Sunday, January 20, 2013

तुझसे नाराज नहीं जिन्दगी...


(दृश्य - एक सजा संवरा से कमरा है. हर चीज करीने से. एक टेबल और दो चेयर. टेबल पर अभी पीकर रखे गये चाय के कप के निशान हैं.)

जीवन- तुम हंसती क्यों रहती हो?
मत्यु- क्योंकि तुम रोते रहते हो.
जीवन- मैं कहां रोता हूं. मैं तो खुश रहता हूं.
मत्यु- तो मैं कहां हंसती हूं. मेरा तो स्वभाव ही है ऐसे दिखने का.
जीवन- तुम झूठ बोलती हो. तुम असल में हमारी लाचारगी का उपहास करती हो.
मत्यु- देखो, मैंने तुम्हें लाचार नहीं कहा, तुमने खुद कहा.
जीवन- मैंने कब कहा?
मत्यु- अरे, अभी...कहा ना
जीवन- ओ...हां. मैं तुमसे डरता हूं न जाने क्यों? उसी डर में रहता हूं.
मत्यु- मुझसे डरते हो. मुझसे? मैं ही तुम्हारा एकमात्र सत्य हूं. तुम्हें तो मुझे प्रेम करना चाहिए.
जीवन- अरे, नहीं चाहिए सत्य. तुम दूर रहो मुझसे. मैं खुश रहूंगा.
मत्यु- तो तुम्हें लगता है कि मेरे न रहने पर तुम खुश होगे.
जीवन- हां, एकदम.
मत्यु- तो ठीक है. मैं तुम्हारे पास नहीं आउंगी. कभी नहीं. चलो अब खुश हो जाओ.
जीवन- हम्म्म्म

कई बरस बाद
(दृश्य- एक वीरान सा आंगन. पतझड़ का मौसम. बरामदे से सटे उलझे हुए से कमरे में जिसे देखकर लगता है कि कभी वो बेहद करीने से रहा होगा में एक बिस्तर पर लेटा हुआ छत को ताकता एक बूढ़ा.)
जीवन- कबसे तुम्हारे इंतजार में हूं. तुम कहां हो. क्यों नहीं आतीं. मैं तुम्हें कितना प्यार करता हूं. हर पल तुम्हारे आने की आहटों पर कान लगाये बैठा हूं.
(पत्तो की सरसराहट की आवाज...)
जीवन - तुम आ गयीं...मुझे पता है तुम ही हो. बोलो न तुम आ गयीं ना?
नियति- तुम्हें किसका इंतजार है मालूम नहीं. ये तो मैं हूं हर पल तुम्हारे पास. तुम्हारी नियति. लो थोड़ा पानी पी लो.
जीवन- नहीं...नहीं पीना मुझे पानी. गुस्से में गिलास फेंक देता है. तुमसे नफरत है मुझे. चली जाओ यहां से.
नियति- हंसते हुए. मैं चली जाऊं? मैं ही तो हूं तुम्हारी नियति. मैं चली जाउंगी फिर...
जीवन- फिर क्या...तुम चली जाओगी तो सब ठीक हो जायेगा. मुझे मुक्ति मिल जायेगी.

(नियति जोर से हंसती है. तभी एक दूसरी खूबसूरत लड़की आकर नियति के करीब खड़ी हो जाती है. उसका नाम मुक्ति है. )

मुक्ति- क्या हुआ. तुम क्यों हंस रही हो?
नियति- अच्छा हुआ तुम आ गयीं. ये पड़ा है तुम्हारा आशिक. कहता है इसे मुक्ति चाहिए.
(मुक्ति जोर से हंसती है.)
मुक्ति- मैं जब भी इसके पास गई ये लोभ, मोह, माया, वासना में खुद को उलझाये बैठा मिला. आज इसे मुक्ति चाहिए.
(तभी किसी और के हंसने की आवाज आती है. एक और स्त्री का प्रवेश.)
मत्यु- हां, तुमसे ठीक पहले ये मेरी कामना कर रहा था. जबकि कई वर्ष पहले इसने मेरा तिरस्कार किया और कहा कि मैं इससे दूर रहूं.
नियति- यही इसका दोष है कि जब जो इसके पास है तब इसे वो नहीं चाहिए. जो है उसका तिरस्कार, जो नहीं है उसके पीछे भागना.
जीवन- मुझे मेरे दुखों से मुक्ति चाहिए. मैं दर्द से तड़प रहा हूं. मेरी मत्यु को बुलाओ कोई. मेरी देह को आराम मिले.

(तीनो नियति, मुक्ति और मत्यु मिलकर हंसती हैं. तभी किसी के जूतों की आहट होती है. एक सजीला नवयुवक प्रवेश करता है. वो सबको देखता है और मुस्कुराता है. तीनों उसकी ओर प्रश्नवाचक निगाह से देखती हैं.)
लड़का- मैं यथार्थ हूं.
तीनों एक साथ- हुंह....
लड़का- देखो सच यही है कि अब इसके मुक्त होकर मत्यु के पास जाने का समय आ गया है. क्यों नियति?

(नियति ख़ामोशी से सर झुका लेती है. जीवन सबको बुझती हुई नजर से देखता है और यथार्थ की बांह पकड़ लेता है. उसकी आंखों में आंसू हैं. वो मत्यु का आलिंगन करके दर्द से मुक्ति चाहता है. नियति उसे दूर से देख रही है...तेज हवा का झोंका आता है और एक पत्ता टूटकर उड़ते हुए जीवन के करीब आकर गिरता है....)
परदा धीरे-धीरे गिरता है.

3 comments:

प्रवीण पाण्डेय said...

सत्य है, स्वीकार हो,
जीवनी, स्वीकार हो,
मृत्यु भी स्वीकार हो,

पथ सतत, जो भी मिले,
बस सहज वह स्वीकार हो।

रजनीश के झा (Rajneesh K Jha) said...

प्रभावशाली ,
जारी रहें।

शुभकामना !!!

आर्यावर्त
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सुखदरशन सेखों said...

इतना अच्छा और गंभीर वार्तालाप .......वाह.....!