Sunday, September 2, 2012

जानती हूँ सब





'उसके माथे पर से रात फिसल गई थी. इससे पहले वो गिरकर टूट जाती गिरजे से किसी के बुदबुदाने की आवाज आई. सिसकियों में डूबी वो आवाज ईशू ने कितनी सुनी, कितनी नहीं यह तो नहीं पता लेकिन वो आवाज फिजाओं में कुछ इस तरह घुली कि टूटकर गिरने को हो आई थी जो रात वो बच ही गई बस. उस रात की मियाद बढ़ती गई...बढ़ती गई...'

'भादों की रातें यूं भी कुछ ज्यादा ही लंबी लगती हैं और सुनते हैं कि कभी कभी दो-दो भादों लग जाते हैं जैसे एक रात में कई रातें....एक इंतजार में कई इंतजार, एक जिंदगी में कई जिंदगियां. मौत भी एक कहां रह जाती है. जानने वाले जानते हैं कि न हम एक बार जन्म लेते हैं और न ही एक बार मरते हैं. यह तो बड़े से बड़े गणितज्ञ नहीं बता पाये कि अक्सर जिंदगी कम और मौत ज्यादा कैसे हो जाती है. कि जिंदा रहने के पल बस मुट्ठियों में समा जायें या उंगलियों पर गिन लिए जाएं या पलकों पर उठा लिए जाएं और मौत के पल इतने कि गिनते-गिनते मौत आ जाए.' लड़का अपनी कहानी को विस्तार दे रहा था...
लड़की का ध्यान लड़के के दर्शन पर नहीं, कहानी पर था कि दर्शन तो वो खुद भी कम नहीं जानती थी.
'तो वो जो रात फिसलकर टूटने से बच गयी थी वो जिंदगी की रात थी या मौत की...?'
लड़की कहानी सुनने के लिए बेकरार थी. वो जानती थी कि लड़का हर रोज जो भी अफसाना सुनाता है, वो अफसाना महज झूठ होता है लेकिन होता बेहद खूबसूरत है. उसकी किस्सागोई ऐसी कि लड़की ही क्या कायनात का जर्रा-जर्रा उन अफसानों का तकिया लगाये अगले दिन का इंतजार करता. बारिशें पेड़ों की डालों पर अटककर बूंद-बूंद टपकती रहतीं. पहाड़ों पर लुकाछिपी खेलते बादल थमकर सुनने लगते किस्से. लड़की जिस जंगल को पारकर लड़के से मिलने आती थी वो जंगल बेहद सुंदर था. उस जंगल के सारे जुगनुओं से उसकी दोस्ती हो गई थी. सारे रास्ते वो उनसे बातें करते हुए आती थी. कई बार लड़के को भ्रम होता कि वो उससे मिलने आती है कि जंगल से गुजरने के लिए.
'बताओ ना...वो जिंदगी की रात थी या...? ' लड़की की आवाज जैसे मिश्री.
'तुम्हें पूछना चाहिए कि गिरजे से जिसकी आवाज आई थी वो किसकी आवाज थी. '
लड़के ने लड़की की पीठ पर अपनी पीठ टिका दी और सिगरेट के छल्ले बनाने लगा.
लड़की झटके से हट गई वहां से और वो गिरते-गिरते बचा.
लड़की ने देखा भी नहीं लड़के की ओर.
'मैं जानती हूं वो किसकी आवाज थी. '
'अच्छा? तब तो तुम्हें यह भी पता होगा कि वो जिंदगी की रात थी या मौत की?'
लड़के की आवाज में अहंकार था. किस्सागो था आखिर. वो किस्सागो ही क्या जो किस्से के किसी हिस्से में किसी की जिंदगी को लटकाने का माद्दा न रखे.
'हां, जानती हूं.' लड़की झरने की तरफ बढ़ती गई. जानती हूं सब.
लड़का जोर से हंस दिया.
'सब जानती हो?'
'हां....' उसने देखा नहीं लड़के की ओर.
'क्या जानती हो मेरी कहानियों के बारे में? ये मेरी कहानियां हैं इनके बारे में सिर्फ मैं जानता हूं. इन्हें मैं जब चाहे बदल सकता हूं.'
'ये भी जानती हूं.'
'अच्छा?' लड़का अब नाराज हो चला था.
'तो मुझसे कहानियां सुनने आती क्यों हो इतनी दूर. हर रोज.'
लड़की की आवाज सर्द हो चली. 'यह तुम नहीं समझोगे.'
'ओह...मैं नहीं समझूंगा.' लड़का बेहद सख्त हो चला था.
'हां, तुम नहीं समझोगे.' लड़की ने उसी दृढ़ता से कहा.
'तो सुनो....अहंकारी लड़की. कुछ नहीं जानती तुम. मेरी कहानियों के बारे में भी नहीं और इस संसार के बारे में भी. कुछ नहीं जानतीं.
मेरी कहानियां....'
'बस... आगे कुछ न बोलना.'
'क्यों...क्यों न बोलूं. कैसे जानती हो तुम कुछ भी जबकि मेरी कहानियां सिर्फ झूठ होती हैं. कैसे जान सकता है कोई वो बात जो सच है ही नहीं. बोलो?'
लड़की सिसक पड़ी. 'मैंने कहा था न कि कुछ मत कहो. कुछ भी मत कहो. जानती थी मैं ये भी. यह भी जानती थी मैं....बस कि कुछ झूठ बचाये जाने बहुत जरूरी होते हैं. उनसे जिदंगी सांस लेती रहती है. मैं जानती हूं और भी बहुत से सच...जो तुम्हारी कहानियों की तरह ही झूठे हैं पर मैं खामोश रहती हूं.'
'वो रात जो टूटकर गिरते-गिरते बच गई थी उस रोज वो मोहब्बत की रात थी. गिरजे से आयी थी प्रार्थना की आवाज वो प्रेम पर विश्वास करने वालों की प्रार्थना की आवाज थी. उसी आवाज ने मोहब्बत पर यकीन को बचा रखा है जैसे बच गई थी तुम्हारी कहानी में टूटने से वो रात.'
लड़की रोती जा रही थी....लड़का अवाक....ये उसकी कहानी थी लेकिन इस कहानी के रेशे-रेशे पर लड़की का अधिकार था. वो जैसे अजनबी. अपनी ही कहानी से बेदखल.
'और तुम नहीं बचा पाये इस रात को टूटने से...हां, ये तुम्हारी ही कहानी है जिसमें अब तुम ही नहीं हो...'
लड़की ने अपनी धानी चुनर में अपने माथे से टूटकर गिरी भादों की उस काली रात के सारे टुकडों को बांध लिया.

