Thursday, April 18, 2013

हरा...



कुछ जो नहीं बीतता
समूचा बीतने के बाद भी

आमद की आहटें नहीं ढंक पातीं
इंतजार का रेगिस्तान

बाद भीषण बारिशों  के भी
बांझ ही रह जाता है
धरती का कोई कोना

बेवजह हाथ से छूटकर टूट जाता है
चाय का प्याला

सचमुच, क्लोरोफिल का होना
काफी नहीं होता पत्तियों को
हरा रखने के लिए...

5 comments:

Vikesh Badola said...

बेवजह हाथ से छूटकर टूट जाता है
चाय का प्याला

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन गुड ईवनिंग लीजिये पेश है आज शाम की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

तुषार राज रस्तोगी said...
This comment has been removed by the author.
प्रवीण पाण्डेय said...

हम तो क्लोरोफिल को यह गुण देने वाले को पूजते हैं।

तुषार राज रस्तोगी said...

क्या बात है | बहुत सुन्दर शब्दावली से सजी रचना | आभार | अत्यंत सुन्दर और भावपूर्ण रचना |