Wednesday, October 23, 2013

प्रेम में 'मैं' नहीं होता....


मैंने कहा राग 
तुमने कहा रंग 

मैंने कहा धरती 
तुमने कहा आकाश 

मैंने कहा नदी 
तुमने कहा समन्दर 

मैंने कहा 'प्रेम' 
तुमने कहा 'मैं' 

इसके बाद 
हम दोनों खामोश हो गए

कि प्रेम में 'मैं' नहीं होता...

7 comments:

अरुण चन्द्र रॉय said...

सुन्दर रचना

vandan gupta said...

kya bat kahi hai

कालीपद "प्रसाद" said...

बहुत बढ़िया
नई पोस्ट मैं

प्रवीण पाण्डेय said...

गहरा सच, काश लोग समझें।

Mahi S said...

True :)

संध्या शर्मा said...

सही है जहाँ 'मैं' है वहां प्रेम कहाँ … सुन्दर रचना के लिए बधाई..

रश्मि प्रभा... said...

'मैं' तो एक किनारा है प्रेम का - दोनों किनारों को मिलाता है और जो जुड़ गया - वह 'मैं' नहीं होता