उस रोज वो सारे बादल के टुकड़े जिन्हें उसने यहा-वहां सजाकर रखा था, कुछ को पलकों के पीछे, कुछ को आंचल में, कुछ को घर की देहरी पर कुछ को जूड़े में कोई आंगन में बैठा था चुपचाप और कुछ तानपूरे के ठीक बगल वाली चैकी पर बस रखे हुआ था कि रियाज के वक्त कभी-कभी छलक भर जाने से रियाज में चार चांद लग जाते थे...उस रोज वो सारे बादल बरसे...बेतरह बरसे...बरसते रहे....लोग कहते हैं इतनी बारिश पहले न देखी न सुनी....
.......................................

10 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

बहुत ही सुन्दर पोस्ट |

poonam said...

बेहतरीन

शिवम् मिश्रा said...

बहुत खूब !


मोहब्बत यह मोहब्बत - ब्लॉग बुलेटिन ब्लॉग जगत मे क्या चल रहा है उस को ब्लॉग जगत की पोस्टों के माध्यम से ही आप तक हम पहुँचते है ... आज आपकी यह पोस्ट भी इस प्रयास मे हमारा साथ दे रही है ... आपको सादर आभार !

Archana said...

वाह!

वाणी गीत said...

कहानियां कब सच बन जाये , कब उनके पात्र उनसे निकलकर सामने आ खड़े हो ...
वाह !

Dr.Nidhi Tandon said...

सुन्दर....कुछ झूठ पता होने पे भी कि झूठ हैं...अच्छे लगते हैं

बाबुषा said...

मलिका-ए-इश्क़ तक सलाम पहुंचे. :-)

jyoti nishant said...

बस कि कुछ झूठ बचाये जाने बहुत जरूरी होते हैं. उनसे जिदंगी सांस लेती रहती है. मैं जानती हूं और भी बहुत से सच...जो तुम्हारी कहानियों की तरह ही झूठे हैं पर मैं खामोश रहती हूं.'

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (09-09-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
सूचनार्थ!

Mahi S said...

awsomely good