Sunday, August 7, 2011

सितारे डुबकियां ले रहे थे समंदर के भीतर



पिघल रहा था 
पत्थर के भीतर का मोम

खिल रहे थे 
चाकुओं की धार पर फूल

रात के भीतर उग आये थे 
चमकते हुए दिन

धरती के गर्भ से 
जन्म लेने लगा था आसमान

आग के भीतर से झांक रही थी 
बेहिसाब शीतलता

सितारे डुबकियां ले रहे थे
समंदर के भीतर

जब लिखी जा रही थी 
प्रेम कहानी

10 comments:

रश्मि प्रभा... said...

जब लिखी जा रही थी
प्रेम कहानी
धरती के गर्भ से
उगने लगा था आसमान...waah

गिरीन्द्र नाथ झा said...

जिंदगी को देखने, उसे महसूस करने और उसके साथ चलने का इससे बेहतर नजरिया यदि कोई हो तो बताएं। मुझे आपकी यह कविता नजरिए पर छाए कुहासे को हटाने में सहायता कर रही है। खासकर जब आप यह लिखती हैं कि 'आग के भीतर से झांक रही थी बेहिसाब शीतलता'तब मुझे सबसे अधिक मन रस आ रहा था क्योंकि यह भी एक नजरिया है। बस इस नजरिए में हम यही चाहेंगे कि कमी और चाहे जिस तरह की हो पारस्परिकता की कभी न हो। शुक्रिया

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

अच्छी रचना है!
--
मित्रता दिवस पर बहुत-बहुत शुभकामनाएँ!

प्रवीण पाण्डेय said...

प्रेम कहानी बनती है, प्रकृति के मौलिक तत्वों से।

udaya veer singh said...

This is fine one jut like mysterious voice from unknown long distance , coming slowly---/ amazing poetry .
Thanks ji /

Dr.Nidhi Tandon said...

प्रेम्कहानियाँ जब जब लिखी जाती हैं ...ऐसा ही होता है...सुन्दर अभिव्यक्ति

बाबुषा said...

Gazab !! :-)

Udan Tashtari said...

वाह!! बहुत गहरी रचना!!

Vijay Kumar Sappatti said...

आप बहुत अच्छा लिखती है .. आपकी ये कविता बहुत ही शानदार बन पड़ी है ....बहुत ही गहरा आभास दिलाती हुई रचना .

आपको बधाई !!
आभार
विजय
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कृपया मेरी नयी कविता " फूल, चाय और बारिश " को पढकर अपनी बहुमूल्य राय दिजियेंगा . लिंक है : http://poemsofvijay.blogspot.com/2011/07/blog-post_22.html

अनुपमा पाठक said...

सुंदर अभिव्यक्ति!