Sunday, July 12, 2009

बूंदों की साजिश

हवाएं रोज दरवाजा थपथपातीं। बादल का कोई न कोई टुकड़ा रोज बड़े ही करीब से होकर गुजर जाता. लगता कि अभी, बस अभी पकड़ लूं इसे. आसमान के सारे नल खोल दूं. निचोड़ ही लूं बारिश की हर बूंद. लेकिन बादल तो रूठे हैं...वे यह तो संदेशा भेजते हैं कि उनका दिल भी है बेसब्र है मिलने को लेकिन नाराजगी जो है उसका क्या करें...? धरती की मनुहार कम ही थी शायद, या बादलों का गुस्सा कुछ ज्यादा ही. धरती को बादलों के बरसने का जितना इंतजार था, उससे कम बेसब्री नहीं थी बादलों में बरसने की. धरती का एक-एक कोना भिगोने को व्याकुल बादल. बूंदों के आगोशमें धरती को समेटने का सुख सिर्फ बादलों के हिस्से ही तो आया है।

दोनों की इसी बेसब्री को खत्म करने का जो समय कुदरत ने नियत किया वही था बरसात का मौसम. सालहा इंत$जार. एक-एक बूंद जमा करते बादल और एक-एक लम्हे को इंत$जार के जवाहरात से सजाती धरती. लेकिन ये घड़ी भी अजीब है...गुस्सा पिघलता ही नहीं. बादल धरती के आसपास ही घूम रहे हैं...उनकी बेसब्री देख लगता कि दोनों हाथों से पकड़ ही लें उन्हें जाने न दें. चलो, कान ही पकड़ लेते हैं...अब न होगी कोई गलती धरती ने फुसफुसा कर कहा।

वैसे गलती क्या...उफ, इससे क्या फर्क पड़ता है? कोई भी नारा$ज हो, कोई भी बात हो कोई भी कान पकड़ सकता है, माफी मांग सकता है. है ना? धरती मंद-मंद मुस्कुरायी. बादलों ने गुस्से में ही सर घुमा लिया. गुस्से में एक भोली सी मुस्कान भी आ मिली थी. धरती को हंसी आ गई. वह जानती थी बादलों का गुस्सा. वह मानने को बेकरार है लेकिन क्या करे गुस्सा भी तो है ना।
धरती ने अपनी प्यास दिखायी... अपने $जख्म दिखाये...कान पकड़े...माफी मांगी...कहा, आ जाओ अब. बरस भी जाओ. बादलों ने बरसने से इंकार कर दिया. अपनी अकड़ पर कायम रहे...लेकिन धरती के $जख्म देखकर आंसू की कुछ बूंदें चमक ही उठीं बादलों की कोरों पर. वही आंसुओं की बूंदें आज हमारे शहर पर मेहरबान हुईं. बारिश एक झोंका शहर को भिगो गया।
उम्मीद है बादलों की नारा$जगी पिघलेगी और तरसती धरती तरबतर हो जायेगी...
चल नहीं पायेगी बूंदों की साजिश....

16 comments:

श्रद्धा जैन said...

Bairsh bulane aur uske aane par aisa man bhavan lekhan pahli baar padha

chal nahi paayegi bundo ki saajish
badal ka man pighlega
aise gahri soch aur shabad aapki kalam ki taqat khud bayan kar rahe hain

M VERMA said...

धरती की मनुहार कम ही थी शायद"
"उम्मीद है बादलों की नारा$जगी पिघलेगी और तरसती धरती तरबतर हो जायेगी..."
हम कुछ कर तो नही सकते उम्मीद ही करनी है.

Mithilesh dubey said...

bahut khub, barish me bhigo diya aapne.

AlbelaKhatri.com said...

ek khoobsoorat ehsaas.......
achha laga
badhaai !

mehek said...

bahut hi sunder,boondon ki saajish nahi chale to achha,ye baadal bare aur dharti ki pyas gujhe.

Udan Tashtari said...

काव्यात्मक अभिव्यक्ति!! वाह!

KK Yadav said...

Behatrin ....ehsason ko apne jo shabd diye hain, lajwab hain.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

उम्मीद पर दुनिया टिकी है,

कभी तो दीनदयाल के भनक पड़ेगी कान।

भगवान सबका भला करेंगा।

डाकिया बाबू said...

उम्मीद है बादलों की नारा$जगी पिघलेगी और तरसती धरती तरबतर हो जायेगी...
चल नहीं पायेगी बूंदों की साजिश.... Bada sahi jumla kaha apne !! kabhi hamare "Dakiya" blog par bhi ayen, apko kashi aur ujjain ka prasad khilayenge.

"लोकेन्द्र" said...

मानसून है ये कुछ नखरे तो दिखायेगा ही............

RAHUL said...

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना है,
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे.

आपके शब्दों की आँखों से देखने पर रुत का नजारा ही बदल जाता है.....सुंदर...ऐसे ही हमे तरह तरह के रंग दिखाती रहिये....

RAHUL said...

तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना है,
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे.

आपके शब्दों की आँखों से देखने पर रुत का नजारा ही बदल जाता है.....सुंदर...ऐसे ही हमे तरह तरह के रंग दिखाती रहिये....

ranjana gupta said...

ek khoobsoorat ehsaas.......
achha laga
badhaai

Pakhi said...

Barish to mujhe bahut priya hai.

आकांक्षा~Akanksha said...

Barish ka intza ham sabhi ko hai, par indra dewata pighalte hi nahin hain...lagta hai is bar rimghim barish se marhoom hi rahna padega.

आकांक्षा~Akanksha said...

"Shabd-Shikhar" ki or par hamne Barish ke mausam ka mano ek package hi de rakha hai, kabhi gaur farmayen in lekhon par-
बारिश का मौसम और भुट्टा
मेघों को मनाने का अंदाज अपना-अपना
सावन के बहाने कजरी के बोल