Saturday, July 11, 2009

मैंने चुना प्रेम



मालूम था
क्या होती है प्रतीक्षा,

कैसा होता है
दु:ख अवसाद, अंधेरा,
किस कदर

मूक कर जाता है
किसी उम्मीद का टूटना,
फिर भी मैंने चुना प्रेम!

11 comments:

शायदा said...

achha kiya. vaise bhee
muhabbt ka naghma har saz par gaya nahi ja sakta.

Parul said...

चखना ज़रूरी भी तो - अवसाद का स्वाद

ओम आर्य said...

बहुत ही खुब कहा .............अपना दिल तो ऐसा ही होता है जिसे सिर्फ प्यार ही चख्ना होता है ...........बहुत बढिया

Kishore Choudhary said...

कि प्रेम से उपजा हर क्षण और अहसास है दीर्घजीवी चाहे वो हो दर्द के रूप में....

M Verma said...

प्यार कब कठिनाईयो से डरता है.
टूटने का एहसास भी टूटने के बाद ही होता है
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

Syed Ali Hamid said...

ग़ालिब का शेर याद आ गया:
आये है बेकसी-ए-इश्क पे रोना 'ग़ालिब'
किसके घर जाएगा सैलाब-ए-बला मेरे बाद !

अगर यह न चुनें तो फिर क्या चुना जाए?

ज्योति सिंह said...

pyar sundar ahsaas hai .iske bina zindagi berang hai .

ज्योति सिंह said...

kishore ji ki baaton se main sahamat hoon .wo dil ko chhune wali baat kah gaye .sachchi aur gahari .

अशोक कुमार पाण्डेय said...

कविता प्रभावित करती है।

सुशीला पुरी said...

bahut sundar.....

uma said...

namaste pratibha ji, kavita bahut achchhi he. aapka e-mail address janna chahti hoon