Sunday, June 8, 2014

यह किसका प्रेम है बोलो तो?


लड़का- 'तुम इस धरती पर कब आईं....?'
लड़की-' धरती पर नदियों के आने से भी पहले, खेतों में पहली फसल की खुशबू उगने से बहुत पहले, मौसम की पहली अंगड़ाई लेने से भी पहले....'

लड़का- 'इतनी सदियों से धरती पर आकर तुमने क्या किया?'
लड़की- इंतज़ार
लड़का- 'किसका?'
लड़की- 'तुम्हारा नहीं....'
कहकर लड़की खिलखिला कर हंस पड़ी। ज्यों-ज्यों वो हंसती जाती नदियों का कोलाहल बढ़ता जाता, फूलों की गमक बढ़ती जाती, बादलों की धमक बढ़ती जाती। सूरज का ताप बढ़ता जाता.....
लड़की ने लड़के की पीठ से अपनी पीठ टिकाते हुए कहा, 'सुनो ये धरती पर नदियों के जन्म से पूर्व की कथा है। ये किसी भी राजा या रानी के अस्तित्व में आने से पूर्व की कथा है। यह बुद्ध के ज्ञान और ईसा के क्रूस पर लटकाये जाने से भी बहुत पहले की बात है। धरती एकदम खाली थी। खुशी से भी, गम से भी। तभी एक लड़की ने धरती पर पांव रखा। धरती को मानो प्राण मिले। अकेली धरती, कबसे अपनी धुरी पर घूमते-घूमते उकता चुकी थी। उसका न कोई साथी, न सहेली।

लड़की आई तो धरती ने उसे सीने से लगाया। खूबसूरत मौसम जो न जाने कबसे बिना किसी भाव के बस आते-जाते रहते थे। धरती ने उन मौसमों की चूनर में आकाश के सारे तारे टांककर एक सुंदर ओढ़नी बनाई। उसे लड़की को ओढ़ाया। लड़की मुस्कुरा उठी। यह धरती पर लड़की की पहली मुस्कुराहट थी। उसके मुस्कुराते ही मौसम भी मुस्कुरा उठे। लड़की और धरती अब सखियां थीं। लड़की कभी-कभी धरती से कहती लाओ अपना बोझ मुझे दे दो, तुम थोड़ा आराम कर लो, थक गई होगी....अपनी परिधि पर लगातार घूमना आसान है क्या...और सचमुच धरती कुछ दिन लड़की के पहलू में सिमटकर सो जाती, उन दिनों सूर्य के चारों ओर धरती नहीं, लड़की चक्कर लगाती थी। सृष्टि के कारोबार में कोई विघ्न डाले बगैर यह दोस्ती गाढ़ी हो रही थी। 

सुनो तम्हें एक राज की बात बताती हूं, लड़की अब भी कभी-कभी धरती हो जाती है, धरती कभी-कभी लड़की। 

एक रोज जब आसमान में खूब घने बादल थे....धरती भी रात के तीसरे पहर में ऊंघते हुए सफर कर रही थी लड़की की आंख से पहला आंसू टपका। वो आंसू धरती पर गिरा तो धरती पर नदियां बहने लगीं....धरती ऊंघते से जाग उठी। इसके पहले कि धरती कुछ समझ पाती धरती पर मीठे पानी का सोता फूट पड़ा। पानी ही पानी। झरने फूट पड़े। मीठे पानी वाले झरने। धरती ने उस पानी को चखा ये समंदर के पानी सा खारा नहीं था। इस पानी की मिठास ही अलग थी।
एक रोज धरती ने लड़की का हाथ पकड़ लिया और पूछा,' तू क्यों उदास रहती है? क्या तलाश रही है तू? '
लड़की खामोश...हवाएं शांत...चांद चुप, तारे टकटकी लगाये उसे सुनने को बेताब। 'मैं धरती पर किसी को तलाशते हुए आई हूं....कोई ऐसा जो मेरे होने को विस्मृत करे, कोई जिसे देखते ही आंखें तृप्त हों, जिसे सुनकर लगे कि सुना सबसे मीठा संगीत, कोई आत्मा के तमाम बंधनों से मुक्त करे...कोई जो होने को होना करे और जिसके साथ मिलकर धरती पर प्रेम रचा जा सके....

