Thursday, December 24, 2015

मस्तानी तो दीवानी थी लेकिन...



एक स्त्री द्वारा दूसरी स्त्री को अकेलेपन और दुखी होने के अभिशाप देने के साथ फिल्म न खुलती तो संजय लीला भंसाली के दिव्य, विराट प्रेम के शाहकार में कोई कमी आ जाती क्या? पता नहीं मेरा मन वहीँ से उखड गया था. मैं मन में 'गुज़ारिश' की सी चाह लिए गयी थी शायद। हालाँकि भंसाली के सिनेमाई वैभव, उनके  आँखों पर धप्प से गिर पड़ने वाले रंगों के विशाल संसार में गुम हो जाने के खतरों से नावकिफियत नहीं थी.

प्रेम वो चाहे जिस डगर से पुकारे पांव खिंचते जाते है सो सोचा कि चलो मस्तानी की कहानी सुनते हैं भंसाली साहब से. भंसाली उस्ताद किस्सागो हैं. वो इतिहास से कहानी उठाते हैं और दर्शकों के मुताबिक उसमें रंग भरते हैं. दीपिका और प्रियंका आमने-सामने आती हैं और देवदास की याद ताज़ा हो आती है माधुरी और ऐश्वर्या की याद.

रूपहले पर्दे पर ऐतिहासिक प्रेम खुलता है लेकिन क़टार सा धंसता नहीं कलेजे में. कोई पीड़ा, कोई जख्म, कोई संवाद पिघलकर आँखों से बहने नहीं लगता। दुःख की महीन कोपलों को दिव्य दृश्य रिप्लेस कर देते हैं. पत्नी काशी हमेशा दीयों, रंगों और ज़ेवरों में घिरी है. लेकिन मस्तानी वो तो योद्धा है. मालूम नहीं क्यों तोहफे में खुद को पेशवा के आगे पेश करने और उसकी तमाम शर्तों के आगे 'क़ुबूल है' की मुहर लगाकर ही क्यों इतिहास से प्रेम सिद्ध होते आ रहे हैं. या ऐसे ही प्रेम को इतिहास में जगह मिली हो क्या पता.

जाने कब तक, कितनी बार दूसरी पत्नी को या प्रेमिका को या तो 'रखैल' की  गाली सहनी होगी या राधा और रुक्मिणी प्रकरण में पनाह लेनी पड़ेगी। क्या सचमुच फिल्मकारों को राधा के दुःख का अंदाजा है या उसके मंदिरों में पूजे जाने में ही प्रेम की महानता को देखना काफी है.

काशी के जिस दुःख से नाना पिघल जाता है वो दुःख भंसाली दर्शकों की रगों में उतार पाने से चूक जाते हैं. मस्तानी का योद्धा रूप आकर्षित करता है लेकिन उसका प्रेम सिर्फ परदे पर ही चमकता है दिल तक नहीं उतरता।

पेशवा न्याय प्रिय है. मस्तानी का सम्मान बचाता है. उसकी सुरक्छा का ख्याल रखता है, उसे दो गांव देता है, परिवार और समाज से लड़ जाता है उसके लिए, पेशवाई से मुह तक मोड़ लेता है फिर भी जाने क्यों कुछ सवाल उठते ही हैं मन में.

अगर मस्तानी ने खुद को तोहफे में सौंप न दिया होता तो? और क्या ये कोई बात ही नहीं कि एक ही पुरुष एक ही वक़्त पे दो अलग-अलग स्त्रियों से पिता बनने की खबर सुनता है? मस्तानी को 'कटार' देकर (अपने प्रेम को स्वीकार करके) लौटते हुए कितनी बार पेशवा का दिल प्रेम से बिछड़ने के दुःख से भर उठा था? किस तरह वो मस्तानी को बिसराकर काशी के संग सहजता से अंतरंग होता है? और एक अहम सवाल कि मस्तानी अगर मुसलमान न होती तो क्या होता? तो क्या पेशवा की पत्नी काशी मस्तानी को स्वीकार लेती? क्या उसका दुःख तब कम होता?

अगर एक ही वक़्त में एक पुरुष दो स्त्रियों के साथ रिश्ते में है, तो दोनों के साथ न्याय सम्भव नहीं। किसी न किसी को दुःख होना तय है, वो दुःख पेशवा का दुःख भी था क्या? क्यो वो एक दृश्य में दिए बुझाने के साथ ही बुझता नज़र आता है? कितने ही ऐसे दृश्य थे जहाँ भाव की प्रधानता पर दृश्य की प्रधानता का कब्ज़ा दीखता है. फिल्म का अंत खासा ड्रामेटिक है. मस्तानी के बच्चे के मुह में कुछ संवाद रखकर भंसाली जरा सी नब्ज थाम पाते हैं, पल भर को.

'जो इंसान के बस में नहीं वो इश्क़ के असर में है,' 'इश्क़ इबादत है और इबादत के लिए इज़ाज़त की ज़रुरत नहीं होती' 'तुझे याद किया है किसी 'आयत' की तरह' जैसे संवाद मोहते हैं.फिल्म वाकई शानदार है लेकिन अगर ये प्रेम कहानी थी तो प्रेम मिसिंग ही लगा. तमाम तामझाम में  प्रेम ही  छूट गया हो मानो। हालाँकि प्रेम का वैभव सुनहरे परदे पर कायम रहा.

या मुझे प्रेम की समझ नहीं या भंसाली चूक गए. जानती हूँ पुरस्कार बहुत मिलेंगे आपको लेकिन मेरे लिए तो अब भी मांझी की प्रीत ही साँची है.



1 comment:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (26-12-2015) को "मीर जाफ़र की तलवार" (चर्चा अंक-2202) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
क्रिसमस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'