Tuesday, February 10, 2015

सुनो अरविन्द!



इस जीत के जश्न से कान हटाओ जरा और सुनो कि ये जीत क्या कह रही है? यह जीत किसकी जीत है. और ये हार किसकी है आखिर? अरविन्द केजरीवाल या आम आदमी की जीत और मोदी या भाजपा की हार के रूप में इसे देखना इस जनादेश को बहुत कम करके आंकना होगा। ये जीत अब तक लोगों को वर्गों में, जातियों में, धर्म की संवेदना में बांटकर, उकसाकर, उन्हें मौजूं मुददों से भटकाकर वोटो से अपनी झोली भरने वाली सारी राजनैतिंक पार्टियों के खिलाफ है. ये जीत नेताओं की जोड़-तोड़  की राजनीति और अपनी असफलता को कभी दूसरी पार्टियों के सहयोग न मिलने, कभी जनता पर पूर्ण बहुमत न होने के आरोपों का मुहतोड़ जवाब है.

जाति-धरम, मंदिर-मस्जिद जैसे मुद्दों की आड़ में अब कोई पार्टी खुद को ढँक नहीं पाएगी. इस मतदान के सुर को सभी राजनैतिक पार्टियों को ठीक से सुनने की ज़रुरत है. सबसे ज्यादा आम आदमी पार्टी को. वाम को भी समझना होगा कि सिर्फ विचारधाराओं की खेती करने से बात नहीं बनेगी.  यूँ भी आम की बात ही तो वाम है.... तो अगर पार्टी के टैग पर न जाएँ समाज के अंतिम आदमी का हाथ पकड़कर चलने के विचार पर जाएँ तो वाम की  खुशबू आती मिलेगी।

लेकिन ध्यान रखना होगा कि जो जनता इतने बड़े आवेग से आपके साथ खड़ी है,  वो कल आपके खिलाफ भी जा सकती है. यह व्यक्ति के मोह और पार्टी के प्रति बरसों की वफादारी वाला जनादेश नहीं है. यह जनादेश एक सन्देश है कि लो कितना बहुमत चाहिए, अब काम करके दिखाओ. दिल्ली के वोटर ने पूरे देश के वोटर को भी सन्देश दिया है कि  मुद्दों पर वोट दो, मुद्दे जो जिंदगी की राह आसान करें न की हमें आपस में बांटें और नेताओं की झोलिया पहले वोट से फिर नोट से भरे. 

जनतंत्र की बुनियाद यही है. असल जनतंत्र की ताक़त दिल्ली ने पहचानी है. ज़ाहिर है, ये जीत सारे वर्ग, समूहों, धर्मों, जातियों के लोगो ने मिलकर रची है. अरविन्द ने हारकर भी भारतीय राजनीति में सकारात्मक बदलाव की शुरुआत कर ही दी थी. किस तरह एक नेता भी आम आदमी ही होता है , उससे भी गलतियां हो सकती हैं और जिन्हे स्वीकार करने में कोई अहंकार आड़े नहीं आता. आरोप-प्रत्यारोप, इसकी टोपी उसके सर वाली राजनीति से इतर आत्मवलोकन, स्व-सुधार की ओर बढ़ने की राजनीति जनता की पसंद बनी. बिजली, पानी, महंगाई, सफाई, रोजगार जैसे मुद्दे तमाम महंगे चुनावी प्रचार और हमला बोल राजनीति से आगे निकल गये. 

इस जनादेश में छुपी जनता की आवाज को सुनना होगा कि वो क्या चाहती है. आम आदमी पार्टी शायद इसे सुन पा रही है इसीलिए अरविन्द कहते हैं कि उन्हें डर भी लग रहा है. ये डर ही उन्हें सही रस्ते पे बनाये रखेगा ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए. क्योंकि जनता जब जाग जाती है तो वो अपने मतदान से आपको मौका देती है लेकिन याद रहे वो ये मौका इसी आक्रामकता के साथ छीन भी सकती है.

मोदी को भी जनता ने यही सोचकर चुना कि  खाली बोलो नहीं, ज़रा काम करो. बहुमत चाहिए? लो हमसे लो और अब चुपचाप काम करो. काम नहीं तो वोट नही. केंद्र और दिल्ली की सरकारों को बहुमत ही  नहीं जनता की चेतावनी भी मिली है, जो इसे नहीं समझेगा उसे इसकी कीमत चुकाने को तैयार रहना होगा। ये जनता से सबक लेने वाली राजनीति का दौर है… 

जीत अपने साथ जिम्मेदारी लेकर आती है.… जश्न पार्टी कार्यकर्ताओं का हक़ है लेकिन पार्टी के नेताओं के लिए यह जश्न का नहीं अपने कंधे चौड़े करने और जनता के द्वारा दी गयी जिम्मेदारी को ठीक से निभा पाने की ओर कदम बढ़ने का वक़्त है.... 

ये भावुक वोटर का प्यार नहीं है अरविन्द ये एक जागरूक वोटर की जिम्मेदारी है तुम्हारे कन्धों पर....

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