धरती ने ठंडी आह भरी...आकाश की ओर देखा, आकाश मौन रहा...उसने सिर्फ पलकें झपकायीं....'ओह...प्रेम की तलाश...?' संपूर्ण सृष्टि ने कहा, 'यानी दुःख की अभिलाषा....धरती बुदबुदाई...लड़की जा चुकी थी...दूर कहीं एक और नदी जन्म ले रही थी। ये लड़की के भीतर का प्रेम था, जिसकी चंद बूंदें भर छलकने से धरती पर नदियों का जन्म हुआ...यह धरती पर नदियों के आने की कथा है...कोई भागीरथी नहीं लाया था किसी की जटाओं से मुक्त कराकर कोई नदी, दरअसल, स़्त्री के प्रेम से जन्मी हैं सारी नदियां....कुछ समझे बुद्धू...'
लड़की ने कहानी के आखिरी सिरे में गांठ लगाते हुए कहा।
लड़का- तुम फिर शुरू हो गई? तुम और तुम्हारी कहानियां। दुनिया में हजार परेशानियां है और तुम्हारी कहानियां...जाने किस दुनिया से आती हैं। 

लड़का अचानक उठ खड़ा हुआ। उसके इस तरह अचानक उठकर खड़े होने लड़की जो उसकी पीठ पर पीठ टिकाये थी लुढ़क गई। लड़की बिना संभले हुए ही मुस्कुरा उठी। 'तुम चिढ़ गए हो ना?' वो अपनी मुस्कुराहट को चुपके से चबा रही थी।
लड़का- 'मैं क्यों चिढूंगा? क्यों चिढूंगा मैं बोलो?' ऐसा कहते हुए लड़का झुंझला रहा था।
लड़की- 'क्योंकि मेरी कहानी में इस बार तुम नहीं हो। कहीं नहीं हो....इसलिए...' लड़की ने सामने बहती नदी में कंकड़ उछालते हुए कहा। 

लड़का उठकर चल दिया। यूपीएससी के फॉर्म जमा करने की आखिरी तारीख है। उसे याद आया। वो जनता था कि लड़की से इस बारे में कुछ भी कहने का कोई अर्थ नहीं। वो फॉर्म के टुकड़े करके हवा में उछाल सकती है।
लड़की अपनी ही धुन में थी।

'बोलो चिढ़ गये न तुम....?' अब लड़के ने मुस्कुराहटें चबाईं....उसने लड़की की लंबी चोटी खींचकर उसे अपने करीब कर लिया। शरारतें गुम हो गईं सारी...सिर्फ सांसें बचीं...

'वो जो लड़की की आंख का पहला आंसू गिरा था धरती पर वो किसके लिए था बोलो तो...इन नदियों में पानी नहीं प्रेम बहता है...पता है ना? यह किसका प्रेम है बोलो तो? लड़की चुप....लड़का चुप...धरती चुप....आसमान चुप...'
कुछ देर बाद वहां न लड़का न लड़की सिर्फ नदी की चौड़ी धार बहती दिखी....जिसके किनारों पर अल्हड़ खिलखिलाहटों का जमावड़ा था, जिसके किनारे पंछियों की चहचआहट थी, फसलों की खुशबू, जिंदगी नदी के किनारों पे महक रही थी....

5 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस' प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-06-2014) को "यह किसका प्रेम है बोलो" (चर्चा मंच-1638) पर भी होगी!
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

Digamber Naswa said...

मन को छूती कहानी ....

Anju (Anu) Chaudhary said...

वाह बहुत उम्दा ....दिल को छु गई

Anju (Anu) Chaudhary said...

वाह बहुत उम्दा ....दिल को छु गई

Shikha Shukla said...

शायद लड़के को लड़की की हर कहानी में कहानी में अपनी ही तलाश थी , पर मुझे तो धरती की सहेली ही पसंद है। ………सुन्दर रचना.