Wednesday, August 10, 2011

भीतर मेघ मल्हार...



इन दिनों फुरसत में हूं. फुरसत जो हमेशा फुर्र से उड़ जाती थी. कभी इस डाल, कभी उस डाल. उसका पीछा करना अच्छा लगता था. बीमारी के बहाने अब वो मेरे पीछे लगी रहती है. यह भी अच्छा लग रहा है. सावन ऐसा तो कभी बीता ही नहीं कि हम सोते रहें और ये बीतता रहा. दोस्त कहते हैं कि मैं मौसमों की माशूका हूं. $जरूर वे दरवाजे पर अब भी मेरा इंतजार करते होंगे. मैं तो सोई रहती हूं. दवाइयां खाती हूं और सो जाती हूं. कितना जुल्म करती हूं ना? जागती हूं तो बादल या तो बरस के जा चुके होते हैं या ना बरसने का मूड बनाकर रूठे न$जर आते हैं. हां पत्तों पर गिरी बूंदों को छूकर सावन महसूस करती हूं. सोचती हूं वो भी क्या सावन था जब बेधड़क दरवाजे को धकेलते हुए कमरे में जीवन में स्मृतियों में दाखिल हो जाया करता था. अब ये मौसम इतने सहमे से क्यों रहते हैं. इन्हें किसका डर है.

क्यों बूंदें मुझे नहीं भिगोतीं, क्यों मैं उन्हें बालकनी से देखती भर रहती हूं. बादलों पे पांव रखकर चलने का चाव रहा हमेशा से, बूंद बनकर बरसने की तमन्नाएं रहीं...फिर ये नींद न जाने कहां से आ गई. डॉक्टरों से मिली उधार की नींद. कुछ न करने की ताकीद, कुछ न सोचने की ताकीद. आदत है बात मान लेने की सो ये भी मान ली और देखो कैसे उदास सा बादल का टुकड़ा बालकनी की रेलिंग को पकड़कर बैठा है.
मैं उससे कहती हूं मुझे डर लगने लगा है इन दिनों. चलने से डर कि गिर जाऊंगी, जीने से डर कि मर जाऊंगी...बूंदों को हाथ लगाती हूं और डरकर हटा लेती हूं कहीं बह न जाऊं इनके साथ. बह ही तो जाना चाहती थी हमेशा से. बादल का वो टुकड़ा मेरी बातें सुनता है और चला जाता है.

मां, आज कौन सा दिन है? दिनों का हिसाब किताब बिगड़ गया है. मुंडेर पर दूर बैठा कौव्वा दिखता है, किसका घर है वो...मां से पूछती हूं. पूरा सावन मायके में बीत रहा है फिर भी गुनगुनाती हूं 'अम्मा मेरे बाबुल को भेजो री..' .पापा आकर बगल में खड़े हो जाते हैं. सब हंस देते हैं जाने क्यों मेरी ही आंखें छलक पड़ती हैंं. मैं सावन को दोनों हाथों से पकड़ लेना चाहती हूं. इसकी बूंदों में किसी के होने का इंतजार नहीं. किसी के आने की तमन्ना नहीं, बस सूखे मन को भिगो लेने की ख्वाहिश है...मेरा डर बढ़ रहा है इन दिनों. मां के सीने से चिपक जाती हूं...तभी बूंदों की बौछार हम दोनों को भिगो देती है...मौसम मुस्कुरा रहा है. मत घबराओ प्रिये, जब तुम सोओगी मैं तुम्हारे सिरहाने बैठकर तुम्हारा इंतजार करूंगा...मैं निश्चिंत होकर आंखें मूंद लेती हूं...बाहर बूंदों का साज बज रहा है भीतर मेघ मल्हार...

14 comments:

Dr.Nidhi Tandon said...

भावपूर्ण अभिव्यक्ति....वो जो बादल का टुकड़ा रेलिंग पकडे बैठा हुआ हुआ....बहुत प्यारा लग रहा है...ईश्वर करे बेधड़क मौसमों का आवागमन जल्द शुरू हो जाए...आपके आँगन...एक बार फिर

प्रवीण पाण्डेय said...

बूँदों का साज और गंध, इसमें ही मन रमा है आजकल।

बाबुषा said...

