Wednesday, November 21, 2012

जिंदगी की शराब में अवसाद के टुकड़े


4 नवंबर 2012

हमने देखी है चिनारों से पिघलती हुई बर्फ
उनके शाने से ढलते हुए आंचल की तरह...

एक साथी ने ये पंक्तियां पकड़ा दी थीं निकलते वक्त. यहां तक हथेलियों में बंद ये पंक्तियां अब खुलकर घुल गई थीं फिजाओं में. चिनारों की खुशबू उसके रंग, रूप से पहले पहुंच रही थी. मन के मौसम का भी अजब हाल है कि कोई भी सुकून देने वाली बात, जगह, लोग मिलते ही बरसने को बेताब होने लगता है. भीतर न जाने कितना बड़ा कुंआ है, इसे न जाने कितना दुःख चाहिए न जाने कितना सुख न जाने कितना प्यार ये भरता ही नहीं...जब भी इसमें एक टुकड़ा सुख फेंको बदले में अवसाद की प्रतिध्वनि उभरती है..औटम ...क्यों कश्मीर ने मुझे इसी सीजन में पुकारा...बड़ा बेजा सवाल था. भला मेरे लिए इससे बेहतर और कौन सा सीजन हो सकता था...झरते हुए पत्तों के बीच से निकलते हुए महसूस करती हूं अपना झरना भी. दुःख से बड़ा रोमैंन्टिसिज्म कोई नहीं. ये हौले-हौले हमारी रगों में दाखिल होता है और नशे की तरह हम इसके आदी हो जाते हैं. जिंदगी की शराब में अवसाद के कुछ टुकड़े जिंदगी का स्वाद बढ़ा देते हैं.

कश्मीर रेजिडेन्सी के कमरा नंबर 301 में सामान पटकने के बाद खिड़की के बाहर झरती शाम को देखना आईना देखना सा लगा. फिर लाल चौक की सनडे मार्केट का रुख किया. बाहर निकलते ही जो पहला चिनार का पेड़ मिला हम उसी से लिपट गये. प्रदीप जी आसपास घूमने वाली जगहों के बारे में कुछ पूछताछ करने गये, तब तक रनदीप ने चिनार के पत्तों पर धावा बोल दिया. उसकी याद कोई का तार चिनारों से जुड़ा था. मैंने उसे वादा किया कि उसकी ढेर सारी सुंदर तस्वीरें खींचूंगी चिनारों के साथ...
लाल चौक की सनडे मार्केट घूमते हुए न जाने कहां निकल गये हम. भटके हुए मुसाफिर की तरह सड़कों का आनंद उठाते हुए. छोटे-छोटे अलाव जल चुके थे. बाजारों में बहुत सी नई चीजें थीं जिनके बारे में जानने की दिलचस्पी थी. रनदीप का कैमरा चल रहा था और मेरा दिमाग... ये वही लाल चौक था जिसे कभी खौफ के साये में न्यूज़ चैंनलों ने दिखाया था।

कभी किसी ने कहा था कि भीतर की दुनिया के सवालों के जवाब बाहर की दुनिया में तलाशना एक गलत खोज है...सोचती हूं भीतर की दुनिया के सवाल गर्भ में तो न रोपे गये होंगे. फिर ये प्रक्रिया गलत कैसे हुई.

जबरन थमा दी गई मुस्कुराहटें हमेशा खाली नहीं जातीं. अपने साथियों को स्नेह से देखती हूं शुकराना नहीं कर पाती उनके होने का...उनके इतने अच्छे होने का.

कोहरे की खुशबू को जेबों में भरने के बाद हम अपने-अपने कमरों में लौट तो आये लेकिन ठहर नहीं पाये. ये समूह का सफर था तो साथ ही रहना भला लगा. प्रदीप जी के संगीत के खजाने में इतने अनमोल नगीने थे कि घड़ी के कांटों का ख्याल ही नहीं रहा...न खाने की सुध...न सोने की.

फिर भी सुबह सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी और कश्मीर यूनिवर्सिटी के लोगों से तय मुलाकात पर समय से पहुंचने की जिम्मेदारी लिए नींद की दरगाह पे सजदा किया...
जारी...

2 comments:

***Punam*** said...


"दुःख से बड़ा रोमैंन्टिसिज्म कोई नहीं. ये हौले-हौले हमारी रगों में दाखिल होता है और नशे की तरह हम इसके आदी हो जाते हैं. जिंदगी की शराब में अवसाद के कुछ टुकड़े जिंदगी का स्वाद बढ़ा देते हैं."
और फिर सारी जिंदगी इसी नशे में कट जाती है...!

प्रवीण पाण्डेय said...

सपनों की जगह पहुँचने पर कल्पना पूरी अँगड़ाई लेने लगती है..