Monday, February 22, 2010

दर्द का साहिल कोई नहीं

हर मंज़िल इक मंज़िल है नयी और आख़िरी मंज़िल कोई नहीं
इक सैले-रवाने-दर्दे-हयात और दर्द का साहिल कोई नहीं

हर गाम पे ख़ूँ के तूफ़ाँ हैं, हर मोड़ पे बिस्मिल रक़्साँ हैं
हर लहज़ा है क़त्ले-आम मगर कहते हैं कि क़ातिल कोई नहीं

- अली सरदार जाफरी

8 comments:

अनिल कान्त said...

ise yahaan dene ke liye shukriya

Chandan Kumar Jha said...

बहुत ही खबसूरत !!!

संजय भास्‍कर said...

हर रंग को आपने बहुत ही सुन्‍दर शब्‍दों में पिरोया है, बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

रानीविशाल said...

kya baat hai...bahut khub!!
Aabhar

Mithilesh dubey said...

क्या बात है , बहुत खूब लगी आपकी ये रचना ।

मुनीश ( munish ) said...

sweet n' senti as ever !

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!

विजय प्रताप said...

अच्छी पसंद!