भी चलती सी नहीं लगती उस वक़्त
उसकी सुइयां एक दुसरे में उलझकर
सुस्ता रही हों जैसे
दीवार पर रेंगती छिपकली
भी घंटों एक ही जगह रुकी रहती है
एक ही तरह से
नाक के पास ले जाती हूँ हथेली
कि सांस भी चल रही है क्या
जिन्दगी का तो पता नहीं

ये भागदौड़ के चक्कर में
चलना कबका छूट गया था
और ये जान सकना भी कि
चलना और भागना दो अलग बातें हैं...

चलने से पहले ठहरना जरूरी था...


1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (27-08-2016) को "नाम कृष्ण का" (चर्चा अंक-2447) पर भी होगी।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'