Wednesday, May 14, 2014

तुम भी बस.…



गुलमोहर- सुनो…कविता सुनोगे?
अमलताश- रहने दो, बस तुम साथ रहो कुछ देर.....

गुलमोहर- (शरमाते हुए) तुम भी बस.…

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गुलमोहर- अच्छा बताओ तो ये एग्जिट पोल जो कह रहे हैं वो कितना सच है ?
अमलताश- पता नहीं

गुलमोहर- अच्छा नयी सरकार मे फूलों को महकने की आजादी तो होगी न?
अमलताश- (अनमना सा) पता नहीं

गुलमोहर- तुम नाराज हो क्या?
अमलताश- पता नहीं

गुलमोहर- हम्म्म, अच्छा कविता सुनोगे?
अमलताश- (शांत होते हुए) ठीक है.… सुनाओ

गुलमोहर- (खिलखिलाते हुए) 'तुम'
अमलताश- हा हा हा.… अच्छी कविता है. मेरे पास भी एक कविता है. सुनाऊँ?
गुलमोहर- हाँ
अमलताश- 'हम.…'
गुलमोहर- (शरमाते हुए) तुम भी बस.....

(दहकती दोपहरों की महकती बातें, शहर लखनऊ)

तस्वीर- मोबाइल क्लिक 

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (15-05-2014) को बहुत शोर सुनते थे पहलू में दिल का { चर्चा - 1613 } (चर्चा मंच 1610) पर भी है।
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

Ankur Jain said...

खूबसूरत प्रस्तुति।।।