Sunday, January 12, 2014

आईना आँख चुराता क्यों है?



जबसे पहनी है अपने होने की महक
आईना आँख चुराता क्यों है?

तेरे आने और तेरे जाने का
फर्क मिटता सा नज़र आता क्यों है?

कोई आहट नहीं कहीं फिर भी
दिल इस तरह मुस्कुराता क्यों है

जिस तरह टूटा किये हैं ख्वाब मिरे
फिर नया ख्वाब चला आता क्यों है....


11 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज सोमवार (13-01-2014) को "लोहिड़ी की शुभकामनाएँ" (चर्चा मंच-1491) पर भी है!
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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हर्षोल्लास के पर्व लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कालीपद प्रसाद said...

सुन्दर !
मकर संक्रांति की शुभकामनाएं !
नई पोस्ट हम तुम.....,पानी का बूंद !
नई पोस्ट लघु कथा

राजेंद्र कुमार said...

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,लोहड़ी कि हार्दिक शुभकामनाएँ।

रश्मि प्रभा... said...

http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/01/blog-post_13.html

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर !

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : मकर संक्रांति और मंदार

राजीव कुमार झा said...

बहुत सुन्दर .
नई पोस्ट : मकर संक्रांति और मंदार

Neeraj Kumar said...

बहुत खूब ..

आशा जोगळेकर said...

इसे कहते हैं प्यार, प्रेम, मुहब्बत, लव और जाने क्या क्या।
बहुत कोमल प्रस्तुति।

प्रवीण पाण्डेय said...

ख़्वाबों की अपनी मनमानी,
आते जाते रहते हैं

Anju (Anu) Chaudhary said...

वाह बहुत खूब