ये पढ़ने के बाद मेरा ख़याल है कि तुम्हें तुरंत जबलपुर की ट्रेन पकड़ना चाहिए ..नहीं ?
मेरी छुट्टियों की समस्या नहीं होती तो सावन को चुन्नी में बाँध के ले आती तुम्हारे पास...और ख़ूब भिगोती !
मत घबराओ ..मौसम अब भी तुम्हारा इंतज़ार करते हैं ..
इधर देखो ..मैं बारिश हूँ..और तुम्हारे साथ हूँ ..!
मुस्कुराती रहो ताकि बारिश आती रहे !
और इस टाइप का ज्यादा मत लिखो यार ..बारिश बढ़ गयी तो बाढ़ का खतरा हो सकता है ..!
किताबें पढ़ो ! जल्दी ही तुम्हारे लिए दूसरी किताबें आ रही हैं..! :-)

रश्मि प्रभा... said...

bahut hi khaas apne se lagte ehsaas

rohit said...

इस दौर से बाहर निकलिए प्रतिभा जी । मुझे लगता है हम लोगों की संवेदनशीलता कई बार हमारे लिए ही घातक होती है । लेकिन क्या करें इसके खतरे को देखते हुए भी हम संवेदनहीन नहीं हो सकते । बाहर निकाल फेकिए अपने अन्दर के गुबार को । कई बार हमारे साथ ऐसी घटनाएं घटती हैं कि जिन्हें हम नजरअन्दाज नहीं कर सकते । लेकिल इस दुनिया की चाल को बेचाल करने के लिए हमें बोल्ड बनना ही होगा । बाहर निकलिए बारिश आपका इन्तजार कर रही है ।

गिरीन्द्र नाथ झा said...

मैं इसे आपकी बेहतरीन पोस्ट करार दे रहा हूं। ललित है यहां सबकुछ। रहा नहीं गया तो फेसबुक के अपने आंगन में आपके मेघ को विचरने को छोड़ आया। यदि साहित्य लेखन में कोई श्रेणी बनाने की व्यवस्था होती तो मैं इसे ललित रिपोतार्ज की श्रेणी में रख देता। अंत में बस यही कहूंगा कि आप निश्चिंत होकर आंखें मूंद लीजिए..बाहर बूंदों का साज बज रहा है भीतर मेघ मल्हार...बस महसूस करिए..यह मौसम का आपका है।

Arbind Jha said...

मत घबराओ प्रिये, जब तुम सोओगी मैं तुम्हारे सिरहाने बैठकर तुम्हारा इंतजार करूंगा...मैं निश्चिंत होकर आंखें मूंद लेती हूं...बाहर बूंदों का साज बज रहा है भीतर मेघ मल्हार...

bahut acha laga sir

Anonymous said...

...मौसम मुस्कुरा रहा है. मत घबराओ प्रिये, जब तुम सोओगी मैं तुम्हारे सिरहाने बैठकर तुम्हारा इंतजार करूंगा...मैं निश्चिंत होकर आंखें मूंद लेती हूं...

mashu

वन्दना said...

एक अलग अनुभूति का अह्सास्……………मगर जो रोहित और बाबुषा ने कहा उस पर भी गौर करियेगा।

kase kahun?by kavita verma said...

bhavpooran abhivyakti....

neera said...

देखो तो कितना सुंदर लिखा है तुम्हारी बिगड़ी तबियत ने... जल्दी अच्छी हो जाओ हम सबका इंतज़ार भी खड़ा है तुम्हारे सिरहाने...

Ojaswi Kaushal said...

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hafeez kidwai said...

kis khubsurti se dard ko nikhara hai aapne.ye dard hote hue bhi dard nahi lagta,ek chhtpatahat hote hue kitne shant hai ye.veerangi ke lamho me ek alag bhuchal hai ye.ye aapki kalam ki takat hi hai jo bimari me bhi dhardar hai.kash un badlo ko aise ehsas ki kadr ho aae wo ruk jaen reling par aapko chhune ki zahmat kare.aap wakai pratibha hai.......salam pratibha ki pratibha ko

hafeez kidwai said...

kya meetha meetha dard hai ye badlo ko bhi sharminda kar raha hai wo bhi tadap rahe hai apko bhigone k